Why is the sea saline? story in hindi

बहुत पहले एक मीठे पानी का समुद्र था जो एक शहर के बहत पास से गज़रता था. वो समद्र किसी किंगफिशर पक्षी के पंखों जितना नीला और हरा था. अगर आप अपना हाथ उसके चमकीले पानी में इबोते, तो आप पाते कि आपकी उंगलियों पर पानी की बूंदें किसी पहाड़ी झरने की तरह मीठी होती.

उस छोटे शहर के पीछे एक छोटी पहाड़ी थी, और उस छोटी पहाड़ी पर एक छोटा सा घर था. घाटी के दूसरी तरफ एक ऊंची पहाड़ी थी, और उस ऊंची पहाड़ी पर एक ऊंचा घर था. ऊंचे घर में एक लंबा दुबला-पतला आदमी रहता था. वह बहुत अमीर था, उसके तहखाने सोने और चांदी से भरे थे, और उसकी रसोई पडिंग, केक, आड़ और क्रीम से भरी थी.

छोटे घर में अपने सत्रह बच्चों के साथ एक छोटी सी औरत रहती थी. उनके पास बिल्कुल भी पैसे नहीं थे,

और उनकी रसोई में सिर्फ खाली प्लेटों के ढेर था और मकड़ी के जाले थे."हम क्रिसमस पर क्या करेंगे?" बच्चों ने एक दिन अपनी माँ से पछा. "क्या हमें कोई उपहार मिलेंगे? क्रिसमस का पेड़?" पर जवाब में छोटी औरत ने सिर्फ अपना सिर हिलाया. "मेरे प्यारे बच्चों, घर में कुछ भी नहीं बचा है. मेरी जेब में सिर्फ एक कंकड़ है, और मेरे पर्स में एक छेद के अलावा और कुछ भी नहीं है." "क्या हम ऊंची पहाड़ी पर रहने वाले अपने मामा से कुछ मदद नहीं मांग सकते?" सबसे बड़ी बेटी मटिल्डा ने पूछा. "उनके पास पर्याप्त से अधिक धन है. वो ज़रूर हमारी कुछ मदद कर सकते हैं." "नहीं, मटिल्डा," छोटी औरत ने कहा. "मेरा भाई जब एक छोटा लड़का था तब भी वो बड़ा मतलबी था. बड़े होकर भी वो मतलबी है. वो हमें क्रिसमस के लिए कुछ भी नहीं देगा.” "लेकिन पूछने में तो कोई बुराई नहीं है," मटिल्डा ने कहा. उसने शाल ओढ़ते हए कहा. "अगर वो न कहेंगे, तो भी हमारी हालत कोई बदतर नहीं होगी - और

अगर वह हाँ कहेंगे, तो हम अच्छी तरह क्रिसमस मना पाएंगे." फिर मटिल्डा छोटी पहाड़ी से नीचे उतरी, और ऊँची पहाड़ी पर चढ़ी.

दरवाज़ा खटखटाने वाला कुंडा बहुत बड़ा था. जब मटिल्डा ने उसे खटखटया तो उसकी आवाज़ चारों तरफ गूंजी. फिर दरवाजा धीरे से खुला.

"तुम कौन हो?" मटिल्डा के मामा ने अपनी गहरी आवाज में पूछा. "मामा मैं मटिल्डा हूँ," मटिल्डा ने कहा. "क्रिसमस आ रहा है, और हमारे घर में खाने को एक दाना भी नहीं है. रसोई में सिर्फ खाली प्लेटों और मकड़ी के जाल के अलावा और कुछ नहीं है. मैंने सोचा कि शायद आप हमारी कुछ मदद कर सकें."
"मैं मदद क्यों करूं?" मामा ने पूछा. मटिल्डा ने अपना सिर खुजलाया. "शायद इसलिए क्योंकि आप बहुत दयालु हैं?" "मैं नहीं हूँ," मामा ने कहा. "लेकिन आप हमारे मामा हैं," मटिल्डा ने कहा. फिर मामा ने एक कदम आगे बढ़ाया. "क्या मैंने कभी तुम्हारी माँ से सत्रह बच्चे पैदा करने को कहा था?" "मुझे नहीं लगता कि आपने कभी ऐसा कहा होगा," मटिल्डा ने कहा. "और क्या मैंने कभी आप लोगों से खाने और पीने पर अपना सारा पैसा बर्बाद करने को कहा था?" "मामा, भूख के समय हमें खाना खाना ही पड़ता था," मटिल्डा ने कहा," लेकिन निश्चित रूप से आपने हमसे वैसा कुछ नहीं कहा था."

"और क्या मैं कभी तुम्हारा मामा बनना चाहता था?" "ठीक है, नहीं. मान लें कि आपने कभी हमसे यह बातें नहीं कहीं," मटिल्डा ने कहा. "फिर," मामा ने कहा, "फिर मैं तुम्हें क्रिसमस के लिए एक छोटा टुकड़ा भी क्यों दूं."
"माँ ने कहा था कि आप यही कहेंगे," मटिल्डा ने कहा और फिर वो जाने के लिए मुड़ी. "लेकिन मैंने कहा कि आपसे पूछने में कोई बुराई नहीं है. मैं आपको क्रिसमस की शुभकामनाएं देती हूँ और फिर घर वापिस जाती हूँ."  "एक मिनट रुको!" मामा मुड़े और फिर घर में अंदर गए. मटिल्डा दरवाजे पर इंतजार करती रही. वो क्या लेने गए हैं? वह आश्चर्यचकित हुई. बिस्कुट? आइसक्रीम? पेपरमिंटस? फल?

"यह लो," मामा वापिस आए. उनके हाथ में एक हरे रंग की बोतल थी और एक भूरे कागज़ का पैकेट था. "और देखो, इसके बाद तुम मुझे फिर से कभी परेशान मत करना."

मटिल्डा ने बोतल और पैकेट लिया. "बहुत-बहुत धन्यवाद, मामाजी," उसने कहा. "क्या आप हमारे साथ क्रिसमस का खाना नहीं खायेंगे?" "मैं नहीं आऊंगा," मामा ने कहा, और फिर उन्होंने कसकर दरवाजा बंद किया.
मटिल्डा पहाड़ी से नीचे उतरने लगी. वो कुछ आगे बढ़ी फिर वो रुकी. "मैं जानना चाहती हूँ कि उस बोतल में क्या है?" उसने खुद से कहा. "और उस पैकेट में क्या है?'

बहत सावधानी से उसने बोतल खोली. बहुत सावधानी से उसने उसे सूंघा. फिर, बहुत सावधानी से उसे चखा.
"अरे," मटिल्डा ने कहा. "उसमें तो सिर्फ पानी है," फिर उसने एक गहरी आह भरी.
धीरे-धीरे उसने पैकेट के चारों ओर की डोरी खोली. बहुत धीरे से उसने कागज को खोलकर देखा. "अरे," मटिल्डा ने कहा. "उसमें सिर्फ सूखे मीट का एक टुकड़ा है."
"सुनो!"
"क्या?" मटिल्डा के पीछे एक धूल से लदा एक बूढ़ा आदमी खड़ा था.
"क्षमा करना बेटी- लेकिन मुझे कुछ खाने को और पीने के लिए कुछ पानी चाहिए?"
"पूछने में कोई बुराई नहीं है," मटिल्डा ने कहा, "और आपका स्वागत है. मेरे पास कुछ पानी और कुछ ठंडा और सूखा मीट हैं." बूढ़े आदमी ने कुछ पानी पिया और फिर मांस का टुकड़ा खाया. उसने उसे लंबे समय तक ध्यान से चबाया. फिर उसने अपना सिर हिलाया. "धन्यवाद बेटी. तुम्हारे घर में क्रिसमस के लिए क्या-क्या खाना
है?"
"कुछ भी नहीं है," मटिल्डा ने कहा. "केवल कुछ सूखा मीट है."  "फिर मेरी बात सुनो. क्या तुम्हारी याददाश्त अच्छी है?" "हाँ, काफी अच्छी है," मटिल्डा ने कहा.

"अच्छा तो ठीक है. फिर तुम अपना भोजन और पानी लेकर जंगल में जाओ और वहां के सबसे काले दरवाजे पर जाकर तीन बार दस्तक दो. और तुम्हें जो भी दिया जाए उसे मत लो. सिर्फ कहो "मुझे दरवाजे के पीछे वाली मथनी चाहिए, और कुछ नहीं." "मुझे दरवाजे के पीछे वाली मथनी चाहिए, और कुछ नहीं," मटिल्डा ने दोहराया. "फिर तुम जल्दी से घर जाना. हाँ, एक और बात याद रखना - हिप हॉप, छोटी मथनी, हिप हॉप बंद!"

"मुझे याद रहेगा," मटिल्डा ने कहा. "लेकिन मथनी क्या होती है?" "एक, दो, तीन, तुम बस रुकना और देखना!" फिर हवा का एक झका आया, और मटिल्डा को छींक आई. जब उसने ऊपर देखा, तो छोटा बूढ़ा आदमी गायब हो गया था. मटिल्डा ऊंची पहाड़ी से नीचे जंगल में भागी. वो पेड़ों के झुरमुटों में इधर-उधर देखने लगी. "सबसे काला दरवाजा कौन सा है?" उसने खुद से पूछा. "मैं कहाँ देखू?"

पेड़ लम्बे और गहरे हो रहे थे. हवा सायं-सायं करके चल रही थी. "बापरे!" मटिल्डा कांपने लगी. हवा के एक झोंके ने एक शाखा को उड़ा दिया, और तभी मटिल्डा ने एक दरवाजा देखा. वो सबसे काला दरवाजा था. मटिल्डा ने फिर से याद किया कि उसे क्या कहना है. "मुझे दरवाजे के पीछे वाली मथनी चाहिए, और कुछ नहीं." "ठीक है, पूछने में कोई बुराई नहीं है." मटिल्डा ने एक बार दस्तक दी. कुछ नहीं हुआ. मटिल्डा ने फिर दस्तक दी, जोर से. किसी ने जवाब नहीं दिया. उसने फिर से पूरा दम लगाकर जोर से खटखटाया. फिर दरवाजा एक धक्के के साथ खुला. एक अंधेरी परछाई बाहर निकली और उसने अपनी लाल आँखों के मटिल्डा को घूरा. फिर उसने कई बार सूंघा. "मांस," वो चिल्लाई, "और पानी? वो मुझे दो."

मटिल्डा ने हरे रंग की बोतल और भूरे रंग के पेपर पैकेट को कसकर पकड़ा और अपने सिर को हिलाया.
"मैं तुम्हें सोना दूंगी! सोने का पहाड़ दूंगी!" वो परछाई चिल्लाई.
मटिल्डा ने बोलने की कोशिश की. लेकिन उसकी आवाज़ सूखकर एक फुसफुसाहट बन गई. "मुझे दरवाजे के पीछे वाली मथनी चाहिए, और कुछ नहीं." वो फुसफुसाई.
कालिख के काले धब्बे मटिल्डा के चेहरे के आसपास उड़ने लगे. उसने खांसते हुए अपने पैरों को पटका. "मुझे दरवाजे के पीछे वाली मथनी चाहिए!"

तभी हवा का एक झोंका आया. वो परछाई अब एक ड्रम जैसी चीज को पकड़े हए थी. उसने ड्रम को मटिल्डा के सामने जमीन पर फेंक दिया और उसके हाथों से हरी बोतल और सूखे मीट का टुकड़ा छीन लिया. मांस जलकर झुलस गया, और पानी उबला और उसने भाप का एक बादल छोड़ा. फिर एक गूंज के साथ दरवाजा बंद हो गया.
मटिल्डा ने आँखें मलीं और अपने चारों ओर देखा. वह पेड़ों के बीच अकेली खड़ी थी. हवा में जलने की बदबू आ रही थी लेकिन वहां पर अब दरवाजे का कोई नामो-निशां नहीं था. फिर उसने लकड़ी के ड्रम को देखा.
"तो यह मथनी है," उसने कहा. "यह तो बहुत ही साधारण दिखती है - इसमें सिर्फ एक ड्रम है और एक हैंडल है. मुझे इसमें कुछ खास नहीं लगता है."

मटिल्डा ने मथनी उठाई और उसे वापस घर ले जाने लगी. मथनी काफी भारी थी इसलिए वो छोटी पहाड़ी के तल पर आराम करने बैठ गई.

"काश मैंने मांस और पानी अपने लिए रखा होता." उसने गुस्से में कहा. "यह मथनी बहुत भारी है. काश, मेरे पास पीने के लिए कुछ पानी होता." मथनी थर-थर करके काँपने लगी. मटिल्डा चौड़ी आँखों से उसे घूरने लगी. क्योंकि मथनी का हैंडल धीरे-धीरे करके खुद घूम रहा था - चिंकीली, चंक, चंकी!

मथनी का ऊपरी हिस्सा खुला और फिर पानी की एक निर्मल धारा उसमें से बहने लगी.
मटिल्डा ने उसे अपने हाथों में पकड़ने की कोशिश की, लेकिन पानी उसकी उंगलियों के बीच में से बहने लगा.
"अरे वाह!" उसने कहा.

मथनी चल निकली चिंकीली, चंक, चंकी! पानी के बहने से मटिल्डा के पैर गीले हो गए, और एक चमकदार पानी का नाला घास पर बहने लगा. "रुको रुको!" मटिल्डा चिल्लाई. “बहुत अच्छा! अब बंद करो!"

पर मथनी चलती ही रही. "मुझे लगा कि तुम्हारी अच्छी याददाश्त है," मटिल्डा को कान में एक कर्कश आवाज सुनाई दी. "बेशक! वो चिल्लाई, उसने हाथ से ताली बजाते हए कहा, "मुझे याद है!" वो मथनी की और झुकी. "हिप हॉप छोटी मथनी, हिप हॉप स्टॉप!" मथनी धीमी हो गई. मटिल्डा हंसने लगी. सारा पानी जमीन में रिस गया और उसके पास पीने के लिए कुछ भी पानी नहीं बचा.

"मुझे लगता है कि मैं अब घर जाऊँगी," उसने कहा.मटिल्डा की मां, उसके भाई और बहन घर के दरवाजे पर खड़े उसका इंतजार कर रहे थे. जब उन्होंने मटिल्डा को आते देखा तो उन्होंने अपने हाथ लहराए और चिल्लाए. वो उसकी मदद के लिए दौड़े. "यह क्या है?" "यह क्या है?" सबने एक साथ पूछा.
"यह हमारा क्रिसमस भोज है," मटिल्डा ने कहा. "बस देखना."
उसने मथनी से कहा, "कृपया हमे क्रिसमस का भोज दो?"

चिंकीली, चंक, चंकी! मथनी से एक टेबल क्लॉथ फड़फड़ाता हआ बाहर आया और वो हवा में तैरने लगा. वो मेज पर बिछ गया और उसके बाद चाकू, कांटे और चम्मच
और कप, प्लेट भी आए फिर खाने की ऐसी तमाम अद्भुत चीजें आईं, जिनके बारे में मटिल्डा और उसके भाइयों-बहनों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. अंत में गर्मागर्म हलवा आया.
"अरे वाह!" सभी बच्चे चिल्लाए. मटिल्डा खुशी से मुस्कुराई, "हिप हॉप छोटी मैथनी, हिप हॉप स्टॉप!" वो फुसफुसाई.

उस दिन से मटिल्डा और उसका परिवार बहत ख़ुशी से रहने लगे. जब भी उन्हें किसी चीज की जरूरत होती, वे मथनी से उसे मांग लेते थे. और फिर मथनी का हैंडल घूमता था. फिर उनके पास पर्याप्त चीजें हो गईं. अब उनके पास पाँच लाल मुर्गियाँ, छह मोटी भेड़ें, सात सूअर, और आठ काली-सफेद गायें थी. ऊँची पहाड़ी पर से मामा ने यह सब बदलाव बड़े आश्चर्य से देखा.  "उन्होंने तो कहा था कि उनके पास खाली प्लेटों के देर और कोने में मकड़ी की जाले के अलावा और कुछ नहीं है," मामा ने खद से कहा. "फिर ये मर्गियाँ, भेड़ें और सूअर और गाय कहाँ से आए?" मामा ने अपनी बड़ी काली टोपी खींची. अपने कंधों के चारों ओर अपने काले लबादे को जकड़ा और ऊंची पहाड़ी से उतरकर छोटी पहाड़ी पर चढ़े. जब वह छोटे से घर में पहंचे. उन्होंने दरवाजे को खटखटाया तक नहीं. उन्हें देखकर मटिल्डा की छोटी माँ और सभी बच्चे आश्चर्य से उछल पड़े.
"बड़ा अच्छा लगा आपको देखकर, भाई!" माँ ने कहा.

"आराम से बैठो और हम तुम्हें अपने सौभाग्य के बारे में बताएंगे." यह कहकर माँ ने मथनी को सहलाया.
"प्रिय मथनी, हमारे लिए अच्छी चाय बनाओ." जैसे ही मथनी का हैंडल धीरे-धीरे घूमने लगा वैसे-वैसे मामा की आँखें बड़ी और बड़ी होती गईं. मथनी में से चाय और केक, टोस्ट और जैम बाहर, हवा में तैरते हए मेज पर आ रहे थे. यह देख मामा का मुंह खुला ही रह गया. वो मेज़ को निहारने में इतने व्यस्त थे कि जब मटिल्डा ने करीब जाकर मथनी से "हिप हॉप, छोटी मथनी, हिप हॉप स्टॉप," कहा, तो मामा ने उसपर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया.  "क्रिसमस पर हमारी चतुर मटिल्डा इस मथनी को हमारे लिए लाई," छोटी औरत ने कहा. "उसे ठंडे सूखे मीट के टुकड़े और पानी की बोतल के बदले में यह मथनी मिली.' "क्या?" मामा ने घूरते हए कहा और वो अपने पैरों से उछलॅ.
मटिल्डा की माँ ने सिर हिलाया. "मटिल्डा ने जो कुछ किया वो हमारे लिए बहत अच्छा साबित हआ." फिर मामा ने अपनी बाहें मोड़ ली.

"बस मुझे यह बताओ," मामा चिल्लाए, "यह वह कौन था जिसने मटिल्डा को वो मांस का टुकड़ा दिया था?" "क्यों? भाई जान, वो तुम ही थे!" छोटी औरत ने अपने भाई की बांह थपथपाई. "वो कौन था," मामा ने पूछा, "जिसने मटिल्डा को पानी की बोतल दी थी?"
छोटी औरत खुशी से मुस्कुराई. "क्यों भाई वो आप ही ने दी थी. हम आपके बहुत आभारी हैं." "फिर," मामा ने लालची मस्कराहट के साथ कहा, "यह मथनी सही मायने में मेरी ही है."
मामा ने उनसे वो मथनी छीन ली और उसे अपनी बांह के नीचे दबा लिया और फिर घर से बाहर निकले.
छोटी औरत फूट-फूट कर रोने लगी. "मत रोओ, माँ," मटिल्डा ने कहा.
"थोड़ी देर प्रतीक्षा करेंगे और देखेंगे कि क्या होता है." और फिर मटिल्डा घर के बाहर सीढ़ियों पर ही बैठ गई.
मामा मथनी को छोटी पहाड़ी के नीचे लेकर गए. जैसे-जैसे वह ऊंची पहाड़ी पर चढ़े मथनी भारी और भारी होती गई. इसलिए जब मामा अपने दालान में पहँचे, तो उन्होंने उसे एक झटके के साथ मथनी को नीचे ज़मीन पर रखा.

"ठीक," मामा ने कहा. "अब, मैं कहाँ से शुरू करूं? मुझे पता है! मैं खाने से शुरू करूंगा! और फिर बाद में मैं मथनी से सोना तैयार करूंगा - फिर मेरे तहखाने और गोदाम सोने से पूरी तरह भर जायेंगे. शायद मझे सोने को रखने के लिए एक और खलिहान का निर्माण करना पड़े. लेकिन अभी मझे दलिया चाहिए!" फिर मामा ने मथनी को थपथपाया. "दलिया! और साथ में कछ ताजा मछली भी, और हाँ ज़रा जल्दी."
फिर मथनी का हैंडल घूमने लगा - पहले धीरे, फिर तेज़ी से - चिंकीली, चंक, चंकी! करते हुए चारों ओर दलिया बहने लगा. दलिया एक मोटी चिपचिपी धार में बहता हआ बाहर आया, और साथ में मछलियाँ भी बाहर निकलीं. फिर मछलियाँ तेज़ी से बाहर निकलने लगीं और इधर-उधर दौड़ने लगीं. "रुको!" मामा चिल्लाए. "बस, इतना काफी है!"

लेकिन मंथन रुका नहीं. मथनी लगातार चलती रही और उसमें से तेज़ी से दलिया निकलता रहा. जल्द ही मामा के घुटनों तक दलिया आ गया और दालान इतना भर गया कि दलिया दरवाजे के बाहर बहने लगा और चारों ओर मछलियों का ढेर लग गया.
मामा बहत चीखे-चिल्लाए और उन्होंने ज़मीन पर अपने पैर पटके लेकिन उससे कुछ फायदा नहीं हुआ. मथनी चलती ही रही चिंकीली, चंक, चंकी! आखिर में मामा दलिए और मछलियों के बढ़ते ढेर को जोर से धक्का देते हुए पहाड़ी से नीचे उतरे.
"मदद करो!" मामा चिल्लाए.
मटिल्डा ने सीढ़ियों पर से उन्हें देखा. जब उसने मामा को अपनी ओर आते हए देखा तो उसके चेहरे पर एक छोटी सी गुप्त मुस्कान बिखरी.
"मदद करो!" मामा का चेहरा लाल सुर्ख था. वो मटिल्डा की ओर बढ़े. "मदद करो!" "क्या हुआ मामा?" मटिल्डा ने उठते हुए पूछा.
"मैं दलिए और मछली के ढेर में डूब रहा हूँ," मामा ने हांफते हुए कहा. "तुम्हें उस नाचीज़ मथनी को रोकना होगा, और फिर मैं उसे जलाऊ लकड़ी के लिए काट दूंगा!"
"अच्छा!" मटिल्डा ने कहा. वो फिर बैठ गई. "तुम क्या कर रही हो? तुम तुरंत मेरे साथ चलो, इसी मिनट," मामा गुस्से में चिल्लाए.
"ठीक है. मुझे लगता है कि मैं अपनी छोटी मथनी को आपसे वापिस ले लूंगी," मटिल्डा ने कहा. "अच्छा अगर मैं दलिए का उत्पादन बंद कर दूं, तो फिर क्या मैं मथनी को अपने घर ले जा सकती हूँ?"
"हाँ ज़रूर! पर अभी जल्दी करो!" मामा का रंग अब लाल से बैंगनी रंग में बदल रहा था.
मटिल्डा पहाड़ी से नीचे उतरी. जब वो ऊंची पहाड़ी पर चढ़ी तो दलिया उसके चारों ओर था और उसने देखा कि उसके मामा का घर दलिए की झील में धीरे-धीरे डूब रहा था. मटिल्डा दालान में पहुंची और उसने मथनी को उठाया.

"हिप हॉप छोटी मथनी, हिप हॉप स्टॉप!" वो फुसफुसाई.
मथनी रुक गई और मटिल्डा ने उसे कसकर पकड़ लिया. फिर वो वापस अपनी पहाड़ी पर अपने घर की ओर गई. मामा एक बार फिर ऊँची पहाड़ी पर चढ़े, और उन्होंने अपनी मुट्ठी हिलाकर मथनी से छुटकारा पाया.
"मेरा सुंदर घर! सोने का तहखाना! मेरी रसोई के स्वादिष्ट पकवान!" मामा अपने घर के सामने खड़े होकर रोने
लगे.
"तबाह हो गया! सब बर्बाद हो गया!"
मटिल्डा और उसके परिवार में एक उत्सव जैसा माहौल था. वे बारा, खुशी से रहने लगे. पर जब सूरज बहत जोर से चमकता और पूरब से हवा चलती तो उन दिनों मछलियों की सड़ी दुर्गन्ध आती थी, और तब मटिल्डा की माँ बच्चों से घर की सभी खिड़कियां बंद करने को कहती थीं.
"शायद अब हमें यहाँ से कहीं और चले जाना चाहिए?" मटिल्डा ने सुझाव दिया.

"शायद हमें यही करना चाहिए," उसकी छोटी माँ ने कहा, और फिर सभी सोलह बच्चों ने अपने हाथों से ताली बजाई. "क्या हम समुद्र के किनारे जाकर रह सकते हैं?" सबसे छोटे बच्चे ने पूछा.
मटिल्डा ने सिर हिलाया. "हाँ, मैं वहां पर एक अच्छा घर जानती हूँ," उसने कहा.
मटिल्डा और उसकी माँ और सभी सोलह बच्चे, बंदरगाह के किनारे एक बड़े घर में शिफ्ट हए. फिर हर दिन वे छोटे शहर के पास समुद्र के चमकीले पानी को देखते थे. वे बड़े, लंबे जहाजों को अंदर और बाहर आते हए देखते थे और वो माल को उतरते हुए देखकर बहुत खुश होते थे. मटिल्डा को बंदरगाह के पास की चट्टानों पर बैठना बहत पसंद था. वो साफ पानी में अपनी उंगलियों को डालती थी.
एक दिन जब वो वहाँ बैठी थी जब एक बढ़िया सफेद जहाज लहरों को काटता हआ वहां आया और उसने लंगर डाला.

एक काली टोपी पहने, एक लंबा दुबलापतला आदमी जहाज़ से नीचे उतरा. उसके हाथ में एक सफेद रुमाल था जिससे वो अपने आंसू पोंछ रहा था. मटिल्डा ने पूछा, "क्या मैं आपकी कुछ मदद कर सकती हूं?" "प्यारी बेटी," आदमी ने अपने रुमाल के पीछे से कहा. "इस गरीब नाविक पर दया करो, जिसके पास दुनिया में अब कुछ भी नहीं बचा है. लेकिन उसके घर में सोलह भूखे बच्चे हैं और खाली प्लेटें हैं और रसोई के कोने में एक मकड़ी का जाल
"अरे बाबा!' मटिल्डा ने कहा. "मुझे बहत खेद है – मुझे पता है कि आप कैसा महसूस करते होंगे. आप यहाँ रुकें."
मटिल्डा, बंदरगाह की दीवार से लगे अपने घर में घुसी. उसने मथनी उठाई और उसे वापस उस स्थान पर ले गई जहां पर गरीब नाविक झपकी ले रहा था. "यह रहा," मटिल्डा ने कहा. "किसी ने कभी मुझे यह दिया था जब मेरे पास कुछ भी नहीं था. पर अब मेरे पास वो हर चीज है जो मैं चाहती हूं. कृपया इसे लें. यह आपके लिए सौभाग्य लेकर आएगा."
मटिल्डा रुकी. नाविक उसकी बात नहीं सुन रहा था. वह जल्दी से मथनी के साथ जहाज की ओर भागा. वो जहाज़ पर चढ़ा और उसने लंगर को ऊपर उठाना शुरू किया. जल्द ही पाल में हवा में भर गई और जहाज विशाल समुद्र में आगे बढ़ने लगा. मटिल्डा ने कहा. "अरे मैंने उसे यह तो बताया ही नहीं कि मेरी छोटी मथनी कैसे काम करती है." फिर वो धीरे-धीरे वापस अपने घर गई.
जहाज पर, नाविक, जो वास्तव में मटिल्डा का मामा था, अपने हाथों को एक-दूसरे से ख़ुशी से रगड़ रहा था. "इस बार," मामा ने कहा, "मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि मैं अपने घरों और तहखानों और खलिहानों को सोने से भर दूं - हां, और रत्नों से भी. इस बार मथनी मुझे दुनिया का सबसे अमीर आदमी बना देगी. मैं अब मथनी को शुरू करूंगा. मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता अगर वो कभी नहीं रुकती है. फिर वो हमेशा के लिए मंथन करती रहेगी.

मथनी को साथ लेकर मामा एक शानदार केबिन में घुसे. दरवाज़े पर ही उनकी मुलाकात कप्तान से हुई.  "तो तम्हारा खजाना कहाँ है?" कप्तान ने लकड़ी की छोटी मथनी को घूरते हुए पूछा. "क्या? सोने के इतने सारे वादों के बाद क्या तुम मुझे सिर्फ एक लकड़ी का पुराना ड्रम दोगे?"  मामा ने एक धूर्त लालची मुस्कान बिखेर दी. "ज़रा कुछ समय रुको. जैसे ही तुम्हारा जहाजे किनारे पर आएगा फिर मैं तुम्हें दिखाऊंगा," मामा ने कहा.
"फिर मेरे सभी क़र्ज़ चूक जाएंगे. अच्छा, क्या मेरा भोजन तैयार है?" कप्तान ने सिर हिलाया. मामा चांदी के थाल में एक मेज पर बैठकर पुडिंग और आडू और क्रीम खाने लगे. "क्या आपको खाना पसंद आया?" कप्तान ने पूछा.
"बहुत स्वादिष्ट है," मटिल्डा के मामा ने कहा. उनका एक हाथ अभी भी मथनी पर रखा था.
"पर काश खाने में थोड़ा और नमक होता." चिंकीली, चंक, चंकी!
मथनी ने धीरे-धीरे चलना शुरू कर दिया.
"रुको!" मामा ने हैंडल को घसीटते हुए कहा. "रुको!" चिंकीली, चंक, चंकी! हैंडल और अधिक तेजी से घमा.
मामा का चेहरा पीला पड़ गया. उनके कुछ भी कहने से मथनी पर कोई असर नहीं पड़ा. नमक अधिक और अधिक बाहर गिरने लगा.
जहाज का पूरा केबिन नमक से भर गया. क्योंकि नमक जहाज़ के पूरे डेक पर भर गया था, इसलिए चालक दल के सदस्य एक नाव में चढ़कर भाग निकले. नमक अब पाल की ऊंचाई तक पहुंचा गया.
कुछ समय बाद जहाज डूब गया और समुद्र की गर्त में जाकर बैठ गया. उसके बाद किसी ने भी मामा को दुबारा नहीं देखा. लेकिन समुद्र की गहराई में मथनी के नमक बनाने का काम जारी रखा. चिंकीली, चंक, चंकी!
कुछ दिनों बाद मटिल्डा समुद्र के किनारे पर बैठी हुई थी. उसने अपना हाथ पानी में डुबॉया.
मटिल्डा ने कहा, "बड़ा अजीब है, क्योंकि जब उसने अपनी उंगलियां चाटीं तो उसे पानी का स्वाद बिलकुल अलग लगा."
"इसका स्वाद कैसा है?" उसकी छोटी बहन ने पूछा.
"चखो," मटिल्डा ने कहा, "पानी का स्वाद अब नमकीन है." यह मथनी ने ही किया होगा ...
और वो हमेशा ऐसा ही करती रहेगी ...|