कहते हैं, आयु के एक पड़ाव पर पहुँच कर हर मनुष्य एक तो कविता किया करता है; दूसरे अपने आप ही गुनगुनाने लगा करता है। परन्तु यह भी सत्य ही कहा जाता है कि आयु का वह पड़ाव बीत जाने पर कविता करना और गुनगुनाना अपने-आप ही बन्द भी हो जाया करता है। लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ । या फिर ऐसा भी हो सकता है कि अभी मैं कविता और गुनगुनाना समाप्त हो जाने वाले आयु के उस पड़ाव पर नहीं पहुंच पाया। इसलिए मुझे कविता के नाम पर तुकबन्दी करने का शौक तो है ही, विभिन्न कवियों की कविताएं पढ़नेसुनने का शौक भी है। जहां तक सम्भव हो पाता है, मैं हर कवि-सम्मेलन और मशायरा अवश्य सुनता हूँ। फिर भी जाने क्या बात है, आज की कविता में मेरी कोई विशेष रुचि नहीं बन पाती। मध्यकालीन कविता पढने से मुझे जिस आनन्द की अनुभूति होती है, जो प्रेरणा मिलती है; आज की, विशेषकर स्वतंत्रता-प्राप्ति के छठे-सातवें दशक से लिखी जा रही कविता वह सब नहीं दे पाती। मध्यकाल में कबीर, सूरदास, गोस्वामी तुलसीदास, मलिक मुहम्मद जायसी, रसखान, मीरा, बिहारी आदि अनेक प्रख्यात कवि हुए हैं। सभी का अपना-अपना विशेष महत्त्व है, अपनी-अपनी विशिष्ट शैली और प्रभाव है। इस कारण सामान्यतया ये सभी कविगण मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। फिर भी मेरे विचार में विशुद्ध मानवता की दष्टि मे, राष्ट्र की भावात्मक एकता का विचार सामने रख; सभी जातियों-धर्मों में पता,प्रेम और भाईचारे का भाव सामने रख कर जिस कवि की क्रान्तिकारी विना अपने युग के विशिष्ट और सामान्य वर्ग सभी को प्रभावित कर सकी; उस मान्यवर, सुकवि बल्कि महाकवि का तो कहना ही क्या ? भाव, भाषा, शैली आदि हर दृष्टि से सहज सरल वाणी में जन-मानस को आन्दोलित करने वाला, सभी प्रकार की कुरीतियों और बुराइयों का; आडम्बरों और पाखण्डों का चौड़े चौराहे पर खड़े होकर एवं दिन के चौड़े प्रकाश में विरोध करने वाला कवि ही मेरे जैसे व्यक्ति का सर्वाधिक प्रिय कवि हो सकता है। जी ! जी-जी, आपने ठीक पहचाना ! मेरे उस प्रिय कवि का नाम सन्त कबीर ही है।

मेरे प्रिय कवि सन्त कबीर का जन्म कब, कहाँ और किन परिस्थितियों में हुआ, न, मुझे उससे कुछ लेना-देना नहीं है। वह सब जानने-मानने के लिए इतिहासकार और बाल की खाल निकालने वाले आलोचक गण माथा फोड़ते रहें-बेशक ! मैं तो बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि कबीर जी को सब प्रकार के भेद-भावों से ऊपर उठकर महज़ मानव बनकर जीने, जीने देने के संस्कार जन्मजात रूप से और शैशवी सुकुमार क्षणों से ही प्राप्त हो गए थे। इस कारण यह किम्वदन्तियों के अनुसार विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से जन्म लेकर नीमा और नीरू नाम के मुस्लिम जुलाहा दम्पति के घर-आँगन में पलना-पुसना भी हो सकता है; आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार पहले हिन्दी और बाद में मुस्लिम बन जाने वाले जुग्गी सम्प्रदाय के जुलाहा-परिवार में जन्म लेने और पलना-पुसना भी हो सकता है। जो हो, सन्त कबीर को निम्न कही जाने वाली जाति में पलने-पुसने के कारण तरह-तरह की धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और बाद में राजनीतिक भी, तरह-तरह की विषमताओं को देखना, झेलना और भोगना पड़ा था; इस कारण उनका स्वभाव आरम्भ से ही विद्रोही होता गया। मैंने यह भी पढ़ा है कि जब इन्होंने स्वामी रामानन्द जी से दीक्षा लेनी चाही, तो छोटी जाति का होने के कारण उन्होंने इनकार कर दिया। किन्तु दृढ़ निश्चयी कबीर गंगा-तट पर मुंह अँधेरे उस घाट पर लेट गए, जहाँ स्वामी रामानन्द प्रतिदिन गंगा-स्नान करने आया करते थे। अँधेरे में कबीर जी से ठोकर लगने के कारण अचानक उनके मुंह से निकला, "राम-राम!" और कबीर ने इसी को गुरुदीक्षा एवं मन्त्र मानकर आजीवन इसी नाम का प्रचारप्रसार किया। परन्तु याद रहे, कबीर जिस राम के उपासक बने, वह दशरथ का बेटा नहीं, बल्कि निर्गुण-निराकार रूप से विश्व के हर प्राणी एवं पदार्थ में रमण करने वाला एक सूक्ष्म तत्त्व है। उन्होंने कहा भी :
"दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना, राम-नाम का मरम है आना।"
जो हो, कहते हैं कि मेरे इस प्रिय कवि सन्त कबीर के प्रभाव से ही स्वामी रामानन्द ने बाद में सभी जातियों के लोगों को दीक्षा देना आरम्भ कर 'दिया था। वे सगुण राम-भक्ति के समान निर्गुण राम-भक्ति के भी प्रवर्तक कहलाए। इनके अतिरिक्त सन्त कबीर कई मुस्लिम पीरों-फ़कीरों के सम्पर्क में भी आए। शैख तक़ी नाम के एक मुस्लिम सूफ़ी सन्त का इन पर विशेष प्रभाव पड़ा। मुख्य बात तो यह है कि कबीर हिन्दू-मुस्लिम जिस किसी साधुसन्त के सम्पर्क में आए, उसी से उन्होंने कुछ-न-कुछ सीखा । निरन्तर चलने वाले सत्संगों से उन्हें जो तत्त्व ज्ञान प्राप्त हुआ, उसी के आधार पर उन्होंने भक्ति के क्षेत्र में निर्गुण भक्ति-धारा के अन्तर्गत ज्ञानमार्गी शाखा का प्रवर्तन किया। वास्तव में, हिन्दी-साहित्य के इतिहास में ज्ञानमार्गी शाखा के नाम पर जिन मुख्य तत्त्वों, मान्यताओं का वर्णन मिलता है; वह मेरे इस प्रिय कवि की कविताओं के आधार पर ही कहा और विवेचित किया जाता है। यह बात भी ध्यान में रखने वाली है कि कबीर ने किसी मदरसे या पाठशाला में बैठकर किसी प्रकार की कोई बाकायदा शिक्षा ग्रहण नहीं की थी। वे शायद साक्षर भी नहीं थे, यह तथ्य उन्हीं की रची एक पंक्ति से सामने आता है :
"मासे कागद छुओ नहीं, कलम धरी नहिं हाथ।"
फिर भी उन्हें अशिक्षित नहीं कहा जा सकता, अनपढ़ तो वे थे ही। संसार-जीवन की व्यापक-विस्तृत पाठशाला में बैठकर उन्होंने जो कुछ प्रत्यक्ष देखा, सुना, भोगा, उसी को पचा-पकाकर अपनी ज्ञानभरी वाणी माध्यम से प्रकट किया। उनका यह अनुभूत एवं सहज प्रकटीकरण ही वास्तव में उनकी कविता बनकर हमारे सामने आया। उन्होंने कहा भी:
"लोग कहते पोथी की लेखी, मैं कहता जो आँखिन देखी।"

कबीर जी ने क्योंकि 'आँखिन देखी' कही है, इसी कारण उनकी वाणी विद्वानों की इस मान्यता की कसौटी पर खरी उतरती है कि-"सच्ची कविता वही होती है जो सीधे हृदय से निकलकर हृदय को ही प्रभावित करती है।" सच तो यह है कि कबीर ने कविता रचने या अपनी कवित्वप्रतिभा एवं पाण्डित्य दिखाने के लिए कविता की ही नहीं है। उन्होंने अपने जीवन में जो सुना-देखा, सीखा, तत्त्व-ज्ञान प्राप्त किया; दुखी-पीड़ित जनजन तक पहुंचाने की झोंक में उनके मुख से जो भी अटपटी, या काव्यमयी वाणी निकली, वही उनकी कविता है। उसे उनके पढ़े-लिखे शिष्यों ने लिपिबद्ध किया, उन्होंने स्वयं नहीं। कहते हैं कि कि सिक्ख-सम्प्रदाय के प्रर्वतक गुरु नानक देव भी अपनी यात्रा के दौरान कबीर जी के सम्पर्क में आए थे। उनके बाला-मरदाना नामक शिष्यों ने नानकदेव जी की प्रेरणा से कबीर-मुख से प्रकट हुई वाणी को लिपिबद्ध किया। इसी कारण उनकी वाणी का प्रामाणिक संकलन 'गुरु ग्रन्थ साहब' में ही मिल पाता है। यों कबीर की वाणी का संग्रह 'बीजक' के अन्तर्गत हुआ है। इसके तीन भाग हैं-एक साखी, दूसरा शबद, तीसरा रमैनी। कबीर जी द्वारा रचे गए, दोहे ही वास्तव में साखी कहलाते हैं । 'साखी' शब्द 'साक्षी' से बना है, जिसका अर्थ है—गवाही। सो कबीर ने जीवन के विभिन्न और विविध क्षेत्रों में जो भी साक्षात् अनुभव प्राप्त किए, वे साखियों के माध्यम से व्यक्त हुए। दूसरे भाग 'शबद' (शब्द) में कबीर द्वारा अर्जित ब्रह्म-ज्ञान या तत्त्व-ज्ञान की बातें व्यंजित और संकलित हैं। तीसरे भाग रमैनी में कबीर जी की गूढ़ ज्ञान, रहस्यमयी उक्तियाँ, उलटबासियाँ आदि संकलित हैं। कहा जाता है कि इनके अर्थ की गम्भीरता तक पहुंच पाना बड़े-बड़े विद्वानों के भी वश की बात नहीं है। उनकी साखियां और गेय पद शबद ही आम जनों में प्रसिद्ध हैं। शब्द या शबद शास्त्रीय संगीत की विविध राग-रागिनियों पर आधारित हैं । आज भी शास्त्रीय संगीत के महान गायक कबीर के रचे पद (शब्द) बड़े चाव से तन्मय होकर गाया करते हैं। ____ मेरे विचार में कवि के रूप में कबीर जी की सबसे बड़ी विशेषता है जीवन के अनेक प्रकार के अनुभूत तथ्यों और तत्त्वों को जन-मानस के सामने सहज ढंग से प्रस्तुत कर देना। यह विशेषता मध्यकाल के तो क्या, आज तक के भी किसी कवि की कविता में नहीं पाई जाती। आज यथार्थवाद का बड़ा जोर है। भक्ति और अध्यात्म-साधना के क्षेत्र में रहते हुए भी जीवन के जिस यथार्थ का चित्रण कबीर ने किया है, मेरे विचार में आज तक का अन्य कोई भी कवि नहीं कर सका। यही बात भावात्मक एकता के बारे में भी कही जा सकती है। बाद में, आधुनिक काल में आकर महात्मा गांधी ने जिस धर्म, अध्यात्म, सामाजिक चेतना का प्रचार-प्रसार किया, मेरे इस प्रिय कवि ने उसकी नींव अपने युग में ही रख दी थी। इसी कारण आज के सन्दर्भो में जितनी समसामयिकता कबीर की वाणी में पाई जाती है, उस युग के अन्य किसी भी कवि में नहीं पाई जाती। इनकी कविता व्यक्ति को निराशा के चरम क्षणों में भी हर दृष्टि से उचित, सामयिक और शाश्वत सन्देश देती हुई सुनी जा सकती है :
"कस बहियाँ बल आपणी, छाँड़ पराई आस ।
जिसके आँगन है नदी, सो कस मरत पियास।" अन्य किस कवि ने अपनी आन्तरिक ऊर्जा की धारा को सर्वाधिक 'विश्वसनीय और सभी समस्याओं के हल का चरम आश्वासन बताया है ? हमारे विचार में अन्य किसी ने भी ऐसा नहीं किया। मेरे इस प्रिय कवि की आर्थिक दृष्टि भी एकदम स्पष्ट थी। क्योंकि यह अन्य युगीन साधु-सन्तों की तरह परोपजीवी नहीं थे । भीख माँगना पाप समझते थे, कपड़ा बुनकर जो कुछ मिलता उसी से अपना घर-परिवार चलाया करते थे। शायद इसी सारे अनुभव से उनका आर्थिक दृष्टिकोण बनकर सामने आया :
"साईं, इतना दीजिए, जा में कुटुम समाय !
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय।" हमारे विचार में इतना स्पष्ट, स्वच्छ और सर्वोपयोगी दृष्टिकोण साम्यवादियों का अर्थशास्त्र भी नहीं अपना सका । इसी प्रकार सन्त कबीर व्यर्थ के पाण्डित्य को विडम्बना मानते थे। मानव-मानव में भेद पैदा करने वाला पाण्डित्य व्यर्थ बताया करते थे। सर्व-समभाव, एकता एवं प्रेम पर बल दिया करते थे। यह सब करने वाला ही उनकी दृष्टि में सच्चा पण्डित और सच्चा मनुष्य था। धार्मिक ग्रन्थों को वे संकीर्ण बताकर तरह-तरह के झगड़े और तनाव पैदा करने वाले मानते थे। तभी तो उन्होंने कहा :
"पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पण्डित हुआ न कोई !
ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पण्डित होई।" प्रेम से उनका तात्पर्य वैयक्तिक सम्बन्ध न होकर सामाजिक सद्भाव का व्यापक स्तर था, ऐसी हमारी स्पष्ट मान्यता है। इसी मान्यता का उन्होंने आजीवन प्रसार और प्रचार किया। समय के शासकों ने अपनी कट्टरता के आवेश में उन्हें तरह-तरह के कष्ट दिए, मारने की चेष्टाएँ की; फिर भी वे धार्मिक और साम्प्रदायिक कट्टरताओं का, सभी धर्मों के बाह्याचारों का उन्हें आडम्बर और पाखण्ड बताकर विरोध करते रहे । हिन्दुओं के बाह्याचारों की व्यर्थता प्रतिपादित करते हुए वे पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, नदियों-सरोवरों में स्नान आदि को व्यर्थ बताकर आचरण-व्यवहार की शुद्धता, सच्चरित्रता, प्रेम और भाईचारे पर बल देते रहे। उन्होंने बाह्याचारों को त्यागकर अन्तःस्मरण और साधना पर बल दिया। मनोसाधना और आचरण-व्यवहार को शुद्ध करने वाली साधना को श्रेष्ठ बताया । तभी ईश्वर प्रसन्न होता है, सबकी सुनता है :
"चींटी के पग नेवर बाजे, सो भी साईं सुनता है।" - जब चींटी के पग-चाप को वह सुन सकता है, तो फिर घण्टे-घड़ियाल
और ऊँचे स्वरों में आज़ान आदि से क्या मतलब? इनकी व्यर्थता बताते. हुए कबीर ने कहा :
"काँकर पाथर जोरि के मस्जिद लई चुनाय ।
ता चढ़ मुल्ला बाँग दे, बहरा हुआ खुदाय ॥" इसी प्रकार उन्होंने हिन्दुओं के व्रत-उपवास का विरोध कर, जपमाला; छापा-तिलक को व्यर्थ बता मन लो काबू रखने की प्रेरणा देते हुए कहाः
"हिन्दू बरत एकादशी साधे दूध सिंघाड़ा सेती। अन्न को त्यागें, मन नहिं हटक, पारण करें सगोती॥"
एक दिन अन्न त्याग देने से कोई लाभ नहीं, यदि मन पर काबू नहीं किया। जीभ के स्वाद के लिए मुर्गा मार रहे हैं और दिन-भर रोजे रखे जा रहे हैं-वाह रे खुदा के बन्दे ! अच्छा इन्साफ़ है तेरा! स्वाद के लिए हिंसा और जीव-हत्या उस पर बहिश्त की कामना है न धर्म की विडम्बना ! तभी तो कबीर जी को कहना पड़ा:
"रोज़ा तुरक नमाज़ गुजारे बिस्मिल बांग उजारें।
उनको भिश्त कहाँ से होई साँझे मुरगी मारें।" मैं अपने इस प्रिय कवि की वाणी से और कई उद्धरण प्रस्तुत कर सकता हूँ। वे सभी अपनी मूल चेतना में उदात्त मानवतावादी दृष्टि को प्रस्तुत करने वाले हैं। वे ईश्वर-अल्ला, राम-रहीम को एक ही मानते थे। इनके नाम पर होने वाले झगड़ों को मिटाने के लिए ही उन्होंने मन्दिर-मस्जिद का विरोध कर घट-घट में उस घट-घटवासी को खोजने
और पाने की प्रेरणा दी थी। उन्होंने कर्म करके बाँटकर, मिलकर खाने की बात भी कही। सत्य, अहिंसा, इन्द्रियनिग्रह, आचार-विचार की शुद्धता पर बल दिया। ये सारी बातें उन्हें एक विशुद्ध राष्ट्रवादी और उससे भी ऊपर उठकर मानवतावादी चिन्तक और कवि प्रमाणित करती हैं। शास्त्रीय दृष्टि से उनकी कविता में से सौ दोष निकाले जा सकते हैं; परन्तु जहाँ तक भावना, उसकी सहज अभिव्यक्ति और प्रभाव का प्रश्न है, वास्तव में कबीर अजोड़ हैं।
कबीर की काव्य भाषा सधुक्कड़ी या साध-भाषा कहलाती है। मज़ाक में उसे खिचड़ी भाषा भी कह दिया जाता है। वे प्रकृति के घुमक्कड़ थे
और अपनी बात लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। इसी कारण वे जहाँ गए, जनता की भाषा में ही अपनी बात कहते-सुनाते रहे। कुल मिलाकर यही वे मुख्य बातें हैं, जिनके आधार पर मैं कबीर जी को अपना प्रिय ही नहीं मध्यकालीन हिन्दी-काव्य का सर्वश्रेष्ठ कवि भी मानता हूँ।