Analyze the role of Abul Fazal as a historian. in hindi

अबुल फजल अकबर का प्रमुख सलाहकार एवं प्रवक्ता था। दरबारी इतिहासकार के रूप में अबुल फजल ने अकबर के शासन से जुड़े विचारों को न केवल आकार दिया वरन् उनको स्पष्ट रूप से व्यक्त भी किया।

अबुल फजल का पालन-पोषण मुगल साम्राज्य की राजधानी आगरा में हुआ था। वह अरबी, फारसी, यूनानी दर्शन एवं सूफीवाद में अत्यन्त निपुण था। वह सबसे बढ़कर एक प्रभावशाली वक्ता तथा स्वतंत्र चिंतक था जिसने लगातार दकियानूसी उलेमाओं के विचारों का विरोध किया। उसके इन गुणों ने सम्राट अकबर को बहुत प्रभावित किया। अकबर ने अबुल फजल को अपने सलाहकार और अपनी नीतियों के प्रवक्ता के रूप में बहुत उपयुक्त पाया। बादशाह का मुख्य उद्देश्य राज्य को धार्मिक रूढ़िवादियों के नियंत्रण से मुक्त कराना था।

दरबारी इतिहासकार के रूप में अबुल फजल का योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण है। उसने अकबरनामा एवं आइन-ए-अकबरी' जैसे महान ग्रन्थों की रचना की।

अबुल फजल ने अकबरनामा पर कई वर्षों तक कार्य किया। यह ऐतिहासिक घटनाओं के वास्तविक विवरणों, शासकीय दस्तावेजों तथा जानकार व्यक्तियों के मौखिक प्रमाणों जैसे विभिन्न प्रकार के साक्ष्यों पर आधारित है। अकबरनामा को तीन भागों (Volumes) में विभाजित किया गया है जिनमें प्रथम दो इतिहास हैं तीसरी जिल्द या भाग आइन-ए-अकबरी है। __ 'आइन-ए-अकबरी' मुगल काल के प्रशासनिक अध्ययन का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह अकबर के समय की एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना थी। बादशाह अकबर के आदेश पर अबुल फजल के इसका बीड़ा उठाया तथा अकबर के शासन के 42वें वर्ष अर्थात 1598 में इसे पाँच संशोधनों के बाद पूरा किया गया।

आइन-ए-अकबरी मुगल काल के शाही नियम-कानून का सारांश था तथा इसे एक राज-पत्र की सूरत में संकलित किया गया था। आइन पाँच भागों में संकलित है। पहले तीन भागों में प्रशासन का विस्तृत विवरण है। पहले भाग में मंजिल-आबादी, दूसरे भाग में सिपाही आबादी तथा तीसरे भाग में मुल्क की आबादी के बारे में विवरण है। चौथे और पाँचवे भाग में धार्मिक, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक रीति रिवाजों के बारे में विवरण दिया गया है।

1602 ई. में अबुल फजल राजकुमार सलीम द्वारा तैयार किये गये षड्यंत्र का शिकार हुआ और सलीम के सहयोगी एक राजपूत सरदार वीर सिंह बुंदेला द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी।