जीवन में कई बार ऐसी घटनाएँ भी घट जाया करती हैं, जिनकी याद हमेशा बनी रहा करती है। कुछ ऐसे दिन भी आकर चले जाया करते हैं. जिनकी स्मृतियाँ भुलाए नहीं भूलतीं। मेरी स्मृति में वह एक दिन आज भी ताज़ा है, जिस दिन मैंने प्रवेश लेने के बाद विश्वविद्यालय के अपने इस महाविद्यालय में पहला क़दम रखा था। ओह ! कितना लोमहर्षक था वह दिन ! याद आने पर आज भी सहसा रोमांच होने लगता है। बारहवीं कक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद मैंने चाहा था कि इसी महाविद्यालय में प्रवेश मिले । सो पहली लिस्ट में तो नहीं, दूसरी में मेरा नाम अवश्य आ गया और मुझे अपने इच्छित महाविद्यालय और इच्छित विषय में प्रवेश मिल ही गया। ग्रीष्मावकाश समाप्त होने से कई दिन पहले से ही मैं महाविद्यालय में जाने की तैयारी करने लगा। जब तक स्कूल में था, गर्मी की छुट्टियों में साल-भर के लिए नई वर्दियाँ सिलाया करता था; पर वदियाँ सिलाने और पहनने का झंझट छूट चुका था। इसलिए मैंने अपनी इच्छानुसार आधुनिक डिजायनदार और फैशन के कपड़े सिलाए। जूते भी नए और आधुनिक लिए। स्कूल में थोड़े-से भी बाल बढ़ने पर अध्यापक लोग पकड़कर उन्हें खेंचने लगते थे; पर अब इस प्रकार की कोई समस्या नहीं रह गई थी। सो मैंने बाल बढ़ाए भी और उन्हें नए कॉलिजिएट फ़ैशन में कटवाया भी। इस प्रकार कॉलेज में जाने के लिए कई दिन पहले से ही हर प्रकार से तैयारी करता रहा।
। मैंमें सुन रखा था कि महाविद्यालयों का वातावरण काफ़ी खुला और स्वच्छन्द हुआ करता है। यह भी कि वहाँ स्कूल जाने की तरह पीठ पर बस्ता लादकर नहीं जाना पड़ता । अधिक-से-अधिक एक डायरी या नोटबुक ली
और चल दिए पढ़ने । यह भी पता चला था कि कुछ लोग तो डायरी या नोटबुक तक उठाकर महाविद्यालय में पहुंचने में अपनी हतक मानते हैं । खैर, मैंने दो-तीन नोटबुक भी खरीद कर रख लीं। वैसे भी क्योंकि मुझे . खाली हाथ लटकाए चलना अच्छा नहीं लगता, आज भी कहीं जाते समय हाथों में कुछ-न-कुछ अवश्य रखा करता हूँ; सो सोचा कि जब महाविद्यालय में प्रतिदिन जाना ही है, तो कम-से-कम एक पैन और नोटबुक पास रहनी ही चाहिए। कभी भी इनकी आवश्यकता पड़ सकती है। यह तो हुई बाहरी तैयारी; पर वहाँ जाने के लिए एक विशेष प्रकार की सुरुचिसम्पन्नता और मानसिकता का रहना भी आवश्यक हुआ करता है, यह भी मुझे बताया गया था। इस कारण मैं महाविद्यालय में पढ़ने जाने के लिए अपनी मानसिकता भी तदनुरूप बनाने का प्रयास करता रहा। अभी तक मैं जिस विद्यालय का छात्र रहा था, वहाँ सहशिक्षा नहीं थी। केवल लड़कों और पढ़ाने वाले अध्यापकों से ही पाला पड़ता था। इस कारण कोई विशेष झिझक वगैरह नहीं होती थी, पर अब जिस महाविद्यालय में पढ़ने जा रहा था, वहाँ सहशिक्षा थी। पढ़ाने के लिए प्राध्यापक भी स्त्री-पुरुष मिले-जुले थे। अतः एक स्वाभाविक लज्जा और झिझक का भाव रह-रहकर मन में उभर आता। सोचता, कैसे लड़कियों के साथ बैठकर पढ़ सकूँगा? पढ़ाने वाले यदि प्राध्यापक हुए, तब तो ठीक है, यदि प्राध्यापिकाएँ हुईं, तब तो शायद मैं आँखें उठाकर उनकी तरफ देख तक नहीं पाऊँगा । जब मन में ही दुविधा और बोझ रहेगा, तो पढ़ाई क्या खाक हो सकेगी? फिर आप ही मन को ढारस बँधाता कि लड़कों के स्कूल से आने वाले तुम अकेले तो होगे नहीं। और भी पता नहीं तुम्हारे जैसे कितने छात्र होंगे ! जैसे वे सब पढ़ेंगे, व्यवहार करेंगे, तुम भी कर लेना। फिर लड़कियाँ भी तो ऐसी हो सकती हैं, जो महज़ लड़कियों के स्कूलों से आई होंगी। वे भी तो तुम लड़कों के साथ कक्षा में बैठकर और मिल-जुल कर पढ़ेंगी, अन्य सारे शैक्षणिक कार्य भी करेंगी। तब फिर चिन्ता और झिझक किस बात की? जो हो, इस प्रकार के तर्क-वितर्क करके मैं ग्रीष्मावकाश के दिनों में ही महाविद्यालय जाने के लिए मानसिक तैयारी करता रहा।
धीरे—धीरे एक-एक दिन करके ग्रीष्मावकाश समाप्त हुआ। कल सोलह
को मझे पहली बार महाविद्यालय जाना था, पर पन्द्रह की रात को ही मन धूक-धुक करने लगा। चाहकर भी रात-भर नींद नहीं आ किसी ने बताया था कि जो छात्र महाविद्यालय में नए-नए आते हैं

और सीनियर छात्र उनकी रेगिंग भी किया करते हैं। रेगिंग का स्वरूप सामान्य या नरम भी हो सकता है और उग्र भी। इस कारण कई नए छात्र-छात्राएँ तो महाविद्यालय खुलने के तत्काल बाद दो-चार दिनों तक आया ही नहीं करते । जब मामला शान्त हो जाता है, तब आते हैं। मैं भी रात-भर सोचता रहा कि कल पहले दिन जाऊँ कि न जाऊँ? मैंने यह भी सन रखा था कि पहले दिन महाविद्यालय के प्राचार्य महोदय अन्य प्राध्यापकों के साथ आकर नए छात्रों का मार्ग-दर्शन करने के लिए उन्हें सम्बोधित किया करते हैं। इस कारण वहाँ रहना यद्यपि आवश्यक तो नहीं हआ करता; पर मार्गदर्शन की दृष्टि से उचित एवं अच्छा अवश्य हआ करता है। सो अच्छे-बुरे दोनों पक्षों को सोचने के बाद मैंने अगली सबह जाने का ही निश्चय किया। न जाना एक तरह की कायरता मानी। कायर कहलाना मुझे कतई पसन्द नहीं।


सोलह जुलाई की सुबह ! मैं आज अन्य दिनों की तुलना में जल्दी जाग गया। व्यर्थ में इधर-उधर बैठकर समय भी नहीं बिताया। उठते ही प्रातःकाल की क्रियाओं से निवृत्त होने के लिए चला गया। नहाया-धोया
और पसन्द की बढ़िया पैण्ट-शर्ट निकालकर पहनी। तब तक माँ ने नाश्ता तैयार किया; पर जाने क्यों, आज ठीक प्रकार से पहले की तरह पेट भर नाश्ता नहीं कर सका । नोटबुक उठाकर जब घर से चलने लगा, तो दिल धड़क रहा था। माता जी ने कहा, आज पहले दिन कॉलेज जा रहे हो, ठीक से रहना और समय पर घर लौट आना। उनकी बात का उत्तर मात्र 'हूँ' में देकर मैं उछलते मन से घर से निकल पड़ा। तेज़ क़दम बढ़ाता हुआ बस-स्टाप पर आया। वहाँ शायद मेरी ही तरह के कुछ और छात्र-छात्राएं भी खड़े होकर बस आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। आपस में परिचित न होने पर भी हम सबने एक-दूसरे की तरफ खिसियानी-सी मुस्कान के साथ देखा और फिर इस तरह मुंह मोड़ लिए जैसे कुछ हुआ ही न हो। कुछ क्षण और बीत गए। आखिर बस आती दिखाई दी और जैसा कि दिल्ली परिवहन निगम की बस-सेवा ने हमारी आदत बना दी है, शिकारी कुत्ते की तरह शिकार झपटने के अन्दाज़ में बस पर चढ़ जाने को सन्नद्ध हो गए। बस के आने पर हमें वैसा ही व्यवहार करना पड़ा। लेकिन जिस तरह आँख बचाकर कई बार शिकार शिकारी के पंजों से बच निकलता है, उसी प्रकार सभी प्रतीक्षारत सवारों को चढ़ाए बिना ही बस उड़ गई । शुक्र है कि पहले झपट पड़ने के कारण मैं बस में घुस पाने में सफल हो गया था। भीतर भी यात्री एक-दूसरे को धकेलते हुए आगे-पीछे हो और चढ़-उतर रहे थे। कोई बीस मिनटों तक बस के चलते रहने के बाद जब मुझे अपना महाविद्यालय आता हुआ प्रतीत हुआ, तो मैं उससे एक स्टॉप पहले ही बस से उतर कर पैदल चलने लगा।


पैदल चलते-चलते मैंने कई बार कपड़े झाड़े, बालों पर हाथ फेरा, फिर कंघी की, एक-दो बार रुककर पैण्ट को कुछ ऊपर-नीचे एवं इधरउधर किया। ऐसा करते समय अक्सर बग़ल में दबी हुई नोटबुक गिर जाती । झुंझला कर उसे उठाता और चलने लगता। जैसे-जैसे मेरा महाविद्यालय समीप आता जा रहा था, दिल की धड़कनें तेज़ होने लगी थीं। आस-पास ध्यान से देखने पर लगा कि मेरे जैसे और भी कई तेज़ी से मेरी मंजिल की तरफ ही बढ़े चले जा रहे हैं। हम लोग एक-दूसरे को केवल कनखियों से देख पा रहे थे। कुछ छात्राएँ भी जाती हुई दिखाई दी। छात्र हों या छात्राएँ, पर जान पाना कठिन था कि इनमें से कौन नया है और कौन पूराना । खैर, चलते-चलते अब मुझे महाविद्यालय का ऊँचा मुख्य द्वार दिखाई देने लगा था। कुछ दूर से ही देखा, वहाँ काफ़ी चहल-पहल थी। लोग आ-जा रहे थे । बाहर से आने वालों में से कुछ गलबहियाँ डाले आगे बढ़ रहे थे। कुछ 'हैलो, हाय' कहते गले भी मिल रहे थे। जवान हँसियों, कहकहों, उन्मुक्त बातों, फिकराकशी आदि से सारा वातावरण गूंज रहा था। बाहर से आने वाले प्रायः सभी निधड़क हो गेट के भीतर धंसे जा रहे थे। कुछ मेरे जैसे नए क्षणभर रुकते और फिर इधर-उधर झाँक भीतर घुस जाते। गेट के आस-पास ऊंची दीवारें और हरियाली झाड़ियाँ होने के कारण पता न चल पाता कि भीतर जाने के बाद किसी के साथ क्या बीता, क्या घटा। मैं भी गेट से पाँच-दस क़दम इधर ही रुक गया। एक बार यों कमीज का कॉलर ठीक किया, बालो पर हाथ फेरा और फिर अनमना
गनगनाने का प्रयत्न करते हुए गेट के भीतर घुस चला। दोचार कदम ही भीतर चल पाया हूँगा कि पता नहीं कहाँ से निकल किसने कन्धे पर हाथ रख पीछे को खींच लिया और बोला :
सर सर ! आप तो यहाँ के सीनियर प्राध्यापक हैं. 'सर ! सर, मझे बचा लीजिए' 'वे. 'वे, मेरी रेगिंग करना चाहते हैं, सर..."
मैंने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा। उसका चेहरा देखकर ही लगा कि वह कोई सीनियर छात्र है और मुझे बनाने की कोशिश कर रहा है। मैंने समझ लिया, कि अब फंस चुका हूँ। बचाव का कोई उपाय नहीं। सो आगे जो कुछ घटित होना था, मन-ही-मन उसकी तैयारी करने लगा। मझे चप और घबराया हुआ देखकर एक बार फिर वह गिड़गिड़ाया; पर अगले ही क्षण चारों ओर से हँसी के कहकहे गूंजने लगे। उनके साथ ही झाड़ियों की ओट से तीन-चार सीनियर छात्र और भी निकल आए और 'सर' 'सर' करने लगे । अपना बचाव करने की सोचकर मैंने कहा, "भाई साहब, मैं आप लोगों का छोटा...” परन्तु मेरी बात पूरी होने से पहले ही वहाँ फिर कहकहे गूंजने लगे—“भाई साहब अ हः हः हः हः भाई साहब हः हः हः" और अगले ही क्षण वहाँ एकदम सन्नाटा छा गया। दो-चार क्षण बाद उनमें से एक ने प्रश्न दागा


"नये मुर्गे हो?" ना "जी-जी, आपका छोटा 'नया साथी भाई..."
"नहीं-ई !" मेरी बात बीच में ही काटते हए वह फिर बोला-“साथी और भाई नहीं ! कहो, नया मुर्गा हूँ, कहो-कहो!" और फिर आदेश देते हुए वह कड़क कर बोला-"कहो !"
"हाँ हाँ-आँ. 'न-नया मुर्गा ही हूँ।" मैंने कह दिया और मेरी घिग्घी बँध गई।
___“मुर्गे हो, तो फिर मुर्गे बनो बनो मुर्गा !" उसने कड़ककर कहा और मुझे मुर्गा बन ही जाना पड़ा। यह देख वे लोग हो-हो-हा-हा करते जोर-ज़ोर से हँसने लगे। मैं जब तक मुर्गा बना रहा, वे लगातार हंसते और उछलत रहे । मुझसे अब मुर्गा बने खड़ा नहीं हआ जा रहा था। सो मैं सीधा होकर खड़ा हो गया। यह देखकर वे लोग मुझे फिर से वैसे ही होने को कहते रहे, गर्दन से पकड़कर झुकाने की चेष्टा भी की; पर मुझे झुका नहीं सके । मुझे ढीठ बनकर खड़े देख उन लोगों ने आपस में कुछ इशारे किये
और फिर मुझे चलने को कहा। मैं हाँफता हुआ-सा उनके साथ चुपचाप चलने लगा। कुछ दूर जाने पर एक ने मेरा हाथ मज़बूती से पकड़ लिया। मैंने जरा गुस्से से कहा, "छोड़ दो मेरा हाथ । जहाँ कह रहे हो, वहीं चला जा रहा हूँ। मुजरिम नहीं हूँ जो हाथ पकड़ कर ले जाओगे।" कुछ हक्के-बक्के से होकर उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया और मुझे घेरकर चलने लगे। उनके बताए रास्ते पर चलते हए हम लोग महाविद्यालय के पीछे स्थित खेल के मैदान में पहुंचे। वहाँ जो कुछ हो रहा था, उसे देखकर मेरा कलेजा काँप गया। मैंने देखा कहीं पर कोई बेचारा नंगे बदन उठक-बैठक कर रहा है, कोई दण्ड पेल रहा है, कोई कान पकड़ कर आगे की और कोई पीछे की तरफ दौड़ने को विवश हो रहा है । मैंने मन-ही-मन कहा, बुरे फंसे आज तो! लगता है, यह सब झेले बिना छुटकारा नहीं ! सो मन को मजबूत करने लगा।


 मैदान के एक किनारे पर पहुँच उन लोगों के साथ मैं भी रुक गया। एक ने आगे बढ़ कर मेरे हाथ से नोटबूक झपट ली, दूसरे ने मेरी जेबों की तलाशी लेनी चाही तो मैंने झटका देते हुए कहा, यह सब नहीं चलेगा। क्या? उन्होंने मुझे घूरकर देखा और दो-चार क्षणों बाद कमीज़ उतारने के लिए आदेश दिया। मैंने उनके आदेश का पालन करते हुए कमीज़ उतारकर एक जगह रख दी। फिर नया आदेश मिला, पूरे मैदान का चक्कर लगाकर आओ ! विवशता से चक्कर लगाने भागना पड़ा। उनमें से एक पहलवान टाइप का छात्र भी मेरे साथ भागता और चक्कर लगाता रहा।
 एक-दो नहीं, बड़ी कठिनाई भरे तीन चक्कर लगाने पड़े। अब एक सौ एक बैठकें लगाओ। वह भी ज्यों-त्यों लगा दीं। सब आदेश हुआ कि अब वह पहलवान पीठ पर ठेगा और मुझे उसे लिए हुए मैदान का एक चक्कर लगाकर आना होगा। परन्तु मैं न तो कुछ बोला और उनके बार-बार कहने पर भी न झुका ही। मेरे चारों तरफ अन्य नए छात्रों के साथ भी कुछ इसी प्रकार का व्यवहार किया जा रहा था। बिना विरोध सभी सब सहे जा रहे थे । पर मैंने अब विरोध करने की ठान ली थी। सो चपचाप खड़ा-खड़ा हांफता रहा । उनके अगुआ ने पहलवान से कहा कि वह मुझे पकड़कर ज़मीन पर उलटा लिटा दे। पहलवान ने घरकर मझे देखा और मुझे लिटाने के लिए आगे बढ़ आया। मैंने भी स्कूल से अपना शरीर कसरती बना रखा था, सो पहलवान ने जैसे ही मुझे पकड़ा, मैंने एक झटका दिया और पहलवान छिटक कर परे जा गिरा। वे सभी आश्चर्य से भरकर मुझे देखने लगे, देखते रहे। फिर अगुआ छात्र ने मेरे पास आकर मेरी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा-"बेवो-ब्रेवो! भई, सचमुच बड़े बहादुर हो ! आओ हमारे साथ ।"


उसने बड़कर मेरा हाथ थाम लिया । मैंने अपना कमीज़ उठाकर यों ही कन्धों पर फेक लिया। वे सभी मुझे कैंटीन में ले गए। वहाँ जी भरकर मुझे खिलाया-पिलाया और खुद भी खाया-पिया। जब मैंने पैसे देने चाहे, तो नहीं देने दिए। फिर सभी ने अपना परिचय देते हए बारी-बारी मुझसे हाथ मिलाया। मेरा परिचय भी जाना । उसके बाद वे सभी जब तक भी हमारे महाविद्यालय में रहे, मेरे साथ छोटे भाई जैसा व्यवहार करते रहे। उस दिन वही मुझे उस हॉल कमरे में भी पहुँचा कर आए, जहाँ प्राचार्य महोदय ने नए आए छात्रों को सम्बोधित करना था। इस प्रकार महाविद्यालय में पहले दिन का अनुभव काफ़ी कुछ तीता होने पर भी उसका अन्त बुरा नहीं कहा जा सकता, जबकि कई जगह दुखद अन्त भी सुनने को मिले । जहाँ तक मेरा प्रश्न है, सीनियर बनकर भी मैंने कभी किसा नवागन्तुक साथी को कष्ट देने का प्रयास नहीं किया। अपना परिचय द उन्हें सहायता ही पहुंचाई। जो हो, आज भी वह पहला दिन कभी-कभा याद आकर रोमांचित कर जाया करता है।