jisamen akl vahee raaja


एक जंगल में एक शेर रहता था । वह बहुत मोटा ताजा और खूंखर था। वह प्रतिदिन एक जानवर मार कर खया करता था। यह उसका नियम था। हां, वह मारता तो एक ही जानवर था, पर न जाने कितनों को घायल कर देता। घायल हुए जानवर तड़प—तड़प कर मर जाते थे। दूसरे जानवरों से उनका दुख न देखा जाता । शेर का आतंक पूरे जंगल में था। सभी जानवर चाहते थे कि किसी तरह से उसे मार दिया जाए। यदि शेर न मरा तो धीरे—धीरे सरा जगल जानवरों से खाली हो जाएगा। इसी सोच में डूबे हुए जानवरों ने एक दिन एक सभा बुलाई। वे सब मिल कर विचार करने लगे कि क्या कोई अपने में से ऐसा वीर है जो उस हत्यारे को खत्म कर सके? यह भी निर्णय लिया गया कि जो जानवर शेर को मार पएगा, वहीं जंगल का राजा मान लिया जायेगा। सभी में हाथी भी उपस्थित था। वह बड़े गर्व के साथ अपनी सूंड उठाता हुआ बोला, 'मै तो उसे कभी का मार देता। मेरे सामने वह लगता कहां है। मेरी परेशानी तो यह है कि वह कभी मेरे सामने पड़ता ही नहीं। पीछे से कागर मेरी पीठ पर आक्रमण करता है दब्बू। बस, इसलिये मैं उसका कुूछ बिगाड़ नहीं पाता, नहीं तो चीटी जैसे कुचल दूं।' हाथी की घमंड भरी बात सुन कर सियार को हंसी आ गई। 

उसने व्यंग्यपूर्वक कहा, 'हाथी दादा, बैठ जाइये, बैठ जाइये। जब आपज अपनी पीठ की भी रक्षा नहीं कर सकते, तब हम जानवरों की रक्षा कया करेंगे? बेकार है आपका यह स्थूलकाय शरीर। शेर को मारने के लिये बुद्धि चाहिए....बुद्धि...।

सियार की बात हाथी को बहुत बुरी लगी। भरी सभा में उसका अपमान हो गया। शेर के बाद जंगल में किस जानवर की हिम्मत थी कि वह हाथी दादा का अपमान कर सके। हाथी क्रोध से बौखला गयां वह सियार की ओर झपटा और सूंड से उठाकर उसे तेजी से आकाश में उछाल दिया। इधर अन्य जानवरों ने समझा कि हाथी दादा पगल हो गये हैं, इसलिए वे सब सभास्थ्ल को छोड़कर अपने—अपने स्थानों पर चले गये। 

सेयोग ससे शेर भी घूमता हुआ वहीं आ गया। ठीक उसी समय सियार आकाश से नीचे गिरा और शेर की पीठ पर जा गिरा। अनायास हुए इस हादसे से शेर भी घबरा गया कि यह कौन सी बला मेरे सिर पर आ गई। सियार ने जो देखा कि वह शेर की पीठ पर गिरा है तो उसे अपनी मौत दिखाई पड़ने लगी। तभी उसने चतरता से काम लेने की सोचीं वह दृढ़ता से, अकड़ कर शेर की पीठ पर बैठा रहा। शेर बहुत हिला—डुला, पर सियार की पकड़ इतीनी मजबूत थी कि वह नीचे न गिरा। 

सियार उसकी पीठ पर महत्तव की तरह बैठा हुआ बोला, 'चल गधे चल। दूसरे जानवरों का दूध पी—पी कर बहुत मोटा हो गया है। न कुछ काम करता है, न धंधा, मुफ्त का खता है। अब फंसा है तू मेरे चंगुल में। अब तुझ पर राज सवारी किया करूंगा। कुछ गड़बड़ करेगा तो तत्काल मौत के घाट उतार दूंगा। 

चल मुझे राजा के पास ले चल...।'

'महाबली! आप कौन है?''

'अबे मुझे नहीं जानता? मै राजा का मंत्री हूं। मुझे राजा ने भेजा था तरी खबर लेने को।' सियार गरजा। इतना सुनते ही शेर गिड़गिड़ाने लगा, 'मत्री जी! मुझे क्षमा करें। मुझे राजा के पास मत ले चलो। वह मंझ मार देगा। मैसरो जीवन आपकी सेवा करूंगा, पर राजा के पास न ले चलिये।'

'चलता है कि नही?' सियार गरज कर बोला, साथ ही उसने अपने दांत शेर की गर्दन में गड़ा दिये। दांते को कोई अस्त्र समझ कर शेर चुपचाप आगे बढ़ने लगा। थोड़ी ही दूर चला होगा कि वह हाथी आता दिखाई दिया। हाथी ने देशा कि सियार तो शेर की पीठ पर बैठा है और सवारी कर रहा है। हाथी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। तीाी उसे ईष्र्या हुई....। सियार की इतनी हिम्मत। उसने तुरन्त कहा, 'शेर भाई, यह क्या?' आप तो उल्टी गंगा बहा रहे है। इस सियार को अपनी पीठ पर क्यों बैइाया है?'

हाथी की बात सुनकर शेर को भी आश्चर्य हुआ। वह गंभीरता से बोला, 'हाथी भाई! क्या यह सच मे सियार है। यह तो कह रहा था कि वह राजा का मंत्री है। इसलिए मैं थोड़ा डर गया था। अपने अच्छा ​बता दिया। अब आप एक काम और कर दीजिए। इसे मरी पीठ से नीचे उतार ​दीजिए, फिर मै इसे देखूं...। 

हाथी शेर की बातों में आ गया। उसने सियार को अपनी सूंड से उठा कर एक तरफ फेंक दिया। सियार गिरते ही भग खड़ा हुआ। उसने पलट कर भी न देखा। वह ऐसी जगह छिप गया, जहां से सब कुछ दिखाई देता था। सियार के भागते ही शेर ने कहा, 'अरे मूर्ख हाथी! तू जन्म से ही मूर्ख रहा और रहेगा। नीति में कहा गया है कि सबसे पहले तो बड़े शत्रु को समाप्त करना चाहिए, फिर छोटे को। फिलहाल तो तू ही मेरे सामन है। अब बच, देखूं तेरा भारी भरकम शरीर किस काम आता है।' इतना कह कर शेर हाथी पर टूट पड़ा और उसे घायल करके चलता बना। 

सियार यह सब देख रहा था। शेर के जाते ही वह तत्काल वहां आ गया और दम तोड़ते हुए हाथी से बोला, 'क्यों अरे मूर्ख! बुल ली न तूने अपनी मौत, अपने ही हाथों। मूर्ख ऐसे ही मारे जाते हैं। अरे जिसमें अक्ल होती है, वही राजा होता है। अब भाग अपनी मूर्खता का परिणाम। 'इतना कर कर सियार अपनी मांद की ओर भाग गया।