Essay on the national language In Hindi

भारत एक महान एवं विशाल देश है। इसमें अनेक राज्य हैं। विभिन्न राज्यों की भाषाएँ हैं-बंगाल की बँगला, असम की असमिया, उड़ीसा की उड़िया, महाराष्ट की पर केरल की मलयालम, आंध्र की तेलुगू, कर्नाटक की कन्नड़ इत्यादि। किंतु, जो भाषा संपूर्ण राष्ट र एक स्नेह-सूत्र में बाँधती है, वह हिंदी ही है।

हिंदी अंगरेजों के शासनकाल में भी राष्ट्रभाषा थी-भले ही इसे राष्ट्रभाषा की मान्यता न मिली हो। अंगरेजी शासन को जिस प्रकार हमने सात समुंदर पार भेजा, उसी प्रकार उनकी भाषा-दासता की निशानी-अँगरेजी को भी बाहर करना आवश्यक था। संसार के जितने भी स्वाधीन राष्ट्र हैं, उनकी अपनी राष्ट्रभाषा है; जैसे-रूस की रूसी, फ्रांस की फ्रेंच, जापान की जापानी, चीन की चीनी। इसलिए जब भारतवर्ष स्वाधीन हो गया, तब इसकी भी अपनी राष्ट्रभाषा आवश्यक थी। यह संयोग और सौभाग्य हिंदी को प्राप्त हुआ।

हिंदी राष्ट्रभाषा हो—इसके पक्ष में अनेक तथ्य हैं। जिस तरह, जनतांत्रिक-राजनीतिक दृष्टि से बहुसंख्यक पक्ष का महत्त्व होता है, उसी प्रकार जिस भाषा के बोलनेवाले सबसे अधिक हैं, उसका महत्त्व अन्य भाषाओं की तुलना में सबसे अधिक हो जाता है। भारतवर्ष में हिंदी बोलनेवालों

और समझनेवाले देश के एक कोने से दूसरे कोने तक फैले हुए हैं। देश के अधिकांश लोग हिंदी के माध्यम से विचार-विनिमय करते हैं। वाणिज्य, व्यापार, तीर्थाटन इत्यादि सब हिंदी के द्वारा संपन्न होते हैं। भारत के उत्तरी क्षेत्र का व्यक्ति जब सुदूर दक्षिण में रामेश्वरम पहुँचता है, तो वह अगरजा की शरण नहीं लेता। उसका सारा काम हिंदी से चल जाता है। वहाँ के पंडे हिंदी में अच्छा बोल लत हैं। वहाँ के कुलीन भी तमिल में बातें न कर, हिंदी में बातें करते हैं। भारत के जिस कोने में जाना हो, हिंदी जानने से काम चल सकता है, किंतु केवल बांग्ला. तमिल या तेलुगू जानकर पा चलाना संभव नहीं है। भारतवर्ष के बाहर भी श्रीलंका, अंडमान-निकोबार, वेस्ट इंडीज, म्या ब्रिटिश गायना, अफ्रीका, मॉरीशस इत्यादि देशों में हिंदी की सहायता से काम चल सक भारतवर्ष की एकमात्र भाषा हिंदी ही है, जिसका प्रचार भारत की सीमा के बाहर भी है।

दूसरी बात है, यह भाषा अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना से सरल है। इसकी लिपि वैज्ञानिक तथा सुगम है। हिंदी की देवनागरी लिपि जानकर हम मराठी और नेपाली भी पढ़ ले सकते है। संस्कृत की सारी परंपरा औश्र विरासत को इमने अपने में आयत किया है। तीसरी बात है कि वह सारे भारत की - हिंन्द की भाषा है, किसी स्थानविशेष की नही। हिंद से हिंदी बनी है- बंगाल से बांग्ला या असम से असमिया की तरह इसमें स्थनीय रंग नही है।

हिंदी जब भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा मान ली गयी, तब मुट्ठीभर राजनीतिक स्वार्थियों ने कहना किया कि हिंदी को महत्त्व देने से अन्य भारतीय भाषाएँ उपेक्षित हो जाती हैं; हिंदी को भाषा मानने से 'हिंदी-साम्राज्यवाद' का बोलबाला हो जायगा। जो नेता हिंदी का व्यवहार न के कारण लोगों को जेल भिजवाते थे, वे ही आज हिंदी के विरोध में इंडा उठा रहे हैं। किंतु, उन्हें यह समझना चाहिए कि हमारे राष्ट्र-निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर, स्वार्थ का चश्मा लगाये बिना, हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया था। महात्मा गाँधी ने कहा था- “अगर हम भारत को राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो हिंदी ही हमारी राष्ट्रभाषा हो सकती है। अँगरेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है, लेकिन वह हमारी राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती।” नेताजी सुभाषचंद्र बोस का कहना था— “प्रांतीय ईर्ष्या-द्वेष दूर करने में जितनी सहायता हिंदी-प्रचार से मिलेगी, उतनी दूसरी किसी चीज से नहीं मिल सकती। यदि हमलोगों ने तन-मन-धन से प्रयत्न किया, तो वह दिन दूर नहीं, जब भारत स्वाधीन होगा और उसकी राष्ट्रभाषा होगी हिंदी।”

अतः, देश को एक सूत्र में बाँधने के लिए तथा संसार के समक्ष अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए केवल हिंदी ही राष्ट्रभाषा हो सकती है। हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' कहने से कुछ लोगों को कष्ट होता है इसलिए इसे संघभाषा, संपर्क-भाषा, व्यवहार-भाषा, संबंध-भाषा इत्यादि नामों से अभिहित किया जाता है। किंतु घूमकर नाक छूने की आवश्यकता नहीं। भाषा-व्यवहार के प्रादेशिक, अंतःप्रादेशिक, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों में प्रथम स्थान प्रादेशिक भाषाओं का होगा और शष तीन क्षेत्रों में हिंदी रहेगी। इसका अर्थ है कि हिंदी कभी प्रादेशिक भाषाओं का स्थान नहीं ले रही 8-हा, जिन क्षेत्रों में अँगरेजी का आधिपत्य रहा, उन क्षेत्रों में हिंदी आसन ग्रहण करेगी।

याद हम समग्र भारतवर्ष की एकसूत्रता को ध्यान में रखें, तो राष्ट्रभाषा हिंदी के मार्ग में न डालना अनुचित ही नहीं, देशद्रोह होगा, इसमें संदेह नहीं। वह दिन दूर नहीं, जब राष्ट्रभाषा हिंदी के मार्ग के सारे कंटक दूर हो जायेंगे।