Victorious horse story in hindi


घटना सन् 1830 ईस्वी की है। उस दिन अवध में मुबारिक मंजि के निकट द्वंद्व युद्ध का बड़े पैमाने पर आयोजन किया गया था। द्वंद्व युद्ध मनुष्यों के बीच नहीं, पशुओ के बीच होने जा रहा था। एक तरफ था बादशाह के अस्तबल का एक घोड़ा और दूसरी तरफ था नेपाल की तराइयों में कभी आंतक मचा देने वाला भयानक शेर। सुबह से ही लोगों की भीड़ उस अद्भु द्वंद्व युद्ध को देखने के लिए उसे खुले प्रंगण में एकत्रित हो रही थी। द्वंद्व युद्ध के स्थान के चारों तरफ एक मजबूत बाड़ा बना हुआ था। बादशाह तथा उसके परिवार और मित्रों के बैठन के लिए मुबारिक मंजिल के किनारे पर हीं ऊँचा और शानदार स्थान बना हुआ था। बादशाह नसीरूद्दीन हैदर ने इस अवसर पर कुछ अंग्रेज अफसरों को भी सपरिवार आमत्रित कर दिया था। 

शक्ति की दृष्टि से शेर के सामने घोड़े का कोई महत्व नहीं होता। इसलिये सामान्य रूप में इन दो पशुओं के बीच द्वंद्व की बात सोची भी नही जा सकती। किन्तु अवध के बादशाह नसीरूद्दीन हैदर की सनक की कही कोई सीमा ही नहीं थी। 

इसी प्रकार एक दिन जब उसके एक मुंहलगे दरबारी ने आकर उसे सूचित किया कि अस्तबल का एक घोड़ा बुरी तरह पागल हो गया है और उसने कई साइसों को घायल कर दिया है। तब, बादशाह को अचानक ही उस भयानक शेर की याद आ गई, जो कुछ ही दिन पूर्व उसने नेपाल के जंगलो से पकड़ कर मंगवाया था और जिसका आंतक बेहद बढ़ा—चढ़ा था। बादशाह का विचार था कि किसी दिन उसका किसी पशु या शक्तिशाली योद्धा से द्वंद्व करवाकर अपना मनोंरजन करेगा। घोड़ं के पगलाने का समाचार जानकर उसने तत्काल आदेश दिया कि घोड़े का उस शेर से मुकाबला करवाया जाए। तत्काल घोषण करवा दी गई। उस दिन शेर को पूरी तरह भूखा रखा गया और अगले दिन सुबह मुकाबले की तैयारी दी गई। जब बादशाह और अतिथि अपने—अपने स्थानों पर बैठ गए तो वहां पिजरे में बंद घोंड़े को लाया गया और बाड़े के अंदर छोड़ दिया गया। पगल हो जाने और अनेक व्यक्तियों को चोट पहंचा देने के कारण ही घोड़े को पिंजरे में बंद कर दिया गया था, जहां वह बेचैनी से घूम रहा था। पिंजरे से बाहर निकलकर घोड़ा बाड़े में इधर—उधर पगलाया हुआ दौड़ने लगा और अपनी पूंछ को जोर—जोर से बार—बार हिलाने लगा। थोड़ी देर बाद शेर का भी पिंजरा वहां लाया गया और उसका भी दरवाजा खोज दिया गया। 

भूखा शेर तेजी से पिंजरे से बसहर निकला और वहां एक हृष्ट—पुष्ट घोड़े को देखकर उसकी आंखों में चमक आ गई। उधर घोड़े ने शेर को दखा तो उसका घूमना थम गया ओर वह एकअक शेर की ओर देखने लगा। शेर धीरे—धीरे घोड़े की तरफ बढ़ा और फिर तेजी से शेर ने उस पर छलांग लगा दी। जितनी तेजी से शेर ने घोड़े पर छलांग लगाई, उतनी ही तेजी से घोड़ा भी पीछे की तरफ मुड़ा और जोरो से अपने पैरों की दुलती लपकते हुए शेर के मारी। शेर चारों खने चित्त दूर जा गिरा। लाग आश्चर्यचकित रह गए। जो लोग इस युद्ध को थोड़ी देर का तमाशा समझ रहे थे, वे भी इसमें अब रूचि लेने लगे। बादशाह को नेपाल के शेर की दुर्गति देखर दुख हुआ, लेकिन दुसरी तरफ उसने पागल घोड़े की बहादुरी देखकर प्रसन्नता भी व्यक्त की। 

शेर लपक कर वापस उठा और एक भयानक गर्जन की। इस बार वह बहुत अधिक भंयकर हो रहा था। घोड़े ने गर्जन की परवाह नही की। वह एकटक शेर को घूरे जा रहा था और उसके अगले कदम की प्रतीक्षा कर रहा था। 

इस बार शेर ने असाधरण तेजी दिखलाई। घोड़ा संभलता उससे पहले ही उसने छलांग लगाकर घोड़े के पुटठे पर दांत गड़ा दिया। घोड़े ने दुलती मारने की कोशिश की, मगर वह शेर को नहीं लगी। तब घोड़ा तेजी से जमीन पर लेट गया और इधर—उधर पटकनी लेकर अपने को शेर के जबड़े से मुक्त कर लिया। इसके बाद घोड़े ने शेर को अवसर नहीं दिया। उसने तत्काल खेड़े होकर शेर के दुलती झाड़ दी। शेर दूर जाकर गिरा। इस बार घोड़े ने उसे संभलेने का भी मौका नहीं दियां उसने तत्काल खेड़े होकर शेर के दुलती झाड़ दी। शेर दूर जाकर गिया। इस बार उसने शेर को संभलने का मौका नहीं दिया। शेर के उठने से पहले ही वह फिर उसके पास पहुचा और फिर दुलती झाड़ दी। इस बाद की दुलती पहले से भी अधिक तेज थी। श्ेर असावधानी की स्थिति में ही काफी दूर जाकर गिरा। साथ ही चटखट की तेज आवाज हुई, जिसे आसपस के कुछ लोगों ने भी सुना। उसके जबड़े की हड्डियां टूट गई थी। अब उकसा चेहरा दयनीय हो गया। वह कराहने लगा। घोड़ा फिर उसकी तरफ लपका। लेकिन शेर अपनी दुम दबाए जल्दी  से अपने कटघरे में घुसकर एक और दुबक गया। घोड़ा विजयी मुद्रा में इधर—उधर घूमन लगा। ऐसा लग रहा था, मानों वह विजयी मुद्रा में सभी उपस्थित व्यक्तियों को चुनौती दे रहा हो। 

बादशाह को नेपाल का यह शेर प्रिय था। इसलिये उसकी दुर्दशा देखकर उसे घोड़े पर बड़ा क्रोध आया। उसने आदेश दिया, 'शीघ्र ही दूसर शेर घोड़े के सामन छोड़ा जाए।' 

नौकरों के सामने अब समस्या यह थी कि कोई भी शेर भूखा नहीं था। सभी खा—पीकर मस्ती से सो रहे थे। फिर भी राजा के आदेश का पालन तो करना ही था। सो किसी तरह एक शेर को कटघरे में डालकर वहां लाया गया। उसे कटघरे से निकालने में भी बड़ी कठिनाई हुई। किसी तरह बांसों से धकियकर उसे बाहर निकाला गया। शेर ने बाहर निकल कर अलसायी हुई सी हल्की गर्जना की। घोड़ा विजय के मद में चूर वहां घूम रहा था। गर्जना की आवाज सुनकर वह लपककर आया। शेर ने अधखुली आंखों से घोड़े को अपनी तरफ आते हुए देखा, किन्तु भरा पेट होने के कारण उसने उस ओर ध्यान नहीं दियां घोड़े ने आव देखा न ताव, उसने लपककर तेजी से उस शेर की भी दुलाती मार दी । शेर बेचारा वापस अपने कटघरे में जा ​गिरा। वह सकपकाता—सा घोड़े को देखता रहा। घोड़े का उसा पर भी आंतक छा गया। सो वह चुपचाप अपने कटघरे में ऐ ओर बैठ गया। जनता में अट्टहास फैल गया। 

राजा अपने नौकरां पर अत्यंत क्रुद्ध हुआं उसने उन्हें डाटा। कैसे मरियल शेर को यहां ले आए? इसके बाद उसने तीन जंगली भैंसो  का लोने का आदेश दिया। आदेश का पलन हुआ। तीन भयानक जंगली भैसे वहां लाकर घोड़े के सामने छोड़ दिये गएं लगातार विजय प्राप्त करने से इस समय तक घोड़े का जोश काफी अधिक बढ़ चुका था। वह बड़े आत्मविश्वास से अपने वाले भैंसो को देखता रहा। घोड़े के आत्मविश्वासी स्चरूप का जंगली भैंसो पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ा। वे कुछ समय तक खिसियाए से से घोड़े की तरफ देखते रहे। फिर उनमें से एक जंगली भैंसा आक्रमण की मुद्रा में घोड़े की तरफ बढ़ा। दूसरा भी उसके पीछे चला । तीसरा दर्शक बना वही खड़ा रहा। 

दो भैंसो को अपनी तरफ आते देखकर घोड़ा भी सावधान हो गया। वह क्रुद्ध होकर अपने खुरों से जमीन खेदने लगा। ज्यों ही आगे वाला भैंसा घोड़े के निकट पहुंचा और उस पर आक्रमण करने लगा, त्यों ही घोड़े ने अपनी पूरी शक्ति से उसके दुलती मार दी। भैंसा दुलती खाकर, पीछे आ रहे भेंसे पर जोरो स​े गिरा और टकराकर चित हो गया। घोड़ा फिर से आगे बढ़ा, किन्तु उससे पहले ही दोनों भैंसे उठकर पीछे भाग गए। तीसरा भैंसा तो पहले ही आगे नही बढ़ा था। अन्य दो भैंसो की दुर्गति देखकर वह भी आतंकित हो गया। 

दर्शको को आनंद आ रहा था। चारों ओर घोड़े की प्रशंसा के स्वर उमर रहे थे। उसने आशा के विपरीत दो शेर और तीन भैंसो को पराजित कर दिया था। 

बादशाह ने भी अब घोड़े की विजय को स्वीारते हुए घोषणा की, घोड़ा बहदुर है। इसलिए उसे जीवित रहने का पूरा अधिकार है। उसकी पूरी तरह सेवा की जाए और उसे भरपूर खाने—पीने को दिया जाए।'

उसके रहने के लिए भी उसने विशेष व्यवस्था करने का आदेश दिया। इसके बाद समारोह समाप्त हो गया।