परीक्षा से एक घण्टे पूर्व ! एक घण्टे पूर्व परीक्षार्थी की मानसिकता कैसी हुआ करती है, वाह ! क्या सवाल है ! अरे भई, जिसने आज तक एक भी परीक्षा दी है, वह भली प्रकार समझता-जानता है कि तब क्या दशा हुआ करती है। एक बार भी परीक्षा के अनुभव से गुज़रा हुआ व्यक्ति हर उस व्यक्ति के दिल की धड़कनें सहज ही गिन सकता है कि जो आज परीक्षा देने जा रहा है। खैर, हर परीक्षार्थी की तरह परीक्षा-भवन में प्रवेश करने से पहले मेरा मन भी तरह-तरह की आशंकाओं से भर रहा था। एक घण्टे पहले नहीं, बल्कि कई दिनों पहले से ही मेरी स्थिति कुछ अजीब-सी बन रही थी। जब मैं सीनियर सैकण्डरी में पढ़ता था, तब की बात और थी। यों परीक्षा से पहले हृदय धड़कने तो तब भी लग जाया करता था; पर तब पढ़ाई कर क्रम नियमित रहने के कारण उतना डर नहीं रहता था। फिर तब यह आश्वासन भी रहा करता था कि सभी परीक्षा-निरीक्षक ग्रुप वही होंगे, जिनसे हम पढ़ते और रोज़ मिलते हैं। कई बार वे सामान्य प्रकार की सहायता भी कर देते हैं, मैंने यह भी सुन रखा था और अपनी स्कूली परीक्षा में इस प्रकार की सहायता कई बार प्राप्त भी कर चुका था। परन्तु इस बार मैंने बी० ए० प्रथम वर्ष की परीक्षा देनी थी। यह सच था कि यह परीक्षा उसी महाविद्यालय में होने जा रही थी, जिसमें मैं पढ़ रहा था; परन्तु यह पता नहीं था कि हमारे कक्ष में निरीक्षक बनकर जो आएंगे, वे कौन-से प्राध्यापक होंगे। हमारे महाविद्यालय में सवा सौ से अधिक प्राध्यापक हैं। उनमें से केवल छ:सात ने ही हमें पढ़ाया है। उनको छोड़कर न हम अन्यों से परिचित थे और न वे ही हमें जानते थे। फिर यह भी सुन रखा था कि महाविद्यालय के परीक्षा-निरीक्षक बड़े चौकन्ने और स्वभाव के सख्त हुआ करते हैं । वे न तो स्वयं ज़रा-सी भी सहायता किया करते हैं और न साथियों से लेने ही देते हैं। इन्हीं सब कारणों से मैं यों तो परीक्षा निकट आने पर कई दिनों से चिन्तित था; पर पिछले एक-डेढ़ दिन से तो मेरी चिन्ता पराकाष्ठा पर जा पहुंची थी। ____ कल सुबह नौ बजे परीक्षा आरम्भ होनी थी। अभी दो-तीन दिन पहले ही मैं कुछ कंजियाँ, कुछ अनुमानित पत्र और गाइडें खरीद के लाया था। साल-भर तो मौजमस्ती या यूनियनबाजी करता रहा था, बसें रोकता और जिस-किसी भी बात को लेकर हड़तालें आदि करता रहा था; अतः कक्षाओं में न जा पाने और हाज़रियाँ रोब-दाब और चाय-पानी के बल पर मिल जाने के कारण परीक्षा में बैठने का अवसर मिल रहा था। परन्तु पाठ्य विषयों का ज्ञान तो महज़ वहीं तक सीमित था कि जो बारहवीं कक्षा में प्राप्त किया था। वह भी अब कहाँ याद रह गया था ! जो हो, परीक्षा तो देनी ही थी, सो कुंजिया वगैरह खरीद कर ले आया और कुछ अटकलपच्चू से, कुछ पढ़ाकू छात्रों से पूछ-पाछ कर पढ़ाई करने लगा। लेकिन इतने कम समय में, विषय-ज्ञान की दृष्टि से शून्यावस्था में पढ़ाई क्या खाक होनी थी ! फिर भी ज्यों-त्यों करके अनुमानित पत्र और पिछले दस सालों में आए प्रश्नों को चाटने की कोशिश करने लगा। कल नौ बजे परीक्षा शुरू हो रही थी, सो मैं रात को भी पढ़ने की चेष्टा में लगा था। परन्तु न तो पढ़ ही पा रहा था और न पढ़ने पर समझ में ही कुछ आ रहा था, न नींद ही आ रही थी । बार-बार जम्हाइयाँ लेता पन्ने पलटता रहा। कभी लेट जाता और कुछ ही देर बाद चौंक कर उठ बैठता। इस प्रकार रात कब बीत गई, पता ही न चल पाया। माता जी ने आकर आवाज दी और चेताया कि परीक्षा देने जाना है, सो जल्दी से नहा-धोकर तैयार हो जाऊँ। उबासियाँ और अंगड़ाइयाँ लेता हुआ मैं उठा और मुंह में ब्रश लगा, उसे दाँतों पर घुमाता हुआ स्नानागार की तरफ चल दिया।

नहा-धोकर आया और एक कप चाय पीकर फिर आज के परीक्षाविषय की पुस्तकें यानी कुंजियाँ आदि उठाकर उलटने-पलटने लगा । बार—बार नज़रें 'टाइमपीस' की सुइयों पर जाती, समय बड़ी तेजी से भागा जा रहा था। घड़ी साढ़े सात बजा रही थी। इसमें से आधा घण्टा तो परीक्षाभवन तक पहुँच पाने में लगना था, बाकी बचा एक घण्टा और बस, परीक्षा की वास्तविक तैयारी करने के लिए मेरे पास एक ही घण्टा शेष बच रहा था। सो, परीक्षा का भय और तैयारी की जल्दी दिल की धड़कनों को तेज़ करने लगी। पढ़ाकू साथियों से जो कुछ आवश्यक प्रश्न लाया हुआ था, गाइड और कुंजियों की मदद से उन्हें पढ़ने का प्रयास करने लगा। दो-चार पंक्तियाँ पढ़ता कि फिर ध्यान बँट जाता। बड़ी मुश्किल से मैं फिर पुस्तक पर नज़रें गढ़ा देता कि टाइमपीस की टकटक बड़ी तेज़, रोजाना की तुलना में कहीं अधिक तेज़ होकर सुनाई देने लगती। आँखें बरबस उधर उठ जातीं और लगता कि समय बड़ी तेजी से भागा जा रहा है। मेरा दम घुटने लगता, प्रश्न उठता कि अब क्या होगा? अपने-आप को कोसने लगता कि क्यों साल-भर यों ही गँवा दिया ? मौजमस्ती, हुल्लडबाजी, राजनीति और हड़ताल आदि ने आखिर क्या दिया मुझे! यह साल तो खराब होकर ही रहेगा। सोचता और फिर आवश्यक प्रश्नों को पढ़ने की कोशिश करने लगता; पर पढ़ता क्या ? पहली बार अनुभव किया कि कहावतें यों ही नहीं बन जाया करतीं। उस दिन पढ़ने की कोशिश करने पर मुझे सचमुच काला अक्षर भैस बराबर नजर आने लगता और मैं मन मार कर रह जाता।



नज़र उठाकर ठकाठक-ठकाठक चली जा रही मेज़-घड़ी की तरफ देखा। परीक्षा शुरू होने वाले बाकी बचे एक घण्टे में से लगभग बीस मिनट और कम हो चुके थे । ओह ! मैंने उकताई नज़र से कुंजियों की तरफ देखा। सामने एक आवश्यक प्रश्न निकला हुआ था। पता नहीं क्या हुआ कि मैंने झट से उस प्रश्न को पुस्तक में से फाड़ा और उसे तिहराचौहरा लपेटकर अपनी जेब के हवाले करने लगा। तभी मेरा एक सहपाठी दूर से ही यह कहते हुए वहाँ पर आ धमका-"अरे सन्नी, चल रहे हो कॉलेज !” मैंने बड़ी बेचारगी से उसकी तरफ देखा, वह बड़ा खुश और प्रसन्न नज़र आ रहा था। उसके चेहरे पर ताज़गी थी, जबकि मेरे मुंह पर बारह बज रहे थे। यह मित्र वास्तव में बड़ा पढ़ाक और नियमित रूप से पढ़ाई करने वाला था। मुझे भी अक्सर सलाह दिया करता था कि अपना पहला काम ठीक से लिखना-पढ़ना है, बाकी सब तो बाद में भी किया जा सकता है; पर तब मैं इसकी बातों को हवा में उड़ा दिया करता था। आज उसकी बातें मन में बिजली बनकर कौंधने और गिरने लगी थीं। पास पहुँचकर वह फिर बोला--"चल रहे हो? कहो, कैसी हुई तैयारी ?" सुनकर मैं खिसियानी-सी हँसी हँसकर रह गया। बड़े डूबे हुए स्वर में उसे जवाब दिया-"तैयारी क्या होनी थी! बस, यू ही-सा है। यों इम्तहान तो देना ही है; पर पास तो अगले साल ही हो सकेंगे।"

मेरी बात सुनकर मित्र मेरा मुँह देखने लगा। फिर कुछ ढारस बँधाते हुए कहने लगा कि यार, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। परीक्षा है, कोई हौआ तो नहीं। फिर वह मुझसे पूछने लगा-“फलाँ प्रश्न कर लिया, अमुक देख लिया, यह प्रश्न जरूर आएगा । नहीं देखा, तो अभी भी देख लो।" परन्तु मैं क्या उत्तर देता? कुछ भी तो देखा-सुना नहीं था। वह मेरे सामने रखी पुस्तकें उठाकर बताने लगा- “यह प्रश्न बहुत आवश्यक है और यह--यह भी।" उसने जो-जो प्रश्न बताए, वे उत्तर समेत फाड़कर मैंने जेब के हवाले कर दिए। मित्र हैरानी से मेरी तरफ देखता रहा। उसकी आँखों में प्रश्नात्मक भाव लटका रहा। फिर धीरे से 'अच्छा, मैं चलता हूँ' कहकर वह चुपचाप चल दिया । इस सारी क्रिया-प्रक्रिया में दस-बारह मिनट और खप गए थे । घड़ी पर देखा, आठ बजे से सुई आगे सरक चुकी थी। उफ़ ! मैं कुछ भी तो समझ नहीं पा रहा था। मित्र के बारे में खयाल आया, वह कितना निश्चिन्त था ! उस जैसे पढ़ने वाले अन्य सभी भी इसी की तरह निश्चिन्त होंगे। मजे-मज़े से अपने-अपने परीक्षा-भवन की ओर जा रहे होंगे और एक मैं हूँ कि अपने-आपमें ही एक जीवन्त हीनता बनकर रह गया हूँ!

मन लग नहीं रहा था, सो केवल पन्ने पलटते रहना बेकार था। जाने क्या विचार आया कि झट से कपड़े पहने। कुछ उत्तरित अनुमानित पत्र और पहले फाड़े उत्तर जेबों में भरे और घर से निकल बस स्टॉप की तरफ चल दिया। कोई साढ़े आठ बजे ही उसने कॉलेज पहुंचा दिया। वहाँ लगी रोल नं० की लिस्टों पर झुके परीक्षार्थी अपने-अपने परीक्षा-कक्षों के नम्बर और रोल नम्बर देख रहे थे। जिन्होंने देख लिए थे वे आस-पास यों ही खड़े गप्पे हाँक रहे या किसी को बन-बना रहे थे। उधर लॉन में बैठे कुछ छात्र अब भी पढ़ या आपस में किसी प्रश्न पर विचार-विमर्श कर रहे थे। मेरे जसे कुछ छात्र इधर-उधर ऐसी जगह ढूंढ रहे थे कि जहाँ साथ लाए नक़ल का मसाला सुरक्षित छिपा या रखा जा सके । मैंने देखा कि मेरी ही कक्षा का एक छात्र पूरी पुस्तक पेशाब घर के पानी वाले टैक के ऊपर रख रहा है। इसी प्रकार मुझे यह भी अनुभव हुआ कि कुछ दादा टाइप के विद्यार्थी अपने साथ कुछ बाहरी दादाओं को भी लेकर आए हुए थे। वे उन्हें कक्षा-भवनों के आस-पास की स्थितियाँ दिखा और समझा रहे थे, ताकि यदि सम्भव हो सके, तो वे उन्हें सहायता पहुंचा सकें। उनमें से एक तो अपनी जेब से बार-बार चाकू जैसा कुछ निकालकर, उसे दिखाते हुए आश्वस्त कर रहा था कि वह हर हाल में उसे बाहर से सहायता पहुँचाएगा ही, चाहे कुछ भी क्यों न करना पड़े। यह देखकर मेरा परीक्षा देने का रहा-सहा उत्साह भी जाता रहा । मेरी जेबों में नकल की इच्छा से जो प्रश्नोत्तर पुस्तकों से फाड़कर रखे हुए थे, रह-रहकर वे मेरी अन्तरात्मा में नुकीली चीज़ की तरह चुभने लगे । आत्मा धिक्कारने लगी-बारहवीं तक अपनी कक्षा में प्रथम-द्वितीय स्थान पर आने वाले तुझको महाविद्यालय में पहुंचकर यह क्या हो गया है ? तेरी बुद्धि को जंग क्यों लग गया है आखिर? किस कुण्ठा से घिरकर आज तुम अपने लिए ही अजनबीसे बनकर रह गए हो? क्यों तुम्हें आज इस तरह नकल करने की तैयारी करनी पड़ी है नालायक ! धिक्कार है। धिक्कार है तुम्हें!



मैं जल्दी से उधर झाड़ियों की तरफ बढ़ चला । वहाँ जाकर मैंने जेबों से वे सारे कागज़-पत्र निकाले, जो नकल करने की इच्छा से पुस्तकों से फाड़कर लाया था। उन्हें निकाल, फाड़के चिन्दी-चिन्दी कर हवा में उड़ा दिया। ऐसा करने के बाद मुझे लगा कि मेरे मन-मस्तिष्क, मेरा शरीर सभी बहुत हल्के हो गए हैं । कोई भी बोझ कतई नहीं रह गया । तभी महाविद्यालय के भीतर से घण्टी बज उठी। कलाई घड़ी देखी, नौ बजने में मात्र पन्द्रह मिनट शेष रह गए थे। घण्टी पन्द्रह मिनट बाद परीक्षा शुरू होने की सूचक थी। जो हो प्रसन्न और निश्चिन्त मन से मैं तेज-तेज़ डग भरता अपने परीक्षा-कक्ष की तरफ चल दिया। तैयारी और पढ़ाई न होने के कारण दिल अवश्य धड़क रहा था; पर कोई बेकार की उत्तेजना या तनाव नहीं था। अपनी सीट पर बैठकर पता नहीं क्या गुनगुनाने और पैर हिलाने लगा। ठीक नौ बजे फिर घण्टी बजी और प्रश्नपत्र बँटने लगे। मैंने भी हाथ बढ़ाकर प्रश्नपत्र लिया और धड़कते दिल से उसे देखने लगा। कोई भी प्रश्न मुझे नहीं आता था-सिवाय अन्तिम एक के, जिसका उत्तर यहाँ लिख रहा हूँ। इसे समाप्त कर जल्दी ही यह विश्वास मन में लेकर यहाँ से जाऊँगा, कि अगले वर्ष जब फिर परीक्षा आएगी, तब मेरा मन अपने मित्र के समान ही हल्का और निश्चिन्त होगा। एक आत्मविश्वास होगा कि मैंने यह परीक्षा की जंग अच्छे अंक लेकर जीतनी ही।