Varruchi story in hind


धारानगरी के पास एक गांव में, एक ब्राहम्ण लड़के और एक नाई के लड़के में गहरी दोस्ती थी। बड़े होने पर दोनों अपने गांव से दूर परदेश में कमाने के लिए निकले और उड़ीसा में जाकर नौकरी करने लगें ब्राहम्ण का बेटा पंडिताई करता और नाई का बेटा हजामत बनाता। इस प्रकार से उन दोनों को कमाते, बारह वर्ष बीत गये। ब्राहम्ण के बेटे मनोज के पास खूब धन इकट्ठा हा गया और नाई के बेटे बुद्धा के पास कम। एक दिन दोनों ने विचार यिा कि चलो वापस अपने गांव चलें। अब तक अपने मां—बाप बूढ़े हो गए होंगे।उस समय आज जैसे यात्रा के साधन नहीं थे, इसलिए वे दोनो पैदल ही चल दिए। रास्ते में नाई के बेटे के मन में खोट आ गया। उसने सोचा कि मनोज को जंगल में मारकर सारा धन छीन लूंगा तो अपने पास खूब धन हो जाएगा। इस सुनसान जंगल में किसी को कुछ पता भी नही चलेंगा। बुद्धा ने सारे रास्तें उसकी खूब सेवा की और रात हो जाने की बाट देखने लगा। उसने एक जगह रूक कर कहा, 'मनोज, बहुत थक गया हूं।

थोड़ी देर यही आराम कर लें, सुबह निकल चलेंगें। सीधा—सादा मनोज उसके कहने में आ गया। भला किसी के पेट का कपट कोई कैसे जान सकता है? दोनों ने साथ में लाया हुआ खाना खाया और अपनी—अपनी पोटलियों को सिरहने रखकर तकिया—सा लगाकर सो गये। बुद्धा सो जाने का नाटक करता रहा और मनोज सचमुच मेंं गहरी नींद में सो गया। जब उसकी नींद खुली तो वह अपने हाथ—पैरों को रस्सी से बंधे देखकर हैराना रह गया। उसको इस तरह से बांध रखा थ कि वह हिलडुल भी नहीं सकात था। वह मन ही मन समझ गया कि यह मुझे मार डालेगा। ईश्वर इच्छा समझकर उसने बुद्धा को बहुतेरा समझाया कि 'मित्र तुम मेरे साथ छल—कपट कर रहे हो, यह उचित नही है।'

बुद्धा पर उसकी झानमरी बातों का कुछ असर नही हुआ, उल्टा उसने अपना हजामत बनाने वाल उस्तरा निकाल लिया और मनोज की और बढ़ा। मनोज ने अपने भय पर काबू रखते हुए कहा, 'देख! बुद्धा मेरे माता पिता मेरी प्रतिक्षा कर रहे होगे, इसलिए मैं न सही मेरे हाथ का लिखा कागज दिखा देना, उन्हें उसी से संतोष हो जाएगा.....। उनके जीने का सहारा हो जाएगा।'

नाई ने उनके दोनो हाथ खोल दिए औरएक कागज पर वे पांच अक्षर लिखवा लिये। बुद्धा ने उन अक्षरो को बार—बार पढ़ा, पर उसके कुछ भी समझ में न आया। वह बड़बड़ाते हुए उठा—'बेवकूफ कहीं का....।' और उसका काम तमाम करके धन की पोटली ले, अपने गांव पहुंच गया। घर जाकर उसने बाप के हाथ् में पोटलीयां सौंप दी, साथ् ही कागज का वह पुर्जा भी देकर बता दिया कि मैंने उसकी हत्या कर दी है और यह चिट्टी उसके पिता को देने जा रहा हूं। 

बुद्धा ने ब्राहम्ण को बताया कि मैं तो लौट आया हँ, पर वह आगे बढ़ गया है। उसने आपके लिए कागज भेजा है, अपनी राजी—खुशी का। ब्राहम्ण ने उस कागज को कई बार पढ़ा, पर वे उन पांच अक्षरों का मतलब नहीं समझ सके। अंत में समस्या हल कराने के लिए राजा भोज के यहां गयें। सारे समाचार सुनाए। राजा भोज ने वह कागज वहां उपस्थित सभी विद्वानों को दिखाया, परंतु उसका वास्तविक अर्थ कोई नही समझ सका। पंडितो ने एक माह की अवधि राजा से मांगी तो राजा भेज ने कहा, 'यदि एक माह बाद भी इसका आशय (अर्थ) नहीं बता सके तो तुम सबको सूली पर चढ़ा दिया जाएगा।' विद्वानों ने राजा की बात सुनी ता सभी क ेप्राण सूख गये। सब किसी न किसी काम से राज्य को छोड़कर चले गये। 

धारा नगरी के श्मशान में एक बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था। उस पर एक गिद्ध—गिद्धनी रहते थे। एक दिन गिद्धनी ने गिद्ध से कहा, 'स्वामी! मैं गर्भवती हू, मुझे मनुष्य का मांस खाने की इच्छा है।' गिद्ध ने कहा, 'एक माह ठहर जा। मोटे—मोटे पंडितो की अवश्य मृत्यु होगी। फिर तू जी—भरकर खा लेना।' इस पर गिद्धनी ने हठ पकड़ लिया कि मुझे ये बताओ कि इतने सारे पंडित क्यो मारे जाएंगे? गिद्ध की दृष्टि सौ योजन देख लेने की होती है। उसने ब्राहम्ण—पुत्र की हत्या देखी थी और उस पत्र के अक्षरों को भी देखा था, सब कुछ गिद्धनी को बता दिया। 

संयोग से वररूचि नाम का एक विद्वान जो उसी वृक्ष के नीचे आराम कर रहा था, उसने सरी बातें सुन ली। गिद्धनी ने कहा, 'मुझे इन पांच अक्षरों का भेद बताओ।' गिद्ध ने वे पांच अक्षर बाल दिए— अ, प्र, शि, ख, नि।' साथ ही इससे सं​बधित संस्कृत श्लोक भी बोल दिया। वररूचि ने सब कुछ सुन लिया। वे अपने साथियों से बोले''अब राजा से डरने की जरूरत नहीं है। समस्या का हल हो गया है।' दूसरे दिन वररूचि ने ब्राहम्ण से कहा कि इन पांच अक्षरो ने ब्राहम्ण से कहा कि इन पांच अक्षरो का मतलब यह है कि तुम्हारे पुत्र को नाई के बेटे ने चोटी पकड़कर, धन लेकर अपने उस्तरे से मार दिया है।'

वररूचि की बात सुनकर ब्राहम्ण बिलख उठा। पंडितो की सूली बच गई। नाई के बेटे को सजा दी गई। अब गिद्धनी गिद्ध से बोली, 'स्वामी! आपज एक माह से ऊपर हो गया। तुम तो कहते थे कि खूब मांस खाने को मिलेगा, लेकिन...।' 

गिद्ध ने ठंडी श्वास लेकर उससे कहा, 'दीवारो के भी कान होते है। किसी गुप्त बात को दिन में भी असावाधान होकर नहीं कहनी चाहिए और रात्रि के अंधेरे में तो बिल्कुल भी नहीं। कई धूर्त लोग धूमते रहते है। गिद्धनी ने उस मांस की ओर देखा तक नही, क्योकि वह एक विश्वसघाती की लाश थी। 

यही कथा वररूचि के पशु—पक्षियों की भाषा जानने के संदभ्र में है। उनका परिचय लें तो वररूचि की माता का नाम कात्यानी और पिता का नाम अग्निदेव था। वे एक बार जो सुन लेते थे, वह उन्हें कंठस्थ हो जाता था, इसलिए इन्हें श्रुतधर के नाम से भी जाना जाता था। वररूचि विक्रामादित्य के समासद तथा कवि थे। 

वररूचि का काव्य इतना लोकप्रिय थ कि अन्य विद्वान उस प्रकार की रचना कर पाना अपना गौरव समझते थे। इन्होंने संस्कृत और प्राकृत का व्याकरण भी लिखा। नीतिग्रन्थ भी लिखें कुछ नाटक—नाटिकाएं भी लिखी। इस प्रकार वयाकरण विद्वान, ​कवि, नाटककार आदि अनेक रूपों में वररूचि विद्वान के रूप में सम्मान के पात्र रहे है।