Neither happened nor will hindi story

महाराज स्वर्णसेन बड़े परेशान थे। उनकी इकलौती बेटी स्वर्णलता के लिए योग्य वर की तलाश चल रही थी। कई राजकुमारों के रिशते आए, पर राजकुमारी को कोई पसंद नहीं आता था। आखिर महारनी ने एक दिन बेटी को समझाया, 'बेटी तुम इस तरह कितने दिन कुंआरी बैठी रहोगी? कहीं ऐसे ही तुम्हारे विवाह करने की उम्र न निकल जाए।'

स्वर्णलता बोली, माँ, मैं क्या करूं? मै समझ ही नही पाती हूॅं कि आखिर किसे अपना पति बनांऊ। जब भी कोई राजकुमार आता है, मै उलझन में पड़ जाती हूं। मै तो बस यही चाहती हूं कि मेरा होने वाला पति ब़़ुद्धिमान, हाजिरजवाब और योग्य हो ताकि भविष्य में राज्य की बागडोर कुशलतापूर्वक संभाल सके।'

महारानी ने कहा, 'बेटी। तुम कोई शर्त तय कर लो। जो राजकुमार उसे पूरी कर दे, उसी को वर चुन लो।' स्वर्णलता को मां का यह सुझाव पसंद आ गया। उसने कहा, 'ठीक है, मैं उसी राजकुमार से विवाह करूंगी, जो कुछ ऐसा करके दिखाए जो न किसी ने पहले किया हो, न बाद में कर सके।'

महारानी ने महाराज से कहकर ऐसी मुनादी करवा दी। पूरे राज्य में शीघ्र ही खबर फैल गई। आसपास के राज्यों में भी समाचार पहुंचा। कई राज्यों के राजकुमार आए, लेकिन राजकुमारी को प्रभावित नहीं कर पाए। बस तीन राजकुमार अंतिम निर्णय के लिए चुन लिए गये। ये तीनों राजकुमार कुछ हद तक स्वर्णलता को पसंद आ गए थे। अब राजकुमारी को उनकी अंतिम परीक्षा लेनी थी। 

ये तीन राजकुमार थे— विनय, शैवाल और मनोहर। राजकुमारी स्वर्णलता ने उनकी आवभगत की। जलपान करवाया। तीनों का विस्तृत परिचय लिया फिर कहा, 'आप लोग कल राजमहल के विशाल सभागार में आना, और क्या कर सकते है, यह प्रत्यक्ष रूप से करके दिखाना। मुझे आप लोगों में से जिसका दावा सही लगेगा, उसी को मैं अपना पति चुन लूंगी।' 

पहला राजकुमार यानी विनय, अगले दिन सबसे पहले महल के साभागार में पहुचा। वह एक विश्शलकाय पत्थर को उठा कर लाया था। 

उसका बाहुबल देखकर हर कोई हैरान था। पत्थर को रखकर उसने स्वर्णलता से कहा,'राजकुमारी। देखो, इतनी बड़ी चट्टान कोई उठा सकता  है?' राजकुमारी ने विनम्रतापूर्वक कहा, 'क्षमा करना विनय, लेकिन यह कोई ऐसा काम नहीं, जो न किसी ने भूतकाल में किया हो और न भविष्य में कर सकेगा। इस पृथ्वी पर तुमसे बलशाली कोई है ही नहीं, यह कहना गलत होगा। 'विनय सिर झुका कर वहां से चला गया। 

अब दूसरा राजकुमार शैवाल आया। वह जादू दिखाने की कला जानता था। उसने तरह—तरह के जादू दिखाए, लेकिन स्वर्णलता उससे प्रभावित नहीं हुई। बोली, 'दुनिया में पहले भी एक से बढ़कर एक जादूगर हुए हैं और भविष्य में भी होगे।' शैवाल भी निरश होकर चला गया। अब तो महाराज और महारनी के मांथे पर फिर से चिंता की लकींरे अभर आई। उनकी अंतिम उम्मीद मनोहर से ही बची थी। लेकिन मन ही मन डर रहे थे कि राजकुमारी ने उसे भी नापसंद कर दिया, तो रिश्ते आने बंद हो जाएंगे। तीसरा उम्मीदवार, राजकुमार मनोहर सभागार में पहुचा, तो उसे देखकर सभी चकित हो गए। उसने हाथ में वरमाला ले रखी थी और साथ में एक पुरोहित व कई दसिायों को लेकर आया था। मनोहर पुरोहित के साथ सीधा राजकुमारी के सिंहासन के पास आ पहुचा। पुरोहित ने मंत्रोच्चार शुरू कर दिया। साथ में आई दासियां शंख बजाने लगी। राजकुमार मनोहर ने मुस्कराते हुए स्वर्णलता को खूबसूरत ताजा फूलों का हार पहना दिया और आगे बढ़कर महाराज स्वर्णसेन और महारानी के पैर छू लिये। वे दोनो भी भाँचक्के रह गए। 

स्वर्ण्लता हक्की—बक्की रह गई। उसने अचकचाकर कर कहा, 'तुमने यह क्या किया?' मनोहर ने हंसकर कहा, 'मैने तुम्हारे साथ विवाह किया है। न तो मैने और न ही तुमने, अतीत में कभी शादी नहीं की और जाहिर सी बात हे, तुम्हारा—मेरा विवाह हो चुकाह हेै तो भविष्य में भी हम विवाह नहीं करेंगे। हमने जा कुछ किया, वह वर्तमान में किया।' 

मनोहर का तर्क सुनकर राजकुमारी खिलखिलाकर हंस पड़ी। महाराज और महारनी भी ठहाका मारकर हंसने लगे। पूरा राजदरबार कहकहे लगाने लगा। धूमधाम से दोनों का उसी समय विवाह हो गया औश्र वे सुखपूर्वक रहने लगे।