Speaking letters story in hindi

रियासत मोनागढ़ का दीवान था वीरसिंह। वीरसिंह देखने में सज्जन लगता था, पर था बड़ा चतुर और स्वार्थी । उसे अपनी धुर्वता पर घमंड भी बहुत था। राजा का विश्वासपात्र होने के कारण वह अपने आप को रियासत का स्वामी ही समझता था। एक दिन वीरसिंह अपने उपवन में बैठा  धूप सेंक रहा था कि सेवक ने उसे एक पत्र लाकर दिया। पत्र पढ़कर वीरसिंह मन ही मन तुन—तुना उठा, 'इन संबंधियों ने तो जीना ही हराम कर दिया है। कभी चाचा, कभी मामा अैर आपज ये बुआजी आ टपकी।'

वीरसिंह ने वह पत्र मसल कर फेंक दिया और सेवक से बोला, 'बुला ले उसे भी अंदर।' कुछ ही क्षणों में एक प्रौढ़ महिला वीरसिंह के सामने आई। घमंडी दीवान वीरसिंह ने न तो अभिवादन का उत्तर दिया और न ही उसे बैठने के लिये कहा। तब खड़े—खड़े ही वह महिला बोली, 'दीवान साहब। मेरा बेटा रामधन अपनी पढ़ाई पूरी कर चुका है। वह परिश्रमी और ईमानदार भी है।' वीरसिंह उतावली में उसकी बात काट कर बोला, 'बुआजी। आप रामधन के विषय में क्या कहना चाहती है?'

'दीवान जी। आपकी रियासत में एक खजांची का स्थान खाली हुआ है। मैं उसी के कलए कहने आई हूं। मैं उसी के लिए कहने आई हूं। आप चाहे तो रामधन को यह नौकरी मिल सकती है।' वीरसिंह ने चिड़चिड़ा कर उत्तर दिया, 'मेरे चाहने से क्या होता है बुआजी। खजांची के पद के लिए तो अत्यन्त याग्य व्यक्ति चुना जाएगा।'

बुआजी ने रामधन का प्रार्थनापत्र वीरसिंह को देते हुए कहा, 'मै सिफारिश करने के लिए नहीं आई हूं। आप रामधन की याग्यता की परीक्षा करके ही उसे नौकरी देना।' बुआजी प्रार्थनापत्र देकर चली गई। दीवान वीरसिंह ने प्रार्थना पत्र पढ़ा। फिर उसने दुकड़े—टुकड़े करके फेंक दिया। वीरसिंह प्रार्थनापत्र को फाड़ कर धम्म से फिर अपनी कुर्सीं पर बैठ गया। तभी उसे अपने अतीत की यादें आने लगीं। वीरसिंह बचपन में ही अनाथ हो गया था। उसके चाचा ने उसके परिवार की सारी सम्पत्ति हड़पर ली थी। 

उन दिनों बालक वीरसिंह भूखा प्यासा इधर—उधर भटकता रहता था। तभी यह बुआजी ने बड़े स्नेह से वीरसिंह का पालन पोषण किया और उसे पढ़ाया—लिखाया। 

यह सब सोचते—सोचते वीरसिंह की आंखे नम हो गई। उसे लगा जैसे बुआजी उसे फटकार कर कह रही है, 'क्यो रे वीरू। मेरे प्यार दुलार वह सेवा का तू ने यह फल दिया है। यदि मैने इतनी लगन व प्यास से तुझे पढ़ाया—लिखाया न होता, तो क्या आज तू इस दीवान पद पर पहुंच पाता?'

वीरसिंह का मन उसे ध्क्किारने लगा कि ऐसी ईमानदार बुआजी को उसने प्रणाम तक नहीं किया। उन्हें बैठने तक को नहीं कहां 

कुछ सोचकर वीरसिंह ने बुआजी द्वारा दिए गये प्रार्थनापत्र के टुकड़ों को इकट्ठा किया। फिर उसने बैंठे—बैठे वैसे ही अक्षरों में प्रार्थनापत्र खिा। तब खजान के दरोगा को बुलाकर कहा, 'खजांची के पर के लिये एक उम्मदीवार का यह प्राथना पत्र आया है इसकी याग्यता की जांच ठीक से कर लेना। यह व्यक्ति मेरा संबंधी भी है। इस बात का ध्यन रखना।' यह कहते हुए उसने प्रार्थनापत्र दरोगा के हाथ में दे दियां। 

एक सप्ताह के बाद बुआजी फिर वीरसिंह सं मिलने आई। वीरसिंह ने उन्हें आदर के साथ बैठाकर पूछा, 'बुआजी। आपके लाये प्रार्थनापत्र का क्या परिणाम निकल?' बुूआजी बोली, 'होना क्या था? मेरा बेटा रामधन जांच परीक्षा में प्रथम आया था। फिर भी खजांची का पद दूसरे व्यक्ति को दे दिया गया। बस, मैं तुमसे यही कहने आई थी।' बुआजी इतना कह कर वहां से चली गई। 

दीवान वीरसिंह का सिर चकरा गया। उसने खजाने के दोगा को बुलाकर मन की बात पूछी। दरोगा ने बताया, 'रामधन निश्चय ही' बहुत याग्य तथा होनहार युवक है। वह जांच परीक्षा में भी प्रथम आया था। पर मुझे विवश हाकर ही खजांची का पद दूसरे, व्यक्ति को देना पड़ गया।' दीवान वीरसिंह क्रोध से चिल्ला उठा, 'कैसी विवश्ता थी वह?'

दरोगा विनम्रतापूर्वक बोला, 'आपका ही आदेश था कि अम्मीदवार की लिखावट की जांच विशेषज्ञों से करा ली जाए। उसी के आधर पर उसके चरित्र का मूल्यांकन किया जाए।' 

दीवा ​वीरसिंह छटपटा कर बोला, 'तो इसमें क्या हुआ?' दरोगा ने उत्तर दिया, 'श्रिमान रामधन के प्रार्थना पत्र के अक्षरों की जांच से यह रिपोर्ट मिली है कि उन अक्षरों को लिखने वाला व्यक्ति चतुर व योग्य होते हुए भी धूर्त, बेईमान तथा स्वार्थी होना चाहिए। यह व्यक्ति चोर भी हो सकता हे औश्र षड्यंत्रकारी भी।'

दरोगा की यह बात सुनकर दीवान वीरसिंह सन्नाटे में आ गया। उस का सिर चकराने लगा। क्योंकि रामधन के फाड़े हुए उस प्रार्थनापत्र की नकल तो दीवान ने अपने हाथ से ही की थी। असंल में वे अक्ष्ज्ञर तो स्वयं उसी के थे। अगले ही दिन दीवान वीरसिंह राजा के साामने पहुंचा। वह अपना त्यागपत्र महाराज को देकर बोला, 'महाराज। मैं दीवान पद के याग्य नहीं हूं। आप चाहे तो मेरे छोटे भाई रामधन को इस सेवा के लिए रख सकते है। रामधन मुझसे अधिक योग्य तथा ईमान दा है।'

राजा कुछ भी न समझ सके। उन्होंने दीवान से पूरी बात मालूम की। तब हंसते हुए बोला, 'दीवान वीरसिंह जी। आपने सच्चाई से सब गुण मुझे बता दिये है तो समझ लीजिए कि वे सब अवगुण् अब समाप्त हो गये। हम ने रामधन पहले ही अपने विशेष सलाहकार मंत्री का पद दे दिया है। यह पद खजांची के पद से अधिक सम्मानित भ्ज्ञी है और इसमें वेतन में खजांची से तिगुना मिलेगा। रामधन आपका छोटा भाई है, पर अब वह आप से ऊंचे पद पर काम करेगा। आप अपने इस त्यागपत्र को फाड़ फेंकिए और पूर्वत् रियासत के दीवान बने रहिये।'

अगले ही दिन रामधन को राजा के विशेष सलाहकार मंत्री का पद मिल गया। दीवान वीरसिंह ने स्वयं अपनी बुआ के घर जाकर उन्हें इसकी सूचना दी और उनसे आशीर्वाद लिया। बात यह थी कि महाराज ने रामधन की लिखावट की परीक्षा अपने ओर से गुपचुप करववा ली थी। विशेषज्ञों ने उसकी बहुत ही अच्छी रिपोर्ट दी थी। प्रार्थनापत्र के अक्षर झूठ क्यों बोले? इसका भी पता राजा ने लगावा लिया था। राजा इस बात को भलीभांति जानते थे कि अक्षर कभी झूठ नहीं बोलते। वे तो अपने लिखने वाले के चरित्र का दर्पण होते है।