Duty test story in hindi


राजगढ़  के राजा विक्रमसिंह का काफी समय से एक कुषल तथा कर्तव्यपरायण संदेशवाहक की तलाश थी जिस पर वे पूर्ण रूप में विश्वास कर सकं। लेकिन वे यह निर्णय नहीं ले पा रहे थे कि कैसे किसी योग्य व्यक्ति को इस पद के लिये चुनें। आखिर राजा विक्रमसिंह ने अपने मंत्रियों तथा सेनापति को अपनी चिंता से अवगत कराया। 'महाराज मुझे लगता है कि हमें अपने राज्य के युवक को महल में बुलाकर उनकी वीरता तथा अस्त्र—शस्त्र चलाने की परीक्षा लेनी चाहिए। मेरे विचार से केवल एक वीर पुरूष ही उचित रूप से अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है। 'सेनापति ने सुझाव दिया। 

'क्षमा कीतिजए महाराज, किन्तु मैं सेनापति जी की बात से सहमत नहीं हूं, मेरे विचार से एक संदशवाहक को चतुर होना चाहिए जिससे वो षिम परिस्थितियों में भी अपना धैर्य न खोकर अपनी बुद्धि से कार्य करके आने कर्तव्य को पूरा कर सके।' एक मंत्री ने अपना विचार प्रकट किया। सभा में उपस्थित अन्य ​मंत्रियों ने भी अपने विचार प्रकट किये। 

'सभाजनों, आप सभी के विचार सुनकर हम पहले से भी अधिक उलझन में पड़ गयो है कि हमें अपने संदेशवाहक के रूप में कैसे व्यक्ति को नियुक्त करना चाहिये। महामंत्री जी, अभी तक सभा में उपस्थित सभी मंत्रियो तथा सेनापति जी के विचारों को आपने सुना, हम यह जनना चाहते है कि आपका क्या विचार है कि हमें कैसे व्यक्ति को अपना सदेशवाहक नियुक्त करना चहिए?' राजा विक्रम सिंह ने अपने महामंत्री चतुरसेन से पूछा। 

'महाराज मेरे विचार से सेनापति जी तथा अन्य मंत्रियों के विचार अपने—अपने स्थान पर उचित है, क्योंकि एक संदेशवाहक में विरता, चतुरता आदि गुण होने आवश्यक हैं, इसके बिना वो अपने कर्तव्य को उचित रूप से पूर्ण नही कर सकेगा। किन्तु मेेरे विचार से इन सब योग्याताओं के अतिरिक्त उसमें एक और योग्यता होनी अत्यंत आवश्यक है।' 

'वो कौनसी योग्यता है महामंत्री जी?'

'महाराज वो व्यक्ति विश्वास करने योग्या होना चाहिये। अगर सेदशवाहर के यप में नियुक्त व्यक्ति भरोसेमंद नहीं होगा तो हमारे राज्य की गुप्त सूचनांए हमारे शत्रु राजाआं तक पहुंच सकती है।'

'आपका कथन एकदम सत्य है महामंत्री, अगर सेदेशवाहक भरोसेमेंद नही होगा तो हमारे राज्य पर संकट आ सकता है। महामंत्री जी, हमारा विचार है कि केवल आप ही सेदशवाह के पद के लिये किसी योग्य उम्मीदवार का चयन कर सकते है, अत: संदेशवाहक के चयन का कार्य हम आपको साँपते है।' 'जो आज्ञा महाराज।' अगले ही दिन पूरे राज्य में मुनादी मरवा दी गई कि महल में सेदशवाहक का चुनाव होने वाला है और इच्छुक व्यक्ति महल में आएं। घोषणा होते ही सैंकड़ों युवक महल में एकत्र हो गये। 

महामंत्री चतुरसेन की सलाह पर सेनापति ने सर्वप्रथम महल में आये युवकों की वीरता तथा अस्त्र—शस्त्र चलाने की उनकी निपुण्ता की परीक्षा ली। जो उम्मीदवार इस परीक्षा में सफल हुए, उनकी बुद्धिमत्ता की परीक्षा ली गई। इस प्रकार बारी—बारी से पांच परीक्षाआं से गुजरते हुए चार युवक अंतिम परीक्षा तक पहुचने में सफल रहे। 

'हमें बेहद प्रस्न्नता है कि तुम चारों युवक अपने मार्ग को प्रत्येक बाधा को पार करते हुए परीक्षा के अंतिम दौर में पहुंचने में सफल हुए हो, तुम्हारी अंतिम परीक्षा कल ली जायेगी। तब तक तुम सभी विश्रामकक्ष में जाकर आराम कर सकते हो।' महामंत्री चतुरसेन ने कहा तो चारों प्रतिभागी वहां से चले गये। 

दूसरे दिन चारों युवक फिर महल में महामंत्री चतुरसेन के समक्ष उपस्थित हुये। 

'हमें यह कहते हुए बेहद अफसोस हो रहा है कि हम ये निर्ण नहीं ले सके कि तुम सबकी परीक्षा कैसे ली जाए और न ही हम ये निश्चय कर सके हैं कि तुम चारों में से नाया संदेशवाहक किसे नियुक्त करें, क्योकि तुम चारां में ही अलग—अलग विशेष्तांए है, जो तुमहं अन्य तीन युवको से श्रेष्ठ साबित करती है। 

इसलिये हमने एक निर्णय लिया है।'

'कैसा निर्णय महामंत्री जी?' 'देखो तुम चार हो और पद सिर्फ एक, अत: हमने सोचा है कि तुम चारों में से इस पद के लिये कौन अधिक उपयुक्त है, इस बात का निर्णय तुम चारों का भग्य करेगा।'

'वो कैसे?'

'तुम चारो के समने से चार बंधे हुए ताम्रपात्र रखे हैं, इनमें से तीन ताम्रपत्रों में लिखा है कि उसे प्राप्त करने का मृत्युदंड दिया जाए और केवल एक तामपत्र ही ऐसा है जिसमें जीवन है। वो ताम्रपत्र कौन सा है ये कोई नहीं जानता। उस ताम्रपत्र को प्राप्त करने वाला प्रतिभागी ही जीवित बचेगा और उसे ही संदेशवाहक बनने का अधिकार प्राप्त होगा।' महामंत्री चतुरसेन ने कहा तो चारों युवकों ने एक—दूसरे की ओर देखा। 

'इस ताम्रपत्र को लेकर तुम कल प्रात:काल पड़ोसी राज्य चंदनगढ़ के राजा चंदनसिंअ से मिलोगे, वही ताम्रपत्रों में लिखे संदश को पड़कार तुम्हारे जीवन और मृत्यु का फैसला करेगे। अब तुम सभी इन तामपत्रों में से अपनी—अपनी पसंद का एक ताम्रपत्र उठा लो।' महामंत्री चतुरसेन ने कहा तो चारों युवकों ने एक—एक ताम्रपत्र उठा लिया। 

'अब तुम चारों अपने अपने विश्राम कक्षों में जाकर विश्राम करो। किन्तु स्मरण रहे कि अब तुम चारां एक—दूसरे से नही मिलोगे ओर कल प्रात: अलग—अलग चंदनगढ़ की ओर रवाना हो जाओगे। हां यदि तुम चारों में से कोई वापस जाना चाहे तो वापस जा सकता है।'

महामंत्री चतुरसेन की बात समाप्त होते ही चारों युवक महामंत्री की आज्ञा लेकर अपने—अपेन कक्ष में चले गये। 

दूसरे दिन प्रात:काल चारों युवकों में से एक युवक अपने कक्ष से निका और अपने अश्व पर सवार होकर चल पड़ा। अभी वो कुछ ही दूर गया था कि महामंत्री चतुरसेन ने उसे रोक लिया। 'तुम्हें कही जाने की आवश्यकता नहीं है युवक, अब तुम्हारे तथा अन्य युवकों के भाग्य का निर्णय चंदनगढ़ के राजा चंदनसिंह के स्थान पर हमारे विक्रमसिंह जी ही करेंगें।' महामंत्री चतुरसेन ने कहा। 

शीघ्र ही महामंत्री चतुरसेन उस युवक के साथ राजा विक्रमसिंह के समक्ष उपस्थित थे। 

'लाओ युवक तुम अपना ताम्रपत्र हमें दों, हम अभी तुम्हारी जीवन—मृत्यु का फैसला कर देते है।' राजा विक्रमसिंह ने कहा तो युवक ने अपना ताम्रपत्र राजा विक्रमसिंह को दे दिया। विक्रमसिंह  ने ताम्रपत्र को खेलकर देखा।' युवक तुम्हारी किस्मत में क्या आया है ये तुम्हारे महामंत्री जी बताएंगे।' राजा विक्रमसिंह ने कहा और ताम्रपत्र को महामंत्री चतुरसेन को पकड़ा दिया।

'मूर्ख इसमें तो तुम्हें मृत्युदेड देने के विषय में लिखा है। अगर तुम ये तामपत्र पहले खेलकर देख लेते तो शायद तुम्हारा जीवन बच जाता।' 

महामंत्री चतुरसेन ने कहा। 

'महामंत्री जी एक संदेशवाहर का कर्तव्य सिर्फ संदेश को पहुचाना ही नहीं, बल्कि ये भी होता है कि वो ताम्रपत्र के माध्यम से भेजे जा रहे संदेश को स्वयं न पढ़े तो फिर में इस ताम्रपत्र को खोलकर कैसे पढ़ सकता था।' युवक ने कहा तो महामंत्री चतुरसेन ने उसे गले लगाा लिया। 

'शाबाश युवक, तुम्हें नया संदेशवाहक नियुक्त किया जाता है।' 'किन्तु ये कैसे संभव है महामंत्री जी, आपकी घोषणा के अनुसार तो जिस युवक के पास जीवित रहने वाला ताम्रपत्र आएगा वहीं नया संदेशवाहक नियुक्त होगा, ऐसे में क्या मुझे संदेशवाहक नियुक्त करना बाकी तीन प्रतिभागियों में सेकिसी एक के साथ अन्याय नहीं होगा, जिस के पास जीवित रहने वाला ताम्रपत्र आएगा।'

'युवक ऐसा कोई ताम्रपत्र था ही नहीं, जिसमें मृत्युदंड देने की सजा न लिखी हो। हमने प्रत्येक ताम्रपत्र पर मृत्युदंड  की सजा लिखी थी। बाकी तीनों युवकों ने विश्रामकक्ष में जाकर अपने—अपने ताम्रपत्रों को खोलकर देखा और उसमें लिखी मृत्युदंड की सजा के विषय में पढ़कार वो रात्रि को ही महल छोड़कार चले गये, केवल तुमने ही एक संदेशवाहक के कर्तव्य का पालन किया और पत्र खोलकर नहीं देखाइसीलिये हम तुम्हें संदेशवाहक नियुक्त कर रहे है। 

जो व्यक्ति अपने कर्तव्य को अपने प्राणों से भी अधिक महत्व देता है उससे अधिक विश्वास करने योग्य और कौन होगा।' महांमत्री चतुरसेन ने कहा तो सभा में उपस्थित राजा विक्रमसिंह तथा अन्य मंत्रीगण उचित सं​देशवाहक का चयन करने के लिए महामंत्री चतुरसेन की सूझबूझ की प्रशंसा करने लगे।