साम्यवाद के पतन के बाद पूर्व सोवियत संघ के गणराज्यों का एक सत्तावादी, समाजवादी व्यवस्था से लोकतांत्रिक पूँजीवाद व्यवस्था का सफर आसान नहीं था। इसके लिए विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा निर्देशित 'शॉक थेरेपी' (आघात पहुँचाकर उपचार करना) का मॉडल अपनाया गया परंतु यह काफी कठिन कष्टप्रद था, जैसा कि निम्न तथ्यों से प्रमाणित होता है

(1) 1990 ई. में अपनायी गयी 'शॉक थेरेपी' जनता को उपभोग के उस 'आनंदलोक' तक नहीं ले गयी जिसका उसने वादा किया था। साधारणतया 'शॉक थेरेपी से पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था नष्ट हो गयी। इससे क्षेत्र की जनता को बर्बादी सहन करनी पड़ी। 

(2) रूस में पूरा का पूरा राज्य-नियंत्रित औद्योगिक ढाँचा नष्ट हो गया। लगभग 90 प्रतिशत उद्योगों को निजी हाथों या कंपनियों को बेचा गया। आर्थिक ढाँचे का पुनर्निर्माण बाजार की शक्तियाँ कर रही थीं, इसलिए यह कदम सभी उद्योगों को नष्ट करने वाला प्रमाणित हुआ। इसे 'इतिहास की सबसे बड़ी गराज-सेल' के नाम से जाना जाता है क्योंकि महत्त्वपूर्ण उद्योगों की कीमत कम से कम करके आँकी गयी और उन्हें कम दामों पर बेच दिया गया।

(3) रूसी मुद्रा रूबल के मूल्य में नाटकीय ढंग से गिरावट आयी। मुद्रास्फीति इतनी ज्यादा थी कि लोगों की जमापूँजी खत्म हो गयी।

(4) सामूहिक कृषि प्रणाली का अंत होने से खाद्यान्न की सुरक्षा भी समाप्त हो गयी। रूस को खाद्यान्न का आयात करना पड़ा।

(5) समाज कल्याण की पुरानी व्यवस्था को क्रम से नष्ट किया गया। गरीबी में वृद्धि हुई। मध्यवर्ग की दशा खराब हो गयी और बौद्धिक कार्यों से जुड़े लोग बिखर गये या बाहर चले गये।

(6) माफिया वर्ग उभरा और उसने अधिकतर आर्थिक गतिविधियों पर नियंत्रण कर लिया। (7) अमीर और गरीब लोगों में असमानता में वृद्धि हुई।

(8) यद्यपि आर्थिक बदलाव को प्राथमिकता दी गयी और उस पर पर्याप्त ध्यान भी दिया गया परंतु लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना सुचारु रूप से नहीं हुई। अधिकांश देशों में राष्ट्रपति को कार्यपालिका प्रमुख बनाकर शक्तिशाली बना दिया गया और संसद अपेक्षाकृत एक कमजोर संस्था बन गयी।

साम्यवाद से पूँजीवाद की ओर संक्रमण के लिए यह तरीका बेहतर तरीका नहीं था। पूँजीवादी सुधार तुरन्त किये जाने की अपेक्षा धीरे-धीरे किये जाने चाहिए थे। एकदम से सभी प्रकार के परिवर्तनों को लोगों पर लादकर उन्हें आघात देना सही नहीं था।