anchatantr kee amar kahaaniya


दक्षिण के महिलारोप्य नामक नगर में अमरकीर्ति नामक राजा निवास करते थे। उनके गुणों की सर्वत्र ख्याति फैली हुई थी। लेकिन सब कुछ  होते हुए भी उन्हें संतान—सुख प्राप्त नही हो पाया। नरेश की दोने पत्नियां सुशील, सुदंर और धैर्यवान थी। नरेश दोने को ही समान रूप से चाहते और सम्मान देते थे। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने क्या—कुछ नहीं किया। सभी देवी—देवताओं को मनाया, पीर—पंडीतो को पूाज तथा अनेक अनुष्ठाान भी सम्पन्न कराये। आखिरकार राजा को क्रम से एक नहीं, चार—चार पुत्रों की प्राप्ति हुई। उनका आंगन किलकारियों से गूंज उठा। राजसी ठाठ—बाट से पुत्रों का पालन—पोषण होने लगाा। उम्र के साथ उनकी उद्दंडताएं और जिद् बढ़ते चले गये। राजा अपने राजकाज में व्यस्त रहते तो रानियां अपने— अपने पुत्रों के प्रेम में मस्त। ऐसा भी नही था कि राजकुमारों की शिकायते माता—पिता के कानों तक न पहुंचती हो। नरेश स्वयं भी सब कुछ अनुभव कर चुके ​लेकिन वहां से भी शिकायते आनी शुरू हा गईं कुछ दिनों बाद वास इन्हें महल लौटा दिया गया। अब तो राजा की चिन्ता का कोई पारावर न था। बालक, अब न तो अबोध रहे थे, न पूरे किशोर। राजा जानते थे कि कच्ची शाख को जिधर मोड़ा दो व​ह उधर आसानी से मुड़ जाती है। उसी तरह गीली मिट्टी को जो आकृति देना चाहो, वही बन जाती है। इन्हें उस तरह मनमानी करने के कलए ता छोड़ा नही जा सकता। अभी भी समय है, अत: उन्होने प्रयत्न जारी रखा एक दिन किसी शुभचिंतक ने राजा को  विषणु शर्मा नामक विद्वान के बारे में बताया कि अंतिम उपाय बस वही हैं। एक बार उनसे मिल लीजिए, हो सके तो उन्हें ही बुलवा लें। विद्वानों के पास राजा स्वंय ही जाया करते थे। इसलिए यही निर्णय लिया गया कि मैं स्वयं ही जाऊंगा। राजा को अपने मूर्ख पुत्रों को विद्वान तथा नीति—सम्पन्न बनाने की चिन्ता जो थी। 


विष्णु शर्मा ने यथोचित सत्कार करके उन राजकुमारों की बुद्धि परीक्षा ली। उन्हें ज्ञान—शून्य पाकर वे मन ही मन बहुत निराश हुए, ​लेकिन उन्होंने जाहिर तौर विपरीत ही कहा, 'राजन! आपके पुत्र बहुत योग्य है, बस इनका रूक्षान इस ओर नहीं है, आप निराश न हो। हाँ, यहां छोड़ने के बजाय आप इन्हें अपने साथ ही ले जांए। मै इन्हे आपकी इच्छानुसार ही बना दूंगा। इसके लिए हो सकता है, लंबा समय लग जाए। बस आपको एक काम करना है, वह यह कि आप अपने उद्यान के किसी शांत कोने में मेरे लिए एक पर्णकुटी और एक मिट्टी की झोंपड़ी (कुटिया) बनवा दें। मै उन्ही कुटिया में इन बच्चों को शिक्षित करूंगा। आश्वासन मिल जाने से राजा के ह्दय से बोझ—सा उतर गया। 


विष्णु शर्मा लोक तथा शास्त्र दोने विशयों में पारंगत विद्वान थे। उन्होंने कुछ समय तक तो बच्चों के मनोविज्ञान को समझा, फिर उन्हें कथाओं के माध्यम से ज्ञान देना शुरू कियां उनके द्वारा तुरत—फुरत रचित कहानियां में गद्य—पद्य दोनों का ही समावेश रहता था। बच्चे वैसे भी कहानियां सुनने के शौकीन हुआ करते है। बस फिर क्या था। 


चारों बालक मस्ती, ऊधम छोड़कर रूचि से उन कथाओं को ध्ययानपूर्वक सुनते। दूसरे दिन विष्णु शर्मा पूर्व सुनाई कहानी पर आधारित विविध भांति के प्रश्न पूछते। बालक उनका सही—सही जवाब् देते। विष्णु शर्मा के सतत प्रयास से बालक अब न केवल पढ़ने और सुनने ही लगे थे, साथ ही लिखना भी सीख गये थे। यह सब खेल—खेल में मनोविनोद के माध्यम से ही विष्णु शर्मा ने कर दिखाया। वे सदा उपदेश देने से बचते रहे। कुछ तो उनकी पढ़ाने की अद्भुत शैली, कुछ उद्यान का प्राकृतिक वातावरण। समय तो अवश्य लगा, परंतु अंत में उन्हें सफलता प्राप्त हो गई। 


चारों बालक व्यवहार—कुशल, सदाचार—सम्पन्न तथा नीतिपटृ बन गये। कहते हैं कि जो कहानियां इन्होनें राजकुमारों को सुनाई, वे लिपिबद्ध कर ली गई। इन कहानियों में कार्यों का सुक्ष्म निरीक्षण करने की प्रतिभा गंथकार में खूब थी। उनमें विनोदप्रियता भी थी। इन दोनो की विशिष्टताओं का इन कहानियों में बाहुल्य है। भाषा मुहावरेदार तथा सरल है। समस्त कथानकों का संकलन जिस ग्रंथ में किया गया, उसको पंचतंत्र नाम दिया गया। पंचतंत्र में पांत्र अध्याय हैं। मित्र भेद (आपसी फुट), मित्रलाभ (दोस्ती), संधि विवाह (मिलना—बिछुड़ना), लब्ध प्रणाश (आई हुई वस्तु का हाथों से निकल जाना), अपरीक्षित कारक (बिना सोचे—समझे किए गये कार्य), इन्हीं विषयों पर नीति कथाएं पंचतंत्र में उपलब्ध है। यह विश्व का सबसे प्राचीन कथा ग्रंथ माना जाता है। जिसका अनुवाद विश्व की सभ्ज्ञी भाषाओं में किया गया। आज विष्णु शर्मा और पंचतंत्र का नाम अमर हो गया है। आज भी इन कथाओं की प्रासंगिकता बनाी हुई है। इन्हें पढ़कर जीवन के उतार—चढावो की अनेक शिक्षाएं बालको को प्राप्त हो सकती हे।