हम से तात्पर्य : 'हम' से तात्पर्य परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व से है, जिनके बीच हम निवास करते हैं। प्रकारान्तर में धरती पर निवास करने वाले समस्त मानव समाज के हम अभिन्न अंग हैं, उससे हम पूर्णरूपेण जुड़े हुए हैं ।

धरती का अर्थ: धरती का अर्थ है धारण करने वाली, जो समस्त सष्टि का भार स्वयं अपन शरीर पर उठाए हुए हैं । हम अपने जन्म से मृत्युपर्यन्त, आजीवन उसी की गोद में पलते एवं फलते-फूलते हैं। उसी से अन्न, जल, वस्त्र, आवास तथा अन्य जीवनोपयोगी सामग्रियाँ प्राप्त करते हैं। धरती हमारी माँ के सदृश है। धरती से हमारा अनन्याश्रय सम्बन्ध है। वस्तुतः हमारा अस्तित्व ही धरती पर आश्रित है।

हम और धरती - दोनों में सम्बन्ध : हम धरती से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। जैसा कि उपरोक्त पंक्तियों में उल्लेखित है हम धरती माँ की गोद में पालन-पोषण पाकर समृद्धि के शिखर पर पहुँचते हैं। हमारा धरती से संबंध माँ-बेटा का है। धरती के बिना सष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। धरती ने हमें प्रकृति की अमूल्य निधि प्रदान की है। आज मानव जो सभ्यता के चरमोत्कर्ष पर है वह धरती की ही देन है। यदि धरती नहीं होती तो हम निवास कहाँ करते।

प्राकृतिक सुन्दरता, धन-सम्पन्नता और सभ्यता के विकास में सहायक : धरती हमें सब कछ प्रदान करती है। प्राकतिक सषमा तथा प्रकृति प्रदत्त उपादान एवं उपहार धरती की ही देन है। धरती रत्नगर्भा है। इसके अन्तर में रत्नों एवं बहुमूल्य सम्पदा का विशाल भंडार है । सम्पूर्ण विश्व के मानव को यह धन-धान्य से समृद्ध करती है । सृष्टि के प्रारम्भ से मानव-मात्र के विकास एवं सम्पन्नता में यह निरन्तर सहयोग प्रदान कर रही है। आदिम युग (पूर्व पाषाण काल) से आजतक सभ्यता एवं संस्कृति के विकास का इतिहास इसी धरती की देन है। असभ्य अवस्था से आधुनिक विकास की मंजिल तय करते हुए विज्ञान के चमत्कार से जीवन शैली में अभूतपूर्व बदलाव धरती माँ की अनुकंपा से ही संभव हो पाया। आज विज्ञान की विलक्षण उपलब्धि से हमने सम्पूर्ण विश्व को एक स्थान पर एकत्रित कर दिया है। विश्व के किसी कोने में अल्प समय में पहुँचना, पल में दूरभाष यंत्र द्वारा बातें करना, दूरदर्शन पर घर बैठे संसार की घटनाओं तथा वहाँ की संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान आदि से रूबरू होना सभ्यता, संस्कृति एवं विज्ञान के विकास के उदाहरण हैं।

निष्कर्ष : इस प्रकार धरती हमारी जननी के समान है और हमारी सम्पूर्ण गतिविधियाँ उसके ही द्वारा, उसी के कारण संचालित है। अतः हमें भी उसका समुचित सम्मान करना चाहिए तथा उसे प्रदूषित नहीं करना चाहिए ।