अमेरिका के वर्चस्व में बाधाएँ एवं सीमाएँ उसी के भीतर मौजूद हैं, जो निम्नलिखित हैं -

(i) अमेरिका की संस्थागत बनावट : अमेरिका में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के अंतर्गत पृथक्करण का सिद्धान्त अपनाया गया है। इसमें शासन के तीन अंगों-कार्यपालिका, विधानपालिका और न्यायपालिका-में शक्तियों का बँटवारा है। यही बनावट कार्यपालिका द्वारा सैन्य-शक्ति के बेलगाम प्रयोग पर अंकुश लगाने का काम करती है।

(ii) अमेरिकी समाज की उन्मुक्त प्रकृति : अमेरिकी समाज की प्रकृति उन्मुक्त है। अमेरिका में जनसंचार के साधन समय-समय पर वहाँ के जनमत को विशेष दिशा में मोड़ने के लिए चाहे जितना मर्जी प्रयत्न कर लें, अमेरिकी राजनीतिक संस्कृति इस प्रकार की है कि लोग शासन के उद्देश्य और तरीके को गहरे सन्देह के भाव से देखते हैं। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका के विदेशी सैन्य अभियानों पर अंकुश रखने में सफलता मिली है। उदाहरणतया वियतनाम के संघर्ष का अंत करवाने में अमेरिकी जनमत की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

(i) नाटो संगठन की भूमिका : नाटो संगठन एकमात्र ऐसा संगठन है जो अमेरिकी शक्ति पर नियंत्रण कर सकता है क्योंकि नाटो के सदस्य देशों में बाजारमूलक व्यवस्था है और इसीलिए अमेरिका का बहुत बड़ा हित लोकतांत्रिक देशों के इस संगठन से जुड़ा हुआ है। इसी के परिणामस्वरूप यह संभावना बनती है कि 'नाटो' में सम्मिलित अमेरिका के साथी देश उसके वर्चस्व पर अंकुश लगा सकें।

अमेरिकी वर्चस्व को आर्थिक और सांस्कृतिक धरातल पर चुनौती दी जा रही है। यूरोपीय संघ एवं चीन तेजी से आर्थिक शक्ति के रूप में अमेरिकी वर्चस्व को चुनौति दे रहे हैं। भारत भी कई क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है।