vaanee se pahachaan hindi story


दोस्तो वाणी से ही से व्यक्ति की असली पहचान होती है। न कि बाहरी चमक—दमक से। बाहरी चमक—दमक वाले व्यक्ति को यदि बोलना नहीं आता तो उसकी चमक बेकार है। वहीं एक साधारण से दिखने वाले व्​यक्ति को ​यदि ​बोलने की कला आती है तो लोगों को प्रभावित कर सकता है।यानी बोलना एक कला है। बोली से ही हाथी के ऊपर बैठाया जा सकता है और बोली से ही हाथी के पांव के नीचे भी कुचला जा सकता है। यहां यह कहानी बोली की महत्ता को बता रही है। 

एक बीरसेन नाम का राजा था। वह बड़ा ही विद्वान था। उसके राज्य की जनता बड़े ही अमन चैन से रहती थी। राजा का यह नियम था कि वह कभी—कभी अपनी जनता के दुख—दर्द की जानकारी लेने के लिए एक साधारण से नागरिक के भेष में धूमता रहता ​​था। उसे जहां भी अपनी जनता में किसी प्रकार के दुख का पता लगाता तो तुरंत ही वह अपने महामंत्री को आदेश देकर उनके दु:ख को दूर करने की व्यवस्था करता था। 

एक समय की बात है, जब राजा एीरसेन अपने महामंत्री और सेवक के साथ साधारण नागरिक के भेष में निकता तो चलते—चलते वे दूर निकल गये। जंगल में वे रास्ता भटक गये। दोपहर की तेज धूप ने उन्हें पसीने से तरबतर कर दिया। प्यास से तीनों व्याकुल हो गये। कंठ सूखने से जब राजा वीरसेन की हालत खराब हो गई, तो राजा ने महामंत्री की तुरन्त पीने के लिए पानी की व्यवस्था करने के लिए कहा। 

महामंत्री ने एक घनी छाया वाले वटवृक्ष के नीचे राजा के विश्राम का प्रबंध किया। फिर वह एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ा। महामंत्री ने दूर—दूर तक देखा। उसे एक जगह धुआं उठता दिखई दिया। उसने यह जान लिया कि धुआँ उठने के स्थान पर आस—पास ही पीने का पानी मिल सकता है। नीचे उतर कर उसने अपने सेवक को उसी दिशा में जाकर पीने के लिए पानी लाने को कहा। 

महामंत्री के आदेश से सेवक पानी लाने चल दिया। उसे दूर एक झोपड़ी दिखाई दी। यह वहां पहुंचा। उसने देखा कि एक साधु चबूतरे पर ध्यान मग्न बैठे है। सेवक ने साधु से पूछा, 'क्यों बाबाजी। आपके यहां पीने का पानी मिलेगा?'


सेवक के पूछने पर साधु ने बिना बोले ही हाथ से उस और इशारा किया, जिधर पानी का झरना बह रहा था। सेवक बिना कुछ कहे उसी ओर चल पड़ा, जिस ओर साधु ने अपने हा​थ का इशारा किया था। जैसे ही साधु को यह आभास हुआ कि पूछने वाला व्यक्ति पानी लेने के लिए आगे बढ़ चला है तो वे बोले, 'यह व्यक्ति तो कोई नौकर लगता है।'

ऐसा सुनते ही सेवक कुछ क्षण के लिए रूका। किन्तु वह प्यास से व्याकुल होने के कारण पानी पीने के लिए चला गया। सेवक ने बहते हुए झरने का शीतल पानी पिया और सुस्ताने के लिए एक पेड़ की छाव में बैठ गया। ठंडी हवा और पेड़ की शीतल छाया के कारण सेवक को नींद आ गई। और वह वहीं सो गया। उसे यह भी ध्यान नहीं रहा कि उसके राजाजी और महामंत्री भी प्यास से व्याकुल हो रहे हैं। उन्हें भी तो पीने के लिए पानी की तुरंत आवश्यकता है। इस प्रकार सेवक अपना कत्तव्य भूल गया। 

जब बहुत समय हो गया तो राजा वीरसेन को चिंता हुई। उधर प्यास के मारे उनका हाल बेहाल हो रहा था। उन्होंने महामंत्री को आज्ञा दी कि वे जाकर सेवक का शीघ्र पता लगांए कि कहीं किसी हिंसक पशुं ने सेवक को मार तो नहीं दिया है। राजा की आज्ञा से महामंत्री भी उसी पगडंडी पर चल पड़ा, जिधर सेवक गया था। 

चलते—चलते महामंत्री भी उसी जगह पहुंचा जहां साधु ध्यानमग्न था। साधु के पास जाकर महामंत्री ने कहा, 'महाराज मेरा प्रणाम स्वीकर करें। 

कृप्या यह बताने का कष्ट करें कि आपके यहां पीपने के लिए पानी मिलेगा?' तब साधु ने महामंत्री को भी उसी तरह हाथ का इशारा कर दिया जैसा सेवक के लिये किया था। साधु के बताए इशारे की दिशा में महामंत्री आगे बढ़ा। साधु ने कहा, 'यह व्यक्ति कोई उच्च अधिकारी लगता है।' 

महामंत्री के कान में साधु का यह कथन सुनाई दिया। लेकिन चूँकि वह भी प्यास से व्याकुल था सो बिना रूके हुए वह पीने के लिए पानी लाने आगे बढ़ गया। क्योकि उसे सेवक को भी खोजना था, और राजाजी के लिए भी उसे पीने के लिए पानी ले जाना आवश्यक था। 

चलते—चलते जैसे ही महामंत्री बहते हुए झरने के पास पहुंचे, वहां पेड़ की शीतल छाया में सेवक को सोते हुए देखा। बिना सेवक को जगाये महामंत्री ने सबसे पहले शीतल जल पीकर अपनी प्यास बुझाई पानी पीकर वह भी सेवक के पास ही पेड़ के तने से सिर टिका कर सुस्ताने लगा। शीतल हवा के झांके से महामंत्री को भी नींद आने लगी। वह भी वहाँ सो गया। 

उधर राजा का प्यास से बुरा हाल हो गया। वह और अधिकर देर तक बिना पानी के नहीं रह सकता था। विवश होकर लड़खड़ाते कदमों से उसी पगडंडी पर चल पड़ा जिस पर सेवक और फिर महामंत्री गए थे। राजा वचीरसेन भी उसी झोंपड़ी तक पहुंचे। राजा ने भी चबूतरे पर साधु को ध्यानमग्न देखा। राजा को समान्य शिष्टाचार निबाहने का पूरा ध्यान था। साधु के पास जाकर उनके चरण स्पर्श करते हुए कहा, 'महात्मन। सादर प्रणाम स्वीकार कर अनुग्रहीत करे। कृप्या यह बताने की कृपा करें कि आप सकुशल तो है?'

राजा वीरसेन के मुख से जो लड़लड़ाते शब्द निकल रहे थे, उससे साधु को यह आभास हो गया कि राजा भी बहुत  थका हुआ है और प्यास से बहुत व्याकुल है। फिर भी वे चुप रहे।  कुछ क्षण रूककर राजा वीरसेन बोला, 'आदरणीय मैं प्यास से व्याकुल हूं। जंगल में पानी की खोज में बहुत देर से भटक रहा हूं। क्या आपके आश्रम में पीने के लिए पानी मिलेगा?'

साधु ने बिना कुछ कहे उसी तरफ हाथ से इशारा कर दिया जिस तरह सेवक और महामंत्री को किया था। राजा ने हाथ का इशारा देखा और कहा, 'महात्मन, मै आपका अत्यन्त आभारी हूं कि आपने मुझ प्यासे को पानी की राह दिखाई।' इतना कह कर राजा आगे को बढ़ गया। जैसे ही साधु को यह आभास हो गया कि राजा पानी के झरने की ओर बढ़ गया है तो वह बोला, 'ये श्रीमापन राजा मालूम होते है' 

राजा के कानों में जाते—जाते साधु के ये शब्द सुनाई दिये। ​लेकिन प्यास से व्याकुल होने के कारण वह भी उन शब्दों पर कोई ध्यान दिये बिना झरने की ओर बढ़ गया।  उसे न केवल अपनी प्यास बुझानी थी बल्कि महामंत्री और सेवक को भी खेजना था। 

जैसे ही राजा वीरसेन झरने के पास पहुचा, तो उसने देखा कि सेवक औश्र महामंत्री दोनों पेड़ के तने से अपना सिर टिकाए गहरी नींद में सो रहे है। उन्हें सकुशल देखकर राजा की चिंता दूर हुई। फिर राजा ने झरने की शीतल धरा से अपने हाथ—पैर धेए, फिर शीतल जल पीकर अपनी प्यास बुझाई। वह भी कुछ देर उसी पेड़ की शीतल छाया में बैठकर सुस्ताने लगा। कुछ देर के विश्राम के बाद राजा ने सेवक और महामंत्री को जगाया। दोनों राजा को सामने दखकर हड़बड़ा कर उठ बैठे। राजा से भयभीत हो गये और क्षमा मांगने लगे। लेकिन राजा वीरसेन ने उन्हें कुछ भी नहीं कहां 

फिर तीनों लौट चले। वे साधु के पास जाकर उनके सामने खड़े हो गये। तब राजा ने अपनी शंका के समाधन के लिए साधु से पूछा, 'महात्मन, जब मैं झरने की ओर बढ़ रहा था ​तब आपने कुछ कहा, लेकिन प्यास के कारण पानी पीने की जल्दी में मै कुछ सुन नहीं पाया। क्या अपने मुझसे पूर्व जो दो व्यक्ति आए थे उनको भी कुछ कहा था?'

कुछ क्षण की चुप्पी के बाद साधु ने कहा, 'राजन, जो व्यक्ति जितना विद्यावान एवं संस्कारवान होगा वह उतना ही विनम्र होगा। बोल—चाल में शुद्ध आचरण करेगा।' इसीलिए मनुष्य की सच्ची पहचान उसके कहे गए संबोधन मात्र से हो सकती है। कहा भी है, 'ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खेय, औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय। '

साधु ने आगे कहा, 'राजन, जो व्यक्ति पहले आया था। उसकी वाणी में न तो मधुरता थी और न ही संबोधन में शिष्टाचार था। इसलिये मैने उसे नौकर होना बताया। तब दूसर व्यक्ति आयो तो उसकी वाणी में मधुरता के साथ ही विनम्रता भी थी। इस कारण मैंने उसको राजा का उच्च अधिकरी बताया। अंत में तीसरे व्यक्ति के रूप में आप आए। आने अपने उच्च कुल में पैदार होने  का परिचय दियां अपने कष्ट को भूलकर प्यास से व्याकुल होते हुए भी, सबसे पहले आपने मर्यादा का ध्यान रखते हुए मुझे आदर सहित प्रणम किया। फिर मेरी कुशलता के बारे में पूछा और तब जाकर आपने अपनी मूल आवश्यकता के बारे में बड़ी विनम्रता से पूछा। ऐसी मधुर और आदरसूचक वाणी तो कोई विद्वान, उच्चकुल और संस्कारित व्यक्ति ही बोल सकता है। इसलिए मैने आपके लिए राजा के रूप में पहचान की।'

साधु ने राजा की जिज्ञासा शांत की। तब राजा ने साधु को प्रणाम कर कहा, 'महात्मन्। आपका अनुमान शत प्रतिशत सही है। अब कृप्या आप आंखे खोलकर हमें कृतार्थ। करें।' इस पर साधु ने कहा, 'राजन। मै दृष्टिहीन हूं। मैंने आप तीनों को बिना देखे ही मात्र आपकी वाणी सुनकर पहचान की।'

तीनों ने आश्चर्यचकित होकर साधु को दंडवत प्रणाम किया औश्र सकुशल राजधानी की ओर चल लौट चले। उनके कानों में महात्मा जी के वे शब्द अब भी गूंज रहे थे, 'मनुष्य की सच्ची पहचान उसकी वाणी से ही है। वाणी के कारण ही एक नेत्रहीन व्यक्ति भी किसी व्यक्ति की सही पहचान कर सकता है।'