Monkey's face turned black hindi story

प्राचीन काल की बात है। एक राजा के यहां एक मेढक और बंदर काम करते थे। एक दिन राजा ने बंदर को जंगल से फल लाने ​के लिए कहा और मेढक को कुछ मछलियां लाने के लिए भेजा। दोनों अपने—अपने काम पर निकल पड़े। बंदर ने बहुत सारे फल इकट्ठे किये। वह बहुत थक गया था। भूख लगने के कारण इकट्ठे किये सारे फल वह रास्तें में ही खा गया। थकान और भरपेट भोजन कर लेने के कारण उसे नींद आने लगी। वह एक पेडत्र की डाल पर सो गया। जब उसकी नींद खुली, तब तक शाम हो चुकी थी। वह बुरी तरह घबरा गया। सोचा, अब तो राजा खूब पिटाई करेगां वह कोई उपाय सोचने लगा। तभी उसे कुछ सुझा। वह एक जगह पड़े हुए किचड़ में लोटपोट होकर बुरी तरह गंदा हो गया। फिर महल की ओर चल दिया। 


उधर, मेढक ने दिन भर कड़ी मेहनत करके ढेर सारी मछलियाँ पकड़ ली थीं। और उन्हें लेकर वह भी लौट रहा था। बंदर ने उसे देखा, तो उसे ईष्र्या होने लगी। उसने मेढक को पकड़ कर तालाब में गिरा दिया। मेढक के हाथ से सारी मछलियां छूट कर भाग गई। मेढक बहुत नाराज हुआ। उसने बंदर से कहा, 'अब राज मेरी पिटाई करेगे, तब कौन बचाएगा?' बंदर ने कहा, 'चिंता मत करो। वह अधिक दिनों तक हमारा मालिक नहीं रहेगा। मैं तो उसके विरूद्ध विद्रोह करने वाला हूं। मै राजा बनूंगा तुम्हे अपना मंत्री बनाऊंगा। बस तुम साफ—साफ कह देना कि तुमने कोई मछली पकड़ी नही। मेढक भोला था। उसकी बातों में आ गया। 


दोनों महल लौटे। उन्हें खाली हाथ देखते ही राजा बरस पड़ा। बंदर बोला, 'महाराज। मेरी हालत देखिये। मैने खूब कोशिश की, पर इस समय कोई फल पेड़ों पर है ही नहीं। इस मेढक को देखिए, कितना साफ—सुथरा है। इसने तो दिन भर तालाब में मौज—मस्ती की है।' राजा क्रोध से भगडक उठा। मेढक अपनी सफाई में कुछ कह पाता, इससे पहले ही राजा ने उसके सिर पर जोर से मुक्का मारा। मेढक का सिर पिचक गया। मेढक ने नाराज होकर कहा, 'मैने खूब मछलियाँ पकड़ी थीं लेकिन इस दुष्ट बंदर ने उन्हें तालाब में डुबो दिया। लेकिन जो भी हो, मैं अब यहां नहीं रहूंगा। आपके यहां न्याय नहीं होता।' मेढक नाराज होकर वहां से चला गया।

बंदर बड़ा खुश हुआ। उसने कुछ ही दिनों बाद सचमुच राजा के खिलाफ विद्रोह कर दिया। अपने ढेर सारे मित्रों को लेकर वह राजा पर आक्रमण करने के लिए आ धमका। राजा के पहरेदारों ने दौड़कार उसे इस बात की सूचना दी। राजा बेहद ​बुद्धिमान था। उसने ​तुरन्त इस हमले से बचने का उपाय सोचते हुए झट से एक काला घोल तैयार किया औश्र उसे अपने चेहरे पर लगा लिया। वह बंदर की बुद्धि के स्तर से अच्छी तरह परिचित था। 


बंदर आक्रामक मूड में राजा को धमकी देने के लिए अकेला ही उसके कक्ष में आया। राजा के चेहरे पर लगाा रेग उसे बहुत अच्छा लगाा। सब कुछ भूलकर वह पूछने लगा, 'आपने यह घोल कहां से मंगाया? मै भी ऐसा घोल अपने चेहरे पर लगाना चाहता हूं।' 

राजा ने कहा, 'अरे, अपने बगीचे में जो विशाल बरगद का पेड़ है, में उसकी खोखल में जाकर बैठ गया। मेंरे सेवकों ने बाहर से आग लगाा दी। बस उसके प्राकृतिक धुएं में मेरा चेहरा ऐसा हो गया। 

बंदर ने राजा की खुशामद करते हुए कहा, 'महाराज, मै और मेरे दोस्त भी अपना चेहरा ऐसा बनाना चाहते है। हम सब पेड़ को खोखल में घुस जाते हैं। आप अपने सेवकां से कह कर धुआं तैयार करवा दीजिये ना।' राजा ने दिखावटी ना—नुकुर की, फिर राजी हो गया। सारे बंदर अपने सरदार का कहा मानकर बरगद की विश्शल खोखल में जाकर बैठ गए। बंदरों के भीतर बैठते ही राजा के सेवकों ने एक साथ्ज्ञ बरगद के चारों ओर आग लगा दी। सरे बंदर गर्मी और आग की लपटों से तड़पने लगे। भागने की लाख कोशिश करने के बावजूद वे भाग नहीं पाए। बड़ी मुशकिल से एक बंदर और बंदरिया बच कर निकल पाए। उन दोनों का चेहरा सचमुच काला हो गया था। 

बाद में उनकी जो भी संताने होती गई और उन संतानों की जो संतानें हुईं, वे सब काले मुख की ही होने लगीं। लेकिन जो बंदर इस झांसे में नही फंसे और दुष्ट बंदर के साथ नहीं गए थें, उनकी संताने आज भी लाल मुख की ही होती है।