Fair award story in Hindi

दो व्यक्ति एक-दूसरे के पड़ोसी हैं, एक व्यक्ति अच्छा और दयालु है, दूसरा कंजूस और लालची. एक दिन जब अच्छे, दयाल व्यक्ति को एक चिड़िया मिलती है, जिसका पँख टूट गया है। तो तुम्हें क्या लगता है कि क्या हुआ होगा? वह पक्षी की देखभाल करता है। उसै पानी पिलाता है, कीड़े खिलाता है. पक्षी ठीक हो जाता है।

तुम ने मेरे लिए किया है उसके लिए मैं तुम्हें उचित पुरस्कार देना चाहता हूँ।” पक्षी उसे एक छोटा बीज देता है। “इसे धरती में बो देना,” पर पक्षी यह नहीं बताता कि क्या होगा।

उस बीज से एक जादुई बेल उगती है जिस पर बड़े-बड़े, मीठे तरबूज़ लगते हैं। उनके भीतर उसका उचित पुरस्कार है। अब कंजूस, लालची आदमी ईर्षा से जलने लगता है।

फिर क्या होता है, यही इस कहानी में रोचक ढंग से बताया गया है।वसंत ऋतु की एक उज्ज्वल सुबह वह दोनों नदी किनारे रास्ते पर टहलते हुए जा रहे थे। वहाँ एक पुराने पेड़ के नीचे एक छोटी चिड़िया उन्हें दिखाई दी, जिसके एक पख टूटा हुआ था। अच्छे, दयाल आदमी ने नीचे झुक कर उस पक्षी को उठा लिया। "ओह, बेचारा नन्हा पक्षी,” उसने कोमलता से कहा। “तुम्हारा तो एक पख टूट गया है।”

“तुम इसके लिए अपना समय क्यों व्यर्थ गंवा रहे हो?” उसके पड़ोसी ने उसका तिरस्कार करते हुए कहा।

“यह पक्षी घायल है। मैं इसे घर ले जाऊँगा और इसको स्वस्थ करने का प्रयास करूँगा।”

"ओह, तुम हमेशा से ही ऐसे मूर्ख रहे हो,” कंजूस, लालची व्यक्ति उसका मज़ाक उड़ाते हुए बोला।

अच्छे, दयालु आदमी ने पड़ोसी की बात की ओर ध्यान न दिया। वह पक्षी को घर ले आया। हर दिन उसने पक्षी को पानी पिलाया, खाने के लिए कीड़े—मकोड़े ला कर दिये। पक्षी का स्वास्थ्य सुधरता गया, सुधरता गया और एक दिन उसका पंख बिलकुल ठीक हो गया।

फिर वह पक्षी को अपने बगीचे में ले आयो, उसे अपनी हथेली पर बैठा लिया और बोला, ''नन्हे पक्षी, तुम्हारा पॅंख ठीक हो गया है। अब तुम उड़ कर अपने घर जा सकते हो।'' पक्षी उस व्यक्ति की ओर घूमा, उसने अपनी चोंच खोली और उससे कहा (उसने वैसे ही बात की जैसे मैं तुम से कर रहा हूॅं), ''जो कुछ तुम ने मेरे लिए किया है और तुम्हारी उदारता के लिए मै तुम्हें उचित पुरस्कार देना चाहता हूॅं।'' नन्हे पक्षी ने उस आदमी की ह​थेली पर एक नन्हा बीच रख दिया। ''इस बीज को अपने बगीचे में लगा देना और तुम्हें तुम्हारा उचित पुरस्कार मिल जायेगा।'' इतना कह कर पक्षी उड़ कर दूर नीले आकाश में चला गया।

अच्छे, दयालु आदमी ने वह बीज ज़मीन में बो दयिा। सारी वसंत ऋतु और ग्रीष्म काल में उसने उसे पानी दिया, जमीन की गुड़ाई की और घासपात को उखाड़ निकाला। आखिरकार उस नन्हे बीज से तरतूजों की एक विशाल बेल उपजी। बेल यहॉं—वहॉं धूमती हुई सारे बगीचे में फैल गई। और बड़े—बड़े गोल—गोल रसीले तरबूज उस पर निकल आए।

शरद पूर्णिमा का चॉंद जब आकाश में चमक रहा था, किसान अपने तरबूज तोड़ने लगा। उसने पहला तरबूज बेल से तोड़ा और फटाक! चमकते हुए चॉंदी के सिक्के फूट कर बाहर आए। उसने दूसरा तरबूज़ तोड़ा और फटाक! चमकते हुए सोन के सिक्के फूट कर बाहर आए। उसने तीसरा तरबूज तोड़ा और फाटक! बहुमुल्य चमकते हुए मोती फूट कर बाहर आए। जितने भी तरबूज उसने तोड़े, फटाक! फटाक! फटाक! हीरे, जवाहिर, माणिक बाहर आए। उसने जितनी कल्पना की थी उससे कहीं अधिक धन उसे मिल गया। अब वह एक धनी व्यक्ति था—संसार के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक।

अपने स्वभाव के अनुरूप अच्छा, दयालु आदमी आपेन सौभाग्य का समाचार अपने पड़ोसी को बताना चाहता था। ''ओह, यह तो अति उत्तम बात है,'' कंजूस, लालची आदमी बड़बड़ाया। ''मै तुम्हारे लिए बहुत प्रसन्न् हूॅं,'' वह मुस्कराया, परंतु उसकी मुस्कराहट दबी—दबी थी। लेकिन हमें पता ळै, क्यों पता है न, कि कंजूस, लालची पड़ोसी सच में ऐसा महसूस न कर रहा था। नही, वह तो द्वेष और ईर्षा के वशीभूत हो गया था।

मैं क्यों धनी नहीं बन पाया? उसने अपने आप से कहा। मुझे क्यों अपना पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए? मैं जानता हूॅं कि मैं क्या करूॅंगा, मैं भी टूटै हुए पॅंख वाले एक पक्षी की तलाश करूॅंगा। मैं उसकी देखभाल करूॅंगा। और फिर मुझे अपना पुरस्कार मिलेगा।

कंजूस, लालची आदमी नदी किनारे वाले रास्ते की ओर दौड़ा आया। उस रास्ते पर वह ऊपर—नीचे, ऊपर—नीचे चलने लगा और टूटे हुए पॅंख वाला पक्षी ढूॅढ़ने लगा। लेकिन उसे ऐसा कोई पक्षी न मिला। अगले दिन वह फिर उस रास्ते पर आया और ऊपर—नीचे चला, परंतु उसे कोई पक्षी न मिला।

आखिकार, तीसरे दिन वह अपना र्धर्य खो बैठा। उसने अपनी जेब से एक गुलेल निकाली। व्हाप! एक पेड़ पर बैठी एक चिड़िया को उसने मार गिराया।

वह नीचे झुका और बेदर्दी से उस पक्षी को उठा लिया। ''अह, बेचारी चिड़िया,'' उसने ऐसा कहा कि जैसे उसे पक्षी की परवाह थी। ''कितना बुरा हुआ। तुम्हारा पॅंख टूट गया। लेकिन मैं तुम्हें बताता हूॅं कि मैं क्या करूॅंगा। पॅंख ठीक होने तक मैं तुम्हारी देखभाल करूॅंगा।''

तुम बस इतना ​निश्चित कर देना कि मुझे मेरा पुरस्कार मिल जाए।''

उस कंजूस, लालची आदमी ने वही किया जो उसने कहा था। वह घायल पक्षी को अपने घर ले आया। हर दिन वह उसके लिए पानी और कीड़े लाता। और हर दिन वह चिड़िया को याद दिलाता, ''जो कुछ मैं तुम्हारे लिए कर रहा हूॅं उसे भूलना नहीं और मुझे पुरस्कार देना भ्ज्ञी न भूलना।''

जब पक्षी का पॅंख ठीक हो गया तो किसन उसे अपने बगीचे में ले आया, उसे मज़बूती से पकड़े रखा और कहा, ''तो पक्षी अब तुम पूरी तरह स्वस्थ हो गए हो। तुम जा सकते हो। लेकिन जाने से पहले अच्छा होगा कि तुम मुझे मेरा पुरस्कार दे दो।'' पक्षी उस व्यक्ति की ओर घूमा, उसने अपनी चोंच खोली और उससे कहा (उसने वैसे ही बात की जैसे मैं तुम से कर रहा हूॅं), ''हॉं जो कुछ तुम ने किया औश्र जैसा व्यवहार तुम ने मेरे साथ किया, उसके लिए मैं चाहता हूॅं कि उचित पुरस्​कार तुम्हें मिले।''

नन्हे पक्षी ने कंजूस, लालची आदमी की हथेली पर एक नन्हा बीज रखा दिया और कहा, ''इस बीज को अपने बगीचे में लगा दो औश्र तुम्हें तुम्हारा पुरस्कार मिल जायेगा।'' फिर जितनी जल्दी वह उड़ सकता था उतनी जल्दी उड़ कर वह चला गया। 

कंजूस, लालची आदमी आपने बगीचे की ओर भागा औश्र उस बीज को जमीन में उसने बो दिया। सारी वसंत ऋतु और ग्रीष्म काल में उसने ज़मीन की गुड़ाई की, पानी दिया और घासपात को उखाड़ निकाला। उसने इतनी मेहनत की जितनी सारे जीवन में कभी न की थी। नन्हे बीज से तरबूजों की एक विशाल बेल निकली।

लेकिन यह बेल घूमती हुई उसके बगीचे में यहॉं—वहॉं न फैली। नहीं, बेल जमीन से निकल कर सीधी आकाश की ओर बढ़ने लगी। और सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि उस पर एक भी तरबूज़ न लगा था। इसका क्या अर्थ है? वह सोचने लगा। मेरे तरबूज कहॉं? मेरा पुरस्कार कहॉं है?

सारे ग्रीष्म काल में वह बेल ऊॅंची होती गई। ऊॅंची, और ऊॅंची, और भी ऊॅंची और शरद पूर्णिमा की रात आने तक इतनी ऊॅंची हो गई थी कि वह शीतल, निर्जन चॉंद को छूने लगी।

जब कंजूस, लालची व्यक्ति ने यह देखा तो वह चिल्लाया, ''अहा! मैं समझ गया। मैं समझ गया। चॉंद का सारा धन मेरा है, मेरा है। हा, हा, हा!'' वह अपनी छाती थपथपाने लगा। वह खुशी से उछलने लगा। वह चिल्लाने और हॉंसने लगा। ''हा, हा, हा! चॉंद की ससरा धन मेरा है। मेरा है मेरा है मेरा है, मैं धनी हूॅं। धनी, धनी, धनी, अपने मूर्ख पड़ोसी से अधिक धनी हूॅं।''

फिर वह कूद कर बेल पर चढ़ गया। वह ऊपर चढ़ने लगा और वह चढ़ता गया और वह चढ़ता गया और चढ़ता गया और वह चढ़ता गया और उस संपत्ति की कल्पना करता रहा जो शीघ्र ही उसकी होने वाली थी। ​बहुमुल्य रत्न, सोना चॉंदी। सब मेरा होगा। मेरा होगा, मेरा होगा। 

वह ऊपर चढ़ता गया और चढ़ता गया और चढ़ता गया, फिर औश्र ऊपर चढ़ा और आखिरकार वह शीतल, निर्जन चॉंद तक पहुॅंच गया। एक लंबी छलांग लगा कर वह चॉंद पर उतर गया औश्र उसी पल वह बेल सूख कर लुप्त हो गई। अब उसके पास चॉंद से धरती पर वापस आने का कोई उपाय न था।

बिन बादल वाली किसी रात में बाहर जाकर अगर तुम ध्यान से देखने का प्रयास करोगे तो संभव है वह कंजूस, लालची आदमी तुम्हें चॉंद पर दिखाई दे जाये, क्योकि......वह अभी भी वहीं पर है।