Nelson Mandela Biography in Hindi

नेल्सन मंडल आधुनिक इतिहास के सबसे अधिक प्रेरक व्यक्तियों में एक हैं। १९६३ से १९९० तक वह एक "अंतरात्मा के कैदी" थे, सामाजिक न्याय के एक महा-नायक, जिन्हें रंगभेद के विरुद्ध उनके संघर्ष के कारण बड़े अन्यायपूर्ण रूप से जेल में रखा गया। रंगभेद की नीति दक्षिण अफ्रीका की संस्थागत जातीयता (racism) का हिस्सा थी। वे अपने देश की सामाजिक समस्याओं का शांतिपूर्ण हल खोजने के लिए प्रतिबद्ध थे, और अंततः उन्हें इसके लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। अपने लोगों को समानता का अधिकार दिलाने के लिए मंडेला के अहिंसक संघर्ष में पूरा विश्व उनके साथ आ खड़ा हुआ, और यह सिद्ध हो गया कि सद्भावना और अंतर्राष्टीय समर्थन के द्वारा निश्चय ही दमनकारी शासकों का तख्ता पलटना संभव है। दक्षिण अफ्रीका के लोकतान्त्रिक गणतंत्र के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति बन कर उन्होंने रही-सही बाधाओं को भी ध्वस्त कर किया। 

इस पुस्तक में योना ज़ेल्दिस मक्डोनॉ और मलका ज़ेल्दिस ने बाल्यकाल से लेकर कारावास के समय, और उसे बाद तक, नेल्सन मंडेला के सम्पूर्ण जीवन का एक हृदयस्पर्शी चित्रण करके उन्हें एक ऐसी श्रद्धांजलि दी है, जो उनकी "लम्बी स्वाधीनता यात्रा" का परिचय आज की पीढ़ी से कराती है। यह एक ऐसी यात्रा है, जो उनके साथ हर आयु के पाठक प्रसन्नता पूर्वक करना पसंद करेंगे। मेरे पुत्र, जेम्स रेडेन मक्डोनॉ को समर्पित, जिसका भविष्य बहुत संभावनाओं से भरा है। - योना ज़ेल्दिस मक्डोनॉ बूती मंडेला का जन्म १८ जुलाई १९१८ में दक्षिण अफ्रीका के मवेज़ो गांव में हुआ था। उसके पिता, मंडेला परिवार के मुखिया, गदला हेन्द्री मफाकन्यीसवा, थेम्बू लोगों के बड़े बुद्धिमान और सम्मानित शासक थे।

थेम्बू कबीले के लोग, जिनके पुरखे अनेक वर्षों से अफ्रीका में रहते आये थे, अश्वेत वर्ण के लोग थे। लेकिन, यद्यपि अफ्रीका उनका ही देश था, वे गोरे विदेशी आगंतुक शासकों की दया पर निर्भर थे। इन गोरों ने, जो मुख्यतः इंग्लैंड और जर्मनी से थे, १७०० के दशक में उनकी धरती पर कब्जा कर लिया और उन लोगों पर प्रभुत्व जमा कर शासन करने लगे।

एक बार जब एक अँगरेज़ न्यायाधीश ने मुखिया हेंड्री को एक बैल पर हुए विवाद के विषय में पेश होने का आदेश दिया, तो उसने जाने से इनकार कर दिया। उसके अनुसार एक थेम्बू मुखिया का दायित्व केवल थेम्बू शासक के आदेश का पालन करना था, न कि किसी अँगरेज़ अफसर का। उसकी इस अवज्ञा के कारण हेंड्री को अपना मुखिया का पद त्यागना पड़ा। अपने इस मत के कारण उसे अपनी ज़मीन, अपने मवेशी और अपना सम्मानित पद भी खोना पड़ा।

हालाँकि जब यह सब हुआ, बूती एक शिशु ही था, लेकिन वह इस आभास के साथ बड़ा हुआ कि उसके पिता अपने संकल्पों पर दृढ़ रहने वाले व्यक्ति थे, भले ही उन्हें इसकी बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। इस घटना के बाद वे नज़दीक के गांव कुनू में जाकर रहने लगे, जहाँ वे अपने रिश्तेदारों के एक फार्म पर रहते थे। हालाँकि कुनू बहुत छोटी जगह थी, वह बूती को पसंद आई। उनके घर में तीन छोटी झोंपड़ियां थीं, जिनकी दीवारें मिटटी की ईंटों से बनी थीं, और छत घास की थी। एक झोंपड़ी खाना बनाने के लिए थी, एक सोने के लिए, और एक खाने-पीने का सामान रखने के लिए। कुर्सियां भी मिटटी की बनी थीं, और चूल्हे के नाम पर मात्र जमीन में एक गड्ढा था।

दिन के समय बूती मवेशी चराता था, और अपने सौतेले भाई-बहनों और दोस्तों के साथ खेतों में

खेलता था। जैसा कि उन दिनों के अफ्रीका में रिवाज़ था, उसके पिता की चार पत्नियां और तेरह बच्चे थे। लड़के अपने खिलौने खुद बनाते थे। वे मिटटी को तराश कर तरह-तरह के जानवर और चिड़ियाँ बनाते थे। और वे नदीजे (लुका-छिपी) और इस्क्वा (चोर-सिपाही) और थिंती (एक युद्ध से प्रेरित खेल) आदि खेल खेला करते थे।

रात को बूती सोने के लिए अपनी चटाई पर लेट जाता था। सोने से पहले उसके माता-पिता उसे बड़ी रोचक कहानियां सुनाते। उसके पिता की सुनाई कहानियां अक्सर बहादुर योद्धाओं और उनकी लड़ाइयों के बारे में होती थीं, और उसकी माँ उसे थेम्बू लोगों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही लोक कथाएं सुनाती थी।

जब बूती सात वर्ष का हुआ, उसके माता-पिता को लगा कि उसे स्कूल भेजना चाहिए। हालाँकि हेंड्री मंडेला स्वयं कभी स्कूल नहीं गया था, उसने निश्चय किया कि उसके बेटे को यह अवसर अवश्य मिलना चहिये। बूती के तीन सौतेले भाई पहले ही वयस्क होने के बाद घर छोड़ कर जा चुके थे। इस प्रकार बूती स्कूल जाने वाला अपने परिवार का पहला सदस्य बन गया।

पहले ही दिन, अध्यापक ने सभी बच्चों को नए अंग्रेजी नाम दे दिए। बूती घर आया तो उसने सबसे कहा कि उसे नेल्सन नाम से पुकारा जाये, जो अध्यापक द्वारा दिया हुआ उसका नया नाम था। क्योंकि स्कूल का प्रबंधन अँगरेज़ आगंतुकों द्वारा किया जाता था, छात्रों को बताया जाता कि अंग्रेजों के तौर तरीके, यानि उनकी भाषा, इतिहास, संस्कृति और विश्वास, अधिक श्रेष्ठ थे। उन्हें अपने स्वयं के रीतिरिवाज़ों और संस्कृति का आदर करना नहीं सिखाया जाता था।

लेकिन फिर भी नेल्सन को स्कूल अच्छा लगता था। उसे रोज़ाना नयी बातें सीखने को मिलतीं, और उसे एक तख्ती और खड़िया दी गई थी, जिससे कि वह उन बातों को लिख सके।

१९२७ में, जब नेल्सन नौ वर्ष का था, उसके पिता का देहांत हो गया। अपने ऐसे पिता को खोकर उसे बहुत दुःख हुआ, जिन्होंने अपने आदर्शों और मूल्यों पर दृढ रह कर एक सशक्त उदहारण प्रस्तुत किया था।

हेड्री मंडेला की अंतिम इच्छा यही थी कि नेल्सन एक अच्छी शिक्षा प्राप्त करे, और एक ऐसा व्यक्ति बने जो अपने लोगों के लिए एक मिसाल बन सके। इसलिए नेल्सन और उसकी माँ कुनू और उस छोटे से स्कूल को छोड़ कर चले गए, जो अब नेल्सन के लिए काफी नहीं था। वे पैदल ही थेम्बूलैंड की राजधानी मकैकेजवेनि को निकल पड़े। उस समय नेल्सन के पास केवल टीन का एक बक्सा था, उसने एक पुरानी कमीज पहनी थी, उसका नेकर उसके पिता की पतलून को काट कर बनाया गया था, जिसे उसने एक रस्सी के नाड़े से बंधा हुआ था। उस इलाके में रहने वाले अफ्रीकन लोग मकैकेजवेनि को "बड़ा नगर" कहते थे, और नेल्सन वहां की मोटर-गाड़ियों, विशाल घरों, सुन्दर बगीचों, और फलों के पेड़ों से भरे बागानों को देख कर अचंभित रह गया।

नेल्सन अपने पिता के एक रिश्तेदार, सरदार जोगिनताबा डालिंदयेबो के घर रहने लगा, जिन्होंने उसका अभिभावक बनना स्वीकार कर लिया था। जल्दी ही वह संकोची सा गांव का बालक इस नए जीवन का अभ्यस्त हो गया। सरदार के बच्चे और नेल्सन साथ-साथ ही स्कूल और गिरिजाघर जाते, और आपस में काफी घुल-मिल गए। नेल्सन ने स्कूल में अच्छा प्रदर्शन किया। लेकिन उसने बाद में कहा था कि इसका कारण उसका तेज़ दिमाग़ नहीं बल्कि सफलता पाने की उसकी तीव्र इच्छा थी।

बड़े नगर में रहना नेल्सन को इसलिए भी बहुत अच्छा लगता था, क्योंकि यहाँ बहुत से महत्वपूर्ण लोग सरदार दलिंदयेबो से मार्गदर्शन लेने आया करते थे, और नेल्सन को उन्हें देखने का मौका मिलता था। इन लोगों से नेल्सन ने अफ्रीका के इतिहास और वहां के महान पुरुषों के बारे में बहुत कुछ सीखा। उन लोगों से जो कहानियां उसने सुनीं, वे उसे लम्बे समय तक याद रहीं।

सोलह वर्ष की आयु में पहुँच कर अब नेल्सन को अपने पारम्परिक रीति-रिवाज़ों के साथ युवावस्था में प्रवेश करना था। इसके लिए उसके कबीले के लड़कों को मबाशा नदी के तट की यात्रा करनी होती थी। अपने गांव के बड़े-बूढ़ों के मार्गदर्शन में वहां उन्हें घास का बना अंगोछा पहन कर अपने पूरे शरीर पर सफ़ेद मिटटी का लेप लगाना होता था। वे सब नाचते गाते, और कहानियां सुनाते। उनमें से एक वक्ता ने नेल्सन पर बहुत गहरा प्रभाव डाला। उसने सब लड़कों को बताया कि उनके युवावस्था के सपने अधूरे ही रहेंगे, क्योंकि दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत लोग अपनी ही भूमि पर गुलाम बन कर रह रहे थे, और अपनी आज़ादी और अधिकारों से वंचित थे।

बहुत वर्षों बाद नेल्सन ने लिखा था कि इन शब्दों का उस पर उस छोटी उम्र में कितना प्रभाव पड़ा था। उसने कहा कि उस समय उसके लिए इस विषय में कुछ पर पाना संभव नहीं था, लेकिन ये विचार उसके मन में घर कर गए, और इन्हीं विचारों ने संसार के विषय में उसकी परिकल्पनाओं का सृजन किया।

नेल्सन ने अपनी शिक्षा जारी रखी, पहले क्लार्कबरी आवासीय संस्थान में, जो कि इंगकोबो जिले का एक थेम्बू महाविद्यालय था, और फिर फोर्ट हेयर में, जो ऐलिस नगरपालिका में स्थित शिक्षण संस्थान था, और ब्रिटिश मिशनरियों द्वारा पूरे अफ्रीका के अश्वेत निवासियों के लिए चलाया जाता था। फोर्ट हेयर में ही उसने अपने देसी तौर तरीकों से हटना प्रारम्भ किया। बजाय अपने दांतों को राख से मांजने के, उसने टूथपेस्ट और ब्रश का इस्तेमाल शुरू किया। पतलून पहनना, फ्लश-युक्त शौचालय का प्रयोग करना, और गरम पानी के फव्वारे से नहाना, ये सब नई सुख-सुविधाएँ उसे अच्छी लगने लगीं।

वह एक अच्छा विद्यार्थी था, और परिश्रम से पढ़ाई करता, लेकिन खेल-कूद और नृत्य इत्यादि मनोरंजनों के लिए भी समय निकल लेता। फोर्ट हेयर में उसके अंतिम वर्ष में उसे छात्र परिषद् के लिए चुना गया। लेकिन १९४० में जब स्कूल के प्रधानाचार्य से उसकी किसी विषय पर असहमति हो गई, तो वह पढाई पूरी होने से पहले ही फोर्ट हेयर छोड़ कर चला गया।

वापस बड़े नगर पहुँचने पर एक अप्रत्याशित बात हुई। उसके अभिभावक, सरदार दलिंदयेबो ने उसका और अपने बेटे जस्टिस का विवाह तय कर दिया था। हालाँकि परिवार जनों द्वारा इस प्रकार शादियां तय किया जाना अफ्रीका का प्रचलित रिवाज़ था, नेल्सन और जस्टिस ने कुछ और ही सोच रखा था। दोनों साथ घर से भाग कर जोहानसबर्ग के महानगर में पहुंच गए। नेल्सन का सपना एक वकील बनने का था,

और सौभाग्य से उसे लैज़र सीडलस्की नाम के एक सहानुभूतिपूर्ण गोरे वकील के यहाँ काम मिल गया। सीडलस्की के कार्यालय में प्रशिक्षण ग्रहण करने के साथ-साथ नेल्सन ने अपनी पढाई भी जारी रखी।

जोहानसबर्ग में रहने के दौरान नेल्सन को एक अन्य प्रकार की शिक्षा भी मिली। गांव से आने वाले एक नौजवान किशोर के लिए महानगर का जीवन भीड़-भड़क्के, मुश्किलों और दुविधाओं से भरा था। और जोहानसबर्ग में आकर ही नेल्सन ने देखा कि सत्तारूढ़ गोरे लोग अश्वेत अफ्रीकियों से कितना दुर्व्यवहार करते थे। उन्हें केवल नियत स्थानों पर ही रहने की इजाज़त थी, उनके घर बहुत छोटे और बदहाल थे, जिनमें न बिजली-पानी था, और न गर्म रखने की सुविधा। उन्हें केवल उन्हीं बसों में सवारी करने, और उन्हीं भोजनालयों में खाने की अनुमति थी, जो केवल अश्वेत अफ्रीकन लोगों के लिए नियत किये गए थे।

लेकिन शायद सबसे ख़राब चीज़ थी पासबुक की प्रणाली। जब कोई अश्वेत व्यक्ति नगर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में काम के लिए जाता, तो उसे एक छोटी पासबुक साथ रखनी होती थी। उचित पासबुक साथ न होने पर उन्हें जेल भेजा जा सकता था।

दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने इस व्यवस्था को अपार्टहाईड (apartheid) या रंगभेद का नाम दिया था, जिसका अर्थ है, अलग रखना। अमेरिका में भी इसी प्रकार की व्यवस्था थी, जिसे सेग्रीगेशन (segregation) कहा जाता था। अपार्टहाईड के अंतर्गत गोरे और अश्वेत लोगों के लिए एक साथ खाना-पीना, घूमना-फिरना, खरीदारी करना, एक ही घर में साथ रहना, एक ही स्कूल या गिरिजाघर में जाना पूरी तरह वर्जित था। नेल्सन ने यह सब देखा तो धीरे-धीरे उसके मन में इस व्यवस्था को बदलने की तीव्र इच्छा ने जन्म ले लिया।

प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद, नेल्सन ने जोहानसबर्ग में काफी तरक्की की। उसके पास एक अच्छी नौकरी थी, और उसने अपनी पढाई जारी रखी थी। फिर उसकी मुलाकात इवेलिन मेस से हुई, जो उसके एक मित्र की चचेरी बहन थी, और दोनों में प्रेम हो गया, और फिर विवाह भी। उन दोनों के दो पुत्र हुए, थेमबेकिले और मकगाथो, और एक पुत्री, मकाज़िवे।

नेल्सन उन सभाओं में जाने लगा, जहाँ लोग अश्वेत लोगों के प्रति गोरों के भेदभाव पूर्ण व्यवहार पर अपना रोष प्रकट करते थे। ये लोग, जिनमें कुछ अश्वेत थे और कुछ गोरे भी, अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (ए एन सी) नामक संस्था के सदस्य थे। वे सब एकजुट होकर अश्वेत लोगों का दमन कर उन्हें गरीबी, अशिक्षा और भय की ओर धकेलने वाले रंगभेदी कानूनों को बदलने की शपथ लेते। हालाँकि ए एन सी के कुछ सदस्य विदेशों से आये गोरों को अपना शत्रु मानते थे, इस विषय में नेल्सन का मत थोड़ा उदारवादी था। उसका मानना था, कि गोरे लोग, व बाहर से आई अन्य जातियां, दक्षिण अफ्रीका में रह तो सकते हैं, लेकिन उनकी तानाशाही समाप्त होनी चाहिए।

नेल्सन का सपना पूरा हुआ, और वह एक वकील बन गया। उसने अपने एक सहयोगी, ओलिवर तम्बो के साथ मिल कर १९५३ में जोहानसबर्ग का क़ानूनी सहायता का पहला ऐसा दफ्तर खोला जिसमें केवल अश्वेत वकील थे। जैसे जैसे राजनीति से नेल्सन का जुड़ाव बढ़ता गया, इवेलिन के साथ उसके वैवाहिक संबंधों में दरार आने लगी, और अंततः वह उसे छोड़ कर चली गई। तलाक के बाद नेल्सन का परिचय एक सुन्दर और ओजस्वी नौजवान सामाजिक कार्यकर्ता विनिफ्रेड नमाज़ामो मडिकिज़ेला से हुआ। जल्दी ही दोनों में प्रेम हो गया, और उन्होंने विवाह कर लिया। उनकी दो पुत्रियां हुईं, जेनी और ज़िन्दजी।

नेल्सन अब विरोध-सभाओं, हड़तालों, और असहयोग आंदोलनों का आयोजन करने लगा था। वह "लिबरेशन" नामक पत्र के लिए लेख लिखता, और "फाइटिंग टॉक" नामक पत्रिका के सञ्चालन में भी सहयोग करने लगा। उसे उम्मीद थी कि इन गतिविधियों के द्वारा बराबरी का हक़ पाने के इस संघर्ष से लोगों का जुड़ाव बढ़ेगा।

नेल्सन ने देखा कि पासबुक का मसला और अधिक गहराता जा रहा था। हर वर्ष लाखों अश्वेत दक्षिण अफ्रिकियों को उचित पासबुक साथ न होने के कारण गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया जाता था। कई बार तो लोगों जो उनके घर के नज़दीक ही गिरफ्तार कर लिया जाता, जबकि उनकी पासबुक घर के अंदर मौजूद होती थी।

१९६० में रंगभेद-विरोधी एक अन्य नेता ने एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। उसने अश्वेत लोगों को प्रोत्साहित किया कि वे जानबूझ कर अपनी पासबुक घर छोड़ आएं, और गिरफ़्तारी दें। जोहानसबर्ग के निकट शार्पविल नगर में लगभग १५००० लोग बिना पासबुक के पुलिस स्टेशन से सामने इकट्ठे हो गए। इन निहत्थे पुरुषों और महिलाओं पर पुलिस ने गोली चला दी, और उनहत्तर लोग मारे गए, जबकि २०० अन्य घायल हुए। इन लोगों के प्रति अपना समर्थन जताने हेतु नेल्सन ने अपनी पासबुक सार्वजनिक रूप से आग के हवाले कर दी।

जल्दी ही नेल्सन मंडेला का नाम बहुतों ने सुना, और अधिकांश गोरे लोग उससे नाराज़ भी थे, और भयभीत भी। नेल्सन के कार्य-कलाप उन्हें बिलकुल अच्छे नहीं लग रहे थे। वे चाहते थे कि अश्वेत लोग उनके वश में रहें, और दक्षिण अफ्रीका में सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहे।

एक रात जब नेल्सन गहरी नींद सो रहा था, चार पुलिसवाले उसके घर में घुस आये, और उसे पकड़ कर जेलखाने ले गए। अपने रंगभेद विरोधी विचारों और गतिविधियों के कारण नेल्सन कई बार जेल गया। लेकिन हर बार वह छूट कर बाहर आ गया। परन्तु अंततः १९६३ में उस पर तोड़-फोड़ की कार्रवाई आयोजित करके बिजलीघरों व अन्य सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने, और गोरी सरकार के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों का आरोप लगा। ये बहुत गंभीर आरोप थे, और इनके साबित होने पर नेल्सन को मृत्युदंड भी मिल सकता था। हालाँकि नेल्सन व अन्य लोगों को दोषी जरूर पाया गया, लेकिन उन्हें मौत की सजा नहीं हुई। अपितु उसे आजीवन कारावास का दंड दिया गया।

रोब्बेन द्वीप नाम की यह जेल केप टाउन के निकट थी। नेल्सन को जिस कोठरी में रखा गया था, उसमें एक छोटी खिड़की थी, जिससे जेल के आँगन का दृश्य दीखता था। कोठरी की लम्बाई मुश्किल से तीन कदम भर थी, और वह इतनी छोटी थी, कि जब वह लेटता तो उसका सर एक दीवार को छूता, और पैर दूसरी दीवार। दीवारें कम से कम दो फ़ीट मोटी थीं। तब वह केवल छियालीस वर्ष का था, और एक राजनीतिक कैदी के रूप में उसे उस कोठरी में अगले सत्ताईस वर्ष तक रहना था।

उसे अपनी पत्नी विनी और दोनों बच्चों की बहुत याद आती थी। उसके कारावास के दौरान विनी को जोहानसबर्ग से बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी, और रात के समय व सप्ताहांत में उसे घर में ही सीमित रखा जाता था। यदि वह रोब्बेन द्वीप जाना चाहती, तो उसे इजाज़त लेनी पड़ती थी। यह एक ९५० मील की यात्रा थी, और इसमें खर्चा भी बहुत आता था। इसलिए, यदि उसे इजाज़त मिल भी जाती, तो उसका बार-बार वहां जाना संभव नहीं था। नेल्सन को हर छह महीने में केवल एक आगंतुक से मिलने, व केवल एक चिट्ठी पाने की इजाज़त थी।

कारावास का जीवन बहुत कठिन था। नेल्सन को चूने की खदान में खुदाई करनी पड़ती थी, या फिर प्रतिदिन घंटों पत्थरों को तोड़ कर गिट्टी बनानी होती थी। चट्टानों से घिरे इलाके में सूर्य की तेज़ रौशनी ने उसकी आँखों को काफी नुकसान पहुँचाया, क्योंकि उसकी धूप के चश्मे की मांग पूरी होते-होते तीन साल लग गए। रोब्बेन द्वीप में किसी भी प्रकार की कोई घड़ियाँ रखने की इजाजत नहीं थी। कैदियों को समय का अनुमान पहरेदारों की सीटियों या आदेशों से ही लगता था।

हालाँकि जेल के अफसरों और पहरेदारों ने नेल्सन की इच्छाशक्ति को तोड़ने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह ऐसा कर न सके। जेल में रह कर भी, वह दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत लोगों की स्वतंत्रता के अपने लक्ष्य के लिए काम करता ही रहा। उसने जेल के अन्यायपूर्ण नियमों का, और कैदियों को मिलने वाले ख़राब भोजन का विरोध किया। कैदियों को अपमानित करने के लिए उन्हें पतलून के बजाय बहुत छोटे नेकर पहनने के लिए बाध्य किया जाता था, जिसका भी उसने विरोध किया, और इस प्रकार वह दूसरे कैदियों के लिए प्रेरणा का एक स्रोत बन गया। जब वह स्वतंत्र था, तो वह एक जननायक था, और जेल में जाकर भी वह नायक बना रहा।

जेल में रहते हुए भी नेल्सन मंडेला ने देश पर अपना प्रभाव डालना जारी रखा। जो गिने-चुने आगंतुक उससे मिलने आते, उसके हौसले, दृढ़ निश्चय और बुद्धिमत्ता से अत्यंत प्रभावित होते। वे सबसे उसके बारे में बातें करते, और उसके नाम और संघर्ष की चर्चा दक्षिण अफ्रिका ही नहीं, सारे विश्व में होने लगी। अनेक देशों की सरकारें, राजनितिक दल, अंतर्राष्ट्रीय संगठन, व साधारण नागरिक, सभी उसकी रिहाई की मांग करने लगे।

सरकार को यह महसूस होने लगा कि मंडेला को अब और बंदी बनाये रखना उनके हित में नहीं है। कई बार उन्होंने उससे बात करके कहा कि उसे छोड़ा जा सकता है, अगर वह देश से बाहर चले जाने का वादा करे। लेकिन हर बार उसने इंकार कर दिया। उसे कैद से आज़ादी केवल अपनी शर्तों पर ही मंजूर थी, वरना वह कारावास में रहने को तैयार था।

अब तक रंगभेद की नीति की देश और विदेश में तीव्र भर्त्सना शुरू हो गई थी। दक्षिण अफ्रीका के लोग लगातार इसके विरुद्ध प्रदर्शन करते रहते थे, और हिंसा भी भड़क उठती थी। अन्य देशों ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए, और उससे कोई भी सामान खरीदने या बेचने पर रोक लगा दी। रंगभेद नीति की इमारत अब ढहने को तैयार थी।

अंततः दक्षिण अफ्रीकी सरकार को महसूस होने लगा कि उनके पास नेल्सन को रिहा करने के आलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। देश के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति विलियम डी क्लर्क ने १९९० में नेल्सन मंडेला को बिना शर्त रिहा कर दिया।

सत्ताईस वर्षों के लम्बे और कटुतापूर्ण अंतराल के बाद आखिर अब मंडेला एक स्वतंत्र व्यक्ति थे। उस सुहावने दिन उसने फिर उन शब्दों को दोहराया जो उसने अपने मुक़दमे के दौरान कहे थे, "मैं अपनी आँखों में उस आदर्श लोकतान्त्रिक और स्वतंत्र समाज का सपना संजोये हूँ, जिसमे सभी नागरिक सौहार्दपूर्वक साथ रहेंगे, और सभी को समान अवसर उपलब्ध होंगे। यह एक ऐसा आदर्श है, जिसके लिए ही मैं जीवित हूँ, और जिसे पाने की आशा रखता हूँ। लेकिन, यदि आवश्यकता हुई, तो इस आदर्श के लिए मैं प्राण देने को भी तैयार हूँ।"

मंडेला अपनी सरकार और लोगों को यह दिखाना चाहते थे कि इतने साल जेल में रहने के बाद भी वो टूटे और झुके नहीं थे और वो अपने देश और लोगों की भलाई के लिए काम करना चाहते थे - खासकर समानता और गोरे और अश्वेत लोगों के बीच सौहार्द के लिए.

रिहाई के बाद नेल्सन और राष्ट्रपति डी क्लर्क दोनों को गोरों और अश्वेतों को साथ लाने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। १९९४ में देश में पहला ऐसा स्वतंत्र चुनाव हुआ, जिसमें अंततः दक्षिण अफ्रीका की सभी जातियों को भाग लेने की अनुमति थी। उन्होंने नेल्सन मंडेला को अपने इस नए लोकतान्त्रिक देश का राष्ट्रपति चुना, और वह दक्षिण अफ्रीका के सर्वप्रथम निर्वाचित अश्वेत राष्ट्राध्यक्ष बने। बहुत से गोरे दक्षिण अफ्रीकी आशंकित थे कि शायद वह उनके साथ शत्रुओं का सा व्यवहार करें, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं हुआ। मंडेला न तो उन्हें देश से निकलना चाहते थे, और न ही उनको अपमानित या पीड़ित करना चाहते थे, जैसा कि गोरों ने अश्वेतों के साथ किया था। बल्कि मंडेला ने एक

पनाई, जहाँ प्रत्येक जाति के स्त्री, पुरुष और बच्चे शांति और सौहार्द के साथ मिल कर रहें।

१९९९ में जब उन्होंने अपने पद से अवकाश लिया, तो वह अपने बचपन के निवास स्थान कुनू को चले गए। अपने बीते जीवन पर दृष्टि डाल कर उन्होंने कहा था, "स्वतंत्रता की ओर ले जाने वाली एक लम्बी राह पर मैं चला हूँ।" उन्होंने बड़े हौसले और दृढ़ निश्चय के साथ अपने हज़ारों गोरे और अश्वेत देशवासियों की ओर अपना हाथ बढ़ा कर उन्हें अपने साथ आने का न्योता दिया था।