1991 ई. के विघटन के फलस्वरूप पृथक हुए 15 गणराज्यों में रूस सर्वाधिक शक्तिशाली और साधन-सम्पन्न था। अतः सुरक्षा परिषद् में उसे सोवियत संघ के उत्तराधिकारी राज्य के रूप में मान्य किया गया तथा उसे सोवियत संघ का स्थान दिया गया।

भारत ने भी रूस के साथ अपने संबंध वही रखे, जो सोवियत संघ के साथ थे। 1988 ई. में रूस ने भारत की गुटनिरपेक्ष नीति का समर्थन और स्वागत किया।

रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने 1993 ई. में भारत की यात्रा की तथा महत्त्वपूर्ण संधियों पर हस्ताक्षर किये। दोनों देशों में एक-दूसरे के खिलाफ कोई भी कार्रवायी नहीं करने की सहमति भी हुई।

1994 ई. में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंहाराव की रूस यात्रा के दौरान दोनों देशों की बीच 11 संधियाँ हुई।

1998 ई. में भारत द्वारा किए भूमिगत परमाणु-परीक्षण की जहाँ विश्व के अन्य देशों ने निंदा की, वहीं रूस ने इसकी प्रशंसा की तथा इसी समय भारत और रूस में विभिन्न विषयों पर 7 संधियाँ हुई।

रूस ने भारत के सुरक्षा परिषद् की सदस्यता के दावे का समर्थन किया।

1999 ई. में कारगिल युद्ध के समय रूस ने पुनः भारत का पक्ष लिया। इस समय भारत और रूस में हवाई युद्ध की सामग्रियों के संबंध में महत्त्वपूर्ण संधि हुई।

2000 ई. में रूसी राष्ट्रपति ब्लादमीर पुतीन की भारत यात्रा के दौरान एक संयुक्त घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किये गये, जिसका मुख्य उद्देश्य आतंकवाद को रोकना था। आतंकवाद से निपटने के लिए एक संयुक्त कार्य दल के गठन का निर्णय भी लिया गया।

फरवरी, 2002 ई. में भारतीय रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नाडिस तथा रूसी उपप्रधानमंत्री इल्या क्लेबानोव के बीच एक व्यापक सैन्य-संधि हुई।

आज भारत का झुकाव अमेरिका की ओर बढ़ा है। रूस भी पाकिस्तान और चीन से घनिष्टता बढ़ा रहा है। लेकिन इससे भारत-रूस सम्बन्धों पर कोई असर नहीं पडा है। हाल के वर्षों में भारत-रूस के बीच अनेक समझौते हुए हैं। इस प्रकार समय के प्रत्येक सोपान पर भारत-रूसी संबंध घनिष्ठता की ओर बढ़ता गया।