(1) अभिजनों का वर्चस्व : यहाँ सेना, धर्म गुरु और भू-स्वामी अभिजनों का सामाजिक दबदबा है। इसकी वजह से कई बार निर्वाचित सरकारों को गिराकर सैनिक शासन कायम हुआ। 

(2) भारत के साथ तनातनी : पाकिस्तान की भारत के साथ तनातनी रहती है। इस वजह से सेना-समर्थक समूह ज्यादा मजबूत हैं और अक्सर ये समूह दलील देते हैं कि राजनीतिक दलों के स्वार्थ साधन तथा लोकतंत्र की धमा-चौकड़ी से पाकिस्तान की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी। इस तरह ये ताकतें सैनिक शासन को जायज ठहराती हैं।

(3) कोई खास अंतर्राष्ट्रीय समर्थन नहीं : पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शासन चले इसके लिए कोई खास अंतर्राष्ट्रीय समर्थन नहीं मिलता है। इस वजह से भी सेना को अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए बढ़ावा मिला है। अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों ने अपने-अपने स्वार्थों से गुजरे वक्त में पाकिस्तान में सैनिक शासन को बढ़ावा दिया।

(4) इस्लामी आतंकवाद : पश्चिमी देशों को यह भी डर सताता है कि पाकिस्तान के पारमाण्विक हथियार कहीं इन आतंकवादी समूहों के हाथ न लग जाएँ। इन बातों के मद्देनजर ये देश पाकिस्तान एवं उसकी सेना को पश्चिम तथा दक्षिण एशिया में पश्चिमी हितों का रखवाला मानते हैं।