(essay on election in hindi )

चुनाव गणतंत्रीय शासन-प्रणाली की एक प्रमुख विशेषता है। जिस देश में तानाशाही शासन होता है, उस देश में अपना मत देने का अधिकार ही नहीं होता। तानाशाह की इच्छा ही सब-कछ होती है। उसमें जनता के विचार का कोई महत्त्व नहीं होता।

- अब्राहम लिंकन ने गणतंत्र की परिभाषा इस प्रकार की है— 'गणतंत्र जनता के द्वारा जनता के लिए जनता का राज्य है। अतः, गणतंत्र में यह आवश्यक है कि देश के शासन का संचालन वहाँ की जनता की इच्छा पर हो। इसके लिए निर्वाचन की पद्धति अपनायी जाती है। आज विधानसभा हो या लोकसभा, सभी के लिए प्रत्याशियों का चुनाव एकमात्र मार्ग है।

वर्तमान काल में सभी गणतांत्रिक राज्यों ने वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है। इस सिद्धांत के अनुसार देश के सभी वयस्क-चाहे वे स्त्री हो या पुरुष, धनी हों या निर्धन-मत देने के अधिकारी हैं। हाँ, संसार में आज भी कुछ देश ऐसे हैं जहाँ स्त्रियों को मत देने का अधिकार नहीं है।

हर देश ने मताधिकार-योग्य वयस्कता की एक ही उम्र नहीं मानी है। विश्व के अधिकांश देशों में मताधिकार की अवस्था 18 वर्ष है; परंतु आस्ट्रिया, क्यूबा, ब्राजील तथा निकारागुआ में यह अवस्था 16 वर्ष; अफ्रीका, फिजी तथा ओमान में 21 वर्ष और उजबेकिस्तान में 25 वर्ष है। सभी देशों में पागलों और भीषण अपराधियों को वोट देने का अधिकार नहीं होता।

मतदान मुख्यतः दो प्रकार का होता है—(1) प्रत्यक्ष, और (2) अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष मतदान में मतदाता स्वयं मत देकर अपना प्रतिनिधि चुनता है। विधानसभाओं और लोकसभाओं के प्रतिनिधियों का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान-पद्धति से होता है। अप्रत्यक्ष मतदान में सर्वप्रथम मतदाता अपने प्रतिनिधियों को चुनता है। ये चुने हुए प्रतिनिधि पुनः अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं। इस प्रकार, अप्रत्यक्ष मतदान में दो बार चुनाव होता है। भारत में राष्ट्रपति का चुनाव इसी अप्रत्यक्ष मतदान-पद्धति से होता है।

। हमारा देश 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ। 26 जनवरी 1950 को यहाँ संपूर्णप्रभुत्वसपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य की घोषणा की गयी। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात पहला आमचुनाव 1974 में हुआ। प्रत्येक राज्य में लगभग 75 हजार की जनंसख्या पर विधानसभाओं के लिए सदस्य गये तथा लगभग 5 लाख की आबादी पर संसद के लिए सदस्य चुने गये। विधानसभाआम दल का बहुमत हुआ, उसने अपने नेता, अर्थात मुख्यमंत्री का चुनाव किया। इसी तरह, तर जिस दल का बहुमत हुआ उसने अपने दल का प्रधानमंत्री चुना।

तब से हमारे देश में कई पंचवर्षीय आम चुनाव हुए। कई राज्यों में राष्ट्रपतिशासमध्यावधि चुनाव भी हुए। संसार के महान गणतंत्रात्मक देशों में दो या तीन पाटिया ही है, किंतु आज हमारे देश में पार्टियों की संख्या चालीस से ऊपर है। चुनाव के समय तो पार्टियाँ गोबरछत्ते की तरह जन्म लेती है।

यटि हम अपने देश के चुनाव पर ध्यान दें, तो इस पद्धति के प्रति घृणा हो जाती है। जिनके से और लाठियाँ हैं, उनसे इस चुनाव-युद्ध में जीतना बड़ा कठिन हो जाता है। चुनाव के पर वोट झीटने के लिए तरह-तरह के हथकंडे काम में लाये जाते हैं। उम्मीदवार मतदाताओं की भावनाओं को उभारकर वोट ऐंठना चाहते हैं। जाति-संप्रदाय की भावना को उभारकर तरह-तरह की गंदगी फैलायी जाती है। यदि इनसे भी काम न चला, तो जोर-जुल्म से मतदाताओं को मतदान केंद्र में प्रवेश न करने देकर तथा पीठासीन पदाधिकारियों को डरा-धमकाकर जबर्दस्ती मतदान अपने पक्ष में करा लेते हैं। आज इसी तरह के विजेता शासन-सूत्र अपने हाथ लेकर देश में अन्याय का नग्न नृत्य कर रहे हैं। उर्दू के महाकवि इकबाल ने लिखा है 

जमहूरियत वह तर्जे हुकूमत है कि जिसमें
बंदों को गिना करते हैं, तौला नहीं करते।

प्रजातंत्र में हर मनुष्य का मोल बराबर है- चाहे वह पंडित हो या मूर्ख, विचारवान हो या विचारशून्य, पैसे पर बिकनेवाला हो या पूरा ईमानदार। इसमें केवल माथा गिन लिया जाता है। किंतु, आज यह भी स्थिति नहीं रह गयी है। प्रत्येक माथा गिनने की भी जरूरत समाप्त हो रही है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, “चुनाव जनता को राजनीतिक शिक्षा देने का विश्वविद्यालय है।” यदि आज की चुनाव-लीला कोई देखे, तो ज्ञात होगा कि चुनाव मनुष्य को पशु बनाने की रसायनशाला है। यदि यही स्थिति रही, तो और देशों की बात नहीं जानता, लेकिन भारत में गणतंत्र का भविष्य अवश्य अंधकारमय है।