Alamelu's hunger story in Hindi

एक थी अलामेलू । उसका पति था दासार। दोनों दक्षिण भारत के एक छोटे से गांव में रहते थे। हर रोज सुबह-सवेरे कंधे पर झोला लटकाए और हाथ में तांबे का बड़ा कटोरा लिए दासार घर से निकल जाता था। वह अपनी मधुर आवाज में भजन गाता और लोग खुश होकर उसके कटोरे में भिक्षा डाल देते थे। दोपहर तक वह घर लौट आता था। उसे हर रोज इतना जरूर मिल जाता था जिससे पति-पत्नी का पेट भर जाये। अलामेलू अच्छी पत्नी थी, लेकिन पिछले कई वर्षों की गरीबी से वह बहुत ऊब गई थी। वह चाहती थी कि वह सुख-शांति से एक बेहतर जीवन गुजारे। “कब तक भला मैं वही चावल खाती रहूंगी जो रोज तुम्हें भीख में मिलते हैं। तुम कुछ और मांगकर क्यों नहीं लाते हो? कभी तो हमारा भोजन कुछ अच्छा बने, कुछ मनपसंद बने। कब तक भला हम एक जैसा खाना खाते रहेंगे!" वह शिकायत के अंदाज में रोज ऐसे कहा करती थी। मैं अपनी मनपसंद चीज भला कैसे मांग सकता हूं?" दासार उसको समझाते हुए कहता। "मैं तो भजन गाता हूं, कीर्तन करता हूं और फिर परमात्मा की कृपा से जो कुछ मिल जाये उसे स्वीकार कर घर ले आता हूं। यह उसकी ही कृपा है कि हमें रोज कुछ मिल जाता है और हम भूखे नहीं सोते हैं।"

“अब चुप भी करो तुम ! बंद करो अपनी राम-कहानी।" अलामेलू अक्सर उसे बीच में टोककर ऐसे ही उसकी बात काट देती थी। दासार बेचारा चुपचाप उदासी में सिर झुकाए अपना-सा मुंह लेकर घर से निकल जाता था। रोज-रोज ऐसी चिकचिक चलती ही रहती। दासार सब कुछ चुपचाप सुनता रहता। दान की बछिया के दांत भला कौन देखता है! कहता भी क्या दासार? मगर आज तो उसकी गत और भी बिगड़नी थी। “कैसे मूर्ख हो तुम, एक कटोरा भर चावल में संतोष कर लेते हो।" अलामेलू ने चीखते हुए कहा। "हमारी पड़ोसन को भी तो देखो जरा! आज मैं सुबह उनके घर गई तो उसने मुझे चावल के पुए खिलाये। क्या बढ़िया स्वाद था? वाह! मैं तो दंग रह गई। मन हुआ अपने भी घर में ऐसे ही पुए बनाऊं, लेकिन मेरी किस्मत में भरपूर चावल भी कहां लिखे हैं?" उसने फिर दासार को डांटते हुए कहा, “अरे, कभी तो भरपेट खिलाने को खूब सारे चावल मांग लाया करो? मेरी तो किस्मत फूट गई है।"

दासार ने फिर उसकी बात सुनी और कहा, “तुम्हीं बताओ प्रिये, मैं क्या करूं और क्या मांगकर लाऊं? मैं कोशिश कर सकता हूं कि कभी तुम्हारी मनपसंद चीज मैं ला सकूँ। बताओ, क्या लाना है?"

"कल थोड़े ज्यादा चावल मांगकर लाना।" अलामेलू ने उसके हाथ में एक बड़ा-सा झोला थमाते हुए कहा। "और हां, सुनो! थोड़ा गुड़ भी लाना ताकि मैं भी पुए बना सकू।" 

दूसरे दिन दासार झोला लेकर घर से जल्दी अपनी फेरी के लिए निकल पड़ा। उसके कंधे पर झोला लटक रहा था और हाथ में तांबे का वही बड़ा कटोरा था, जिसमें वह रोज कुछ मांग लाया करता था। वह गांव में जाकर अपनी सुरीली आवाज में भजन गाने लगा। लोगों ने उसे घेर लिया और उसके भजनों में खो गये। वह भी खो गया। वह ज्यादा चावल और गुड़ मांगना भूल ही गया। देने वाले भी उसके भजनों में खो गये थे। किसे भला क्या याद आता! वे तो सब उसके साथ भजन गाने में मस्त थे।

कई घंटे बीत गये। अचानक दासार को घर की याद आई। उसने देखा कि जो भीड़ उसके साथ भजन गा रही थी वह तो धीरे-धीरे छंट गई है। कुछ गिने-चुने लोग ही बस बाकी रह गये थे। दासार ने देखा कि उसका तो कटोरा भी अभी तक चावल से नहीं भरा है और न ही उसमें किसी ने गुड़ डाला है। उसे अलामेलू को दिया गया अपना वचन याद आया और वह भारी कदमों से अगले गांव की ओर इस उम्मीद में चल पड़ा कि वहां से वह कुछ और चावल और गुड़ जुटा लेगा।

वह जंगल के रास्ते दूसरे गांव जा रहा था। जंगल बहुत शांत था। ठंडी बयार चल रही थी। दासार अपने विचारों में खो गया। अचानक रास्ते में उसे एक बूढ़ा आदमी मिला। उसने बड़े आदर से उसे पुकारा और कहा, “अरे! रोज की तरह अपनी फेरी के बाद घर क्यों नहीं लौट गये।"

दासार ने बूढ़े बाबा के चमकते चेहरे की ओर ध्यान से देखते हुए कहा, "क्या बताऊं दोस्त, घर पहुंचा और पत्नी ने यदि यह पाया कि मैं झोला भर गुड़-चावल नहीं लाया हूं तो क्या मालम मझे क्या-क्या सनना पडेगा। वह तो पए बनाने की उम्मीद लगाए बैठी होगी।"

बूढ़े बाबा की वाणी और व्यवहार में आत्मीयता देखते हुए दासार बाबू ने अपनी सारी करुणकथा उनको सुना दी। कहा, "मैं तो एक गरीब आदमी हूं, रोज भजन गाने के बाद भीख में जो मिल जाता है उसे हरि कृपा मानकर संतोष कर लेता हूं, मगर मेरी पत्नी को कभी संतोष नहीं होता। वह सदा पकवानों के लिए तरसती रहती है। अमीरी उसे बहुत अच्छी लगती है। अब मैं क्या बताऊं? यह मेरी किस्मत है कि मैं ही उसे मनचाही चीजें ले जाकर नहीं दे सकता।"

“क्यों?" विस्मय के साथ बूढ़े बाबा ने उसके झोले को अपने हाथ से छूते हुए पूछा, ''मैं देख सकता हूं कि तुम्हारे झोले में तो इतना सारा गुड़ और चावल भरा है कि तुम्हारी पत्नी अपनी इच्छा के अनुसार पुए बना सके! जाओ और अपनी पत्नी को यह देते हुए कह दो कि तुम्हें वह सब मिल गया है जो वह चाहती थी।" ऐसा कहते हुए बूढ़े बाबा जंगल में कहीं ओझल हो गये और दासार ने झोला उतारकर देखा तो वह चावल और गुड़ से भरा हुआ था।

दासार ने इधर-उधर देखा कि वह बूढ़े बाबा को धन्यवाद दे। मगर वे तो घने जंगल में कहीं खो गये थे। दासार बहुत खुश हो रहा था। मन ही मन फूला नहीं समा रहा था

और यही सोच रहा था कि उसके प्रभु ने ही कृपा करते हुए बूढ़े बाबा को उसका झोला भरने को भेजा था। उसने जल्दी-जल्दी घर पहुंचकर और पुलकित होते हुए झोला अलामेलू को थमाते हुए बूढ़े बाबा की कृपा की सारी कहानी कह सुनाई।

अलामेलू ने जैसे ही झोले में देखा तो चकित होकर बोली कि बूढ़े बाबा की कृपा है कि उसने इतना सब हमें दिया। अब तुम जाओ, नहा-धो लो। मैं पुए बनाती हूं और फिर हम मजे से पेट भर पुए खायेंगे।

जल्दी ही पुए बन गये थे। अलामेलू तो फटाफट उन्हें खाने बैठ गई थी। भगवान की प्रार्थना भी भूल गई थी। जिसने इतना कुछ भेजा उसे धन्यवाद देने का धीरज भी वह नहीं धर सकी थी। इस बीच दासार नहा-धोकर आया। उसने प्रार्थना की। परमात्मा के प्रति कृतज्ञता जाहिर की और फिर अपने हिस्से के पुए खाने बैठ गया। मन ही मन वह जंगल के बूढ़े बाबा को भी धन्यवाद दे रहा था।

उधर अलामेलू अपनी पत्तल चाट चुकी थी। कुछ पुए बच जाते तो वह शायद उन्हें भी चट कर जाती।

कई दिन बीत गये थे। अलामेल को फिर उन पओं की याद आने लगी थी। उसने फिर दासार को उसी जंगल में जाकर बढ़े बाबा से जाकर कुछ मांग लेने का आग्रह किया। और ऐसा आग्रह वह रोज सवेरे कर दिया करती थी।

"मैं चाहती हूं कि तुम मुझे खूब सारे चावल और गुड़ फिर लाकर दो,' सुबह-सुबह उसने शिकायत के अंदाज में दासार से कहा, "मैं चाहती हूं कि बूढ़े बाबा हमें फिर से खूब सारे चावल और गुड़ दें ताकि मैं जी भरकर पुए खाने का आनंद ले सकूँ।" दासार ने उसके लोभ को शांत करने की दृष्टि से कहा था, “यह परमात्मा की कृपा ही है कि हमने पुओं का स्वाद चखा और खाने का इतना आनंद लिया। उसकी कृपा से ही तो हमें सब कुछ मिला। अब मैं उनसे और अधिक कैसे मांग सकता हूं?"

अलामेलू भला कहां सुनने वाली थी, उसने उसकी ओर देखा और अपने आग्रह को दुहराते हुए कहा, “जाओ, बूढ़े बाबा को फिर जंगल में खोजो। उनसे दुगना चावल और गुड़ मांगो ताकि मैं खूब सारे पुए बना सकू और जी भर कर खा सकूँ। जाओ, अभी जाओ और उन बूढ़े बाबा को खोजो।"

दासार अपनी पत्नी की डांट-फटकार और लोभ से बहुत ऊब गया था। वह जंगल की ओर निकल गया। उसके मन में अपनी पत्नी के व्यवहार से इतनी उधेड़बुन थी कि वह जंगल के एकांत में आते हुए बूढ़े बाबा तक को नहीं देख सका जब तक कि वे खुद उससे टकरा नहीं गये।

बूढ़े बाबा ने उसे देखते ही अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा, “अरे! कहां हो तुम! कहो, तुम्हारी पत्नी ने पुओं का आनंद उठाया कि नहीं?"

दासार आश्चर्यचकित होकर ठिठका हुआ हाथ जोड़े खड़ा रहा। फिर साष्टांग दंडवत करके बोला, “आपने बड़ी कृपा की है और मुझे पूरा विश्वास है कि आप मेरे प्रभु के ही दूत हैं जिनके भजन मैं रोज गाता हूं। उन्होंने ही कृपा कर आपको मुझे संकट से उबारने के लिए भेजा है।"

दासार ने शर्म के मारे नजरें झुकाते हुए बड़े संकोच के साथ आगे कहा, "मेरी पत्नी के लोभ का कोई अंत नहीं है। उसने मुझे फिर आपके पास भेजा है कि मैं पहले से दुगना चावल-गुड़ आपसे मांग लाऊं, वह फिर पुए बनाए और जी भर कर मजे ले।"

बूढ़े बाबा प्रसन्न होकर हंसते हुए कहने लगे, “अच्छा, ऐसा कहा उसने? तो इसमें भला शर्म की क्या बात है! तुम उसकी बात मुझे कहते हुए इतना संकोच क्यों करते हो?"

बूढ़े बाबा ने बहुत प्यार से दासार को गले लगाया और अपने हाथ से उसके कंधे पर लटके हुए झोले को छू दिया और कहा, “तुम बहुत अच्छे मनुष्य हो। तुम फिर मेरी यह भेंट अपनी पत्नी तक ले जाओ। उससे कहना कि वह फिर से पुए बनाए और आनंद ले।"

दासार ने आश्चर्य से देखा कि उसका झोला अचानक भारी हो गया है। उसमें गुड़ और चावल भरा हुआ था। दासार ने बूढ़े बाबा का धन्यवाद करना चाहा, लेकिन वे तो हंसते हुए पहले ही जा चुके थे।

वह घर पहुंचा और बूढ़े बाबा को धन्यवाद देते हुए उनकी भेंट अलामेलू को दे दी। अलामेलू ने प्रसन्नता से झोला लिया और कहा कि तुम नहा-धोकर आओ, मैं पुए बनाती दासार नहाने गया। इस बीच अलामेलू ने झोला खाली किया। वह बार-बार खाली करती और झोला बार-बार भर जाता। ऐसा करते-करते अलामेलू के घर में बहुत-सा चावल और गुड़ इकट्ठा हो गया। मगर झोला खाली ही नहीं हो रहा था।

अलामेलू ने थककर भरे झोले को चावल के ढेर पर रख दिया। उसने झट से थोड़ा चावल भिगोया। पीसा तो देखते ही देखते पिसा हुआ चावल बढ़ता ही चला गया। वह जब भी बर्तन में से पिसा हुआ चावल निकालती, बर्तन फिर से पिसे हुए चावल से भर जाता।

थकी-हारी अलामेल ने गड भिगोया। चावल की पीठी में मिलाया और पए बनाने लगी। फिर एक आश्चर्य हुआ। वह कढ़ाई में से पुए निकालती और कढ़ाई फिर पुओं से भर जाती। अलामेलू इस चमत्कार को देखती रही और उसकी भूख बढ़ती गई। अंत में अलामेलू इस सबसे परेशान हो गई। उसने एक थाली में तले हुए पुए डाले और खाने के लिए बैठ गई। कढ़ाई फिर पुओं से भर गई थी।

अलामेलू ने पुए को चखा, स्वाद लेने को चबाया और निगलना चाहा तो फिर एक चमत्कार हुआ। पुआ उसके मुंह में फूलता ही चला गया। इतना फूला, इतना फूला कि अलामेलू से निगलते ही नहीं बना। उसका गला पुओं से भर गया। वह डर के मारे कांपने लगी। उसकी सांस जैसे रुक गई। आंखें फटने लगीं। न निगलते बना न थूकते बना।

तभी दासार कमरे में आया और पत्नी की हालत देखकर हैरान रह गया। धीरे-धीरे सारी बात उसकी समझ में आने लगी थी। अलामेलू की आंखें फटी जा रही थीं। वह पुओं को चबाने का प्रयत्न करते हुए आगे बढ़ी और पति के पांवों में गिर पड़ी और रोने लगी।

तभी एकाएक वह पुए को निगलने में सफल हो गई। अलामेलू ने रोते हुए पति के पांवों को पकड़े-पकड़े कहा, "ईश्वर ने मुझे मेरे लोभ की सजा दी है। हे मेरे परमेश्वर, आप मुझे क्षमा करें।"

दासार समझ गया कि अलामेलू को सबक सिखाने के लिए यह सब बूढ़े बाबा का कमाल है। तब दासार ने अलामेलू को उठाया।

एकाएक चावल, गुड़ और बाकी सारे सामान का बढ़ना थम गया। उसके बाद दासार और अलामेलू ने भगवान का धन्यवाद देते हुए पुओं का आनंद लिया।

उसके बाद, दोनों जो कुछ मिलता उसी में पूरी तरह संतुष्ट रहते थे। दोनों यह जान गये थे कि भगवान अपने भक्तों को इतना जरूर देते हैं जिससे वे भूखे न रहें।