आन्दोलन शब्द का सामान्य अर्थ है-हलचल। यह हलचल व्यक्ति के स्तर पर भी होती है और समूह के स्तर पर भी। यों तो आजकल व्यक्तिस्तर की और कई बार बेबुनियाद-बेकार की हलचल को भी आन्दोलन मान लिया जाता है; परन्तु वास्तविक अर्थों में किसी विशिष्ट और सामूहिक मुद्दे को लेकर होने वाली हलचल ही आन्दोलन संज्ञा पाने की हक़दार हुआ करती है। इन आन्दोलनों के बल पर ही हमारे देश ने अहिंसक क्रान्ति करके देश को स्वतन्त्र कराया था। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद भी सामूहिक हित-साधन के उद्देश्य से आन्दोलनों का आश्रय लिया जाता रहा। आरम्भ में इनके चलने के पीछे एक निरपेक्ष और सत्य का भाव रहा करता था, परन्तु धीरे-धीरे इनका स्वरूप विकृत होता गया। ऐसा इस कारण हुआ कि कुछ निहित स्वार्थी जन वैयक्तिक हित-साधनों के लिए आन्दोलनों का सहारा लेने लगे। आज स्थिति यह हो चुकी है कि यदि कोई आन्दोलन सही मुद्दों को लेकर भी चलाया जाता है, तो मन में तरह-तरह की आशंकाएँ उत्पन्न हो जाया करती हैं। वह इसलिए कि इनके चलते प्रायः सारा जीवन और वातावरण अस्तव्यस्त होकर रह जाया करता है। जो भी हो, वास्तविक मुद्दों और अच्छी नीयत से चलाए जाने वाले आन्दोलनों का असन्दिग्ध महत्त्व आज भी बना हुआ है और तब तक बना रहेगा, जब तक जनवाद की तनिक-सी भावना भी जीवित बनी रहेगी।
पहले आन्दोलन या तो राष्ट्र की स्वतन्त्रता के लिए हुआ करते थे, या मज़दूर वर्गों की ट्रेड यूनियन ही श्रमिकों के हित-साधन के लिए तरह-तरह के आन्दोलन चलाया करती थी। परन्तु आज श्रमिक वर्गों के अतिरिक्त छात्र वर्ग, सरकारी कर्मचारी, यहाँ तक कि सुरक्षा-बल (पुलिस आदि) भी अपनी माँगें मनवाने के लिए आन्दोलनों का सहारा लेने लगे हैं। छात्र आज आन्दोलनात्मक मूड में अधिक ही दिखाई देते हैं । जरा-जरा-सी बात से भड़क कर वे लोग कक्षाओं का बहिष्कार और चक्का जाम कर दिया करते हैं। उनके द्वारा मार-पीट और तोड़-फोड़ भी उन्मुक्त भाव से व्यापक स्तर पर की जाती है। विद्या-मन्दिरों के उपासकों-छात्रों द्वारा आखिर क्यों ऐसा किया जाता है ? प्रश्न उठता है कि वह कौन-सी मानसिकता है, कौनसे कारण हैं कि जो युवा ऊर्जा को इस प्रकार विनष्ट कर देने के लिए प्रेरणा बना करते हैं ? प्रश्नों का सही-सही उत्तर और कारणों की सहीसही खोज आज तक सम्भव नहीं हो सकी। हमारे विचार में छात्र-आंदोलनों के मुख्य दो-तीन कारण ही प्रतीत होते हैं। पहला तो यह कि लार्ड मैकाले के ज़माने से जो शिक्षा और परीक्षा-पद्धति देश में चली आ रही है; वह आज एकदम अनुपयोगी एवं बेकार हो चुकी है। वह पढ़ने वाले छात्रों को आश्वस्त नहीं कर पाती कि जब वे डिग्रियाँ-डिप्लोमे लेकर जीवन के व्यवहार एवं कार्य-क्षेत्रों में प्रवेश करेंगे, तो उनका वर्तमान और भविष्य सुरक्षित रह सकेगा। दूसरे, वर्तमान घिसी-पिटी शिक्षा प्रणाली छात्र को व्यवहार-जीवन का वास्तविक-व्यावहारिक ज्ञान भी नहीं करा पाती। वह केवल साक्षर बनाती है, शिक्षित नहीं करती। सुशिक्षित तो कदापि नहीं कर पाती। तीसरा कारण है शिक्षा-मन्दिरों में राजनीति और ट्रेड यूनियन-- वाद का प्रवेश। आज की राजनीति समस्याएँ चाहे न भी सुलझाए; पर एक व्यर्थ की स्पर्धा तो पैदा कर ही देती है। वह स्पर्धा नाटक के, तरहतरह के मुद्दों को उठाकर आन्दोलनों को जन्म देती रहती है । परिणामस्वरूप शिक्षा-जगत का माहौल और भी बिगड़ जाता है । तरह-तरह के मुद्दे उठाकर बड़े दलों के राजनेता भी छात्रों को अनुप्राणित करते रहते हैं कि वे आन्दोलन चलाकर उनके पक्ष-विपक्ष में माहौल बनाएँ या खराब करें। मण्डल आयोग विरोधी और समर्थक आन्दोलन इसी प्रकार के थे, जिन्होंने वास्तव में छात्र-जगत का ही अहित किया। एक बात और भी ध्यातव्य है। कई बार छात्र-राजनीति में कुछ ऐसे दादा किस्म के लोग भी घस आया करते हैं, जिनका उद्देश्य छात्रों को आन्दोलनों के लिए भडका कर मात्र अपना स्वार्थ सिद्ध करना ही हुआ करता है। ऐसे लोगों द्वारा उठाए गए मुद्दे कुछ इस प्रकार के हुआ करते हैं :
1. छात्रों को रियायती दर पर सिनेमा-टिकट दिए जाएँ। 2. महाविद्यालयों से अनिवार्य उपस्थिति की शर्त हटायी जाए।
3. बिना परीक्षा में उत्तीर्ण हुए ही छात्रों को अगली कक्षाओं में बैठने की सुविधा प्रदान की जाए।
4. हर छात्र को आवश्यक रूप से ग्रेस मार्क दिए जाएँ।
और इसी तरह के अन्य मुद्दे भी हुआ करते या हो सकते हैं। पूछा जा सकता है कि केवल छात्रों को ही रियायती दर पर सिनेमा-टिकट क्यों उपलब्ध कराए जाएँ, गरीब और असमर्थ वर्गों को क्यों नहीं? फिर क्यों ज़रूरी है कि विद्यार्थी सिनेमा देखें ही? सिनेमा और विद्यार्थी का आखिर आपस में सम्बन्ध क्या है ? अनिवार्य उपस्थिति हटा देने का लाभ किन छात्रों को पहुँचेगा? जो प्रतिदिन कक्षा में आकर पढ़ते हैं या जो केवल सत्र समाप्त होने पर ही प्राध्यापकों के पीछे महज़ हाज़री लगा देने की चिरौरी करते घूमते हैं ? इसी तरह बिना परीक्षा दिए अगली कक्षा में जाने और डिग्रो पाने के इच्छुक क्या वास्तविक छात्र ही होते हैं या राजनीतिज्ञों, दादाओं के दुमछल्ले ? आवश्यक रूप से ग्रेस मार्क देकर क्या पढ़ने और मेहनत करने वाले तथा महज़ नकल के सहारे परीक्षा देने वालों को एक ही स्तर पर ला दिया जाए ? क्या यह उचित कहा और माना जा सकता है ? हमारे विचार में कदापि नहीं । कई बार छात्र महज़ अपने लिए अच्छी यातायात या बस-सुविधा पाने के लिए भी आन्दोलन करते हैं। उन्हें यह सुविधा उपलब्ध भी हो जाती है। पर क्यों नहीं वे व्यवस्था-दोष के विरुद्ध आवाज़ उठाते, जिसके चलते आम आदमी भी इस सेवा से हर समय बेजार रहता है ? फिर छात्र मिलने वाली सविधा का उपयोग कैसे करते हैं? एक महाविद्यालय से चलने वाली छात्र-स्पेशल या यू० स्पेशल में चढ़कर दो-चार छात्र बैठ गए और बस! बस खाली भागी जा रही है। मन्य महाविद्यालयों के आगे से गुजरने पर वहाँ प्रतीक्षारत छात्र बस रोकने को हाथ उठाते हैं; पर भीतर बेठे और सिगरेटें फूंक रहे दो-चार छात्र ड्राइवर-कण्डक्टर को कहीं भी बस न रोकने को विवश कर देते हैं। क्या यह उपलब्ध सुविधा का मात्र दुरुपयोग नहीं है ? । मेरी समझ में आज तक यह नहीं आया कि मेरे साथी छात्र जो आन्दोलन चलाते हैं, आखिर उनका उद्देश्य क्या हुआ करता है ? यदि कभी कोई उद्देश्य रहता भी है, तो बस किसी-न-किसी तात्कालिक सुविधा पाने तक ही सीमित रहा करता है और बस ! मैंने कभी नहीं देखा और सुना कि कभी छात्रगण इस बात के लिए आन्दोलन कर रहे हों कि लार्ड मैकाले के जमाने से चली आ रही, आज के सन्दर्भो में एकदम व्यर्थ हो चुकी इस शिक्षा-पद्धति को बदलो। इसे व्यावहारिक एवं जीवनोपयोगी बनाओ। कभी भी मैंने अपने साथी छात्रों को इस बात के लिए आन्दोलन करते नहीं देखा-सुना कि पढ़ाने वाले प्राध्यापक सिफ़ारिशों से भर्ती होकर आने के कारण ठीक से पढ़ा नहीं पाते, या कक्षाओं में बेमतलब की शिक्षोत्तर बातें करते रहते हैं, बेकार की राजनीति करते-कराते हैं। ऐसे लोगों से छात्रों को छुटकारा दिलाकर शिक्षा-जगत और छात्रों का भला करो। हमें विज्ञान-विभाग में प्रैक्टीकल प्रशिक्षण के लिए अच्छी लैबोरेटरी की व्यवस्था चाहिए, अच्छा पुस्तकालय चाहिए, खेल के लिए मैदान चाहिए, अच्छी और उचित मूल्य की पुस्तके, कापियाँ आदि चाहिएँ। कभी हुआ है इन बातों के लिए आन्दोलन ? नहीं, कभी भी नहीं। इसीलिए मैंने ऊपर कहा है कि भारतीय छात्र-आन्दोलन के मुद्दे आखिर क्या होते हैं, मैं आज तक कभी समझ नहीं पाया, स्वयं आन्दोलन में भाग लेने की विवशता ढोकर भी कभी समझ नहीं पाया। हाँ, कई बार जब प्राध्यापक, शरारत करने, पढ़ाई की तरफ ध्यान न देने या फिर अन्य प्रकार की अयाचित कार्यवाहियाँ करने पर डाँट दिया करते हैं, तब दादा किस्म के छात्र इस अच्छाई को भी अपना अपमान मानकर, छात्रों को बरगला और भड़का कर आन्दोलन जैसा बाबेला खड़ा कर दिया करते हैं, बसें रोककर जलाने
और तोड़-फोड़ करने लग जाया करते हैं, तब माथा पीटकर रह जाने वाल मुद्दे अवश्य कुछ समझ में आ जाया करते हैं।
यहाँ तक हमने छात्र-आन्दोलन के उन मुद्दों और कारणों पर चचा की है, जो वास्तव में कोई कारण और मुद्दे हैं तो नहीं; पर राजनीतिक दादागीरी के कारण बेकार में बना कर सारे माहौल को चौपट कर दिया करते हैं । अब तनिक गम्भीर और वास्तविक मुद्दों पर भी ध्यान देना चाहिए । असन्तोष ही वह वास्तविक मुद्दा है कि जो तरह-तरह के बेकार के छात्र-आन्दोलनों के रूप में, उनके माध्यम से प्रकट होता रहता है। असन्तोष का मूल कारण तो वर्तमान समूची व्यवस्था की गड़बड़ी में ही छिपा हुआ है; पर उसका एक तरह से सीधा सम्बन्ध छात्र-जीवन के साथ भी जुड़ा हुआ है। छात्र अपनी ओर से भविष्य के सुखद सपने संजो और सजाकर शिक्षा-मात्र को उन्हें पाने की तैयारी का अवसर मानता है; पर जब वह अपने चारों ओर देखता है कि उससे पहले जो लोग डिग्रियाँ लेकर गए थे, वे उन्हें बगल में दबाए मारे-मारे फिरते हैं, उनके सपने धूल में मिले जा रहे हैं, तो स्वभावतः उसके मन में असन्तोष, वह भी दिशाहीन असन्तोष सुगबुगा उठता है। उसे रास्ता दिखाने वाला घर-परिवार, धर्मसमाज और राजनीति में कहीं कोई नहीं मिल पाता। तब दादा किस्म के लोगों या अविकसित-अस्थिर स्व-बुद्धि के प्रभाव से वह भटक जाता है। असन्तोष असन्तुलित आक्रोश का रूप धारण कर तनिक-सी ही, बेकार की ही सही, हवा पाकर भड़क उठता है । तब उस प्रकार की माँगें सामने आने लगती हैं, आन्दोलन होने लगते हैं कि जिनकी चर्चा हम ऊपर कर आए हैं । पानी को पता नहीं होता कि वह बहकर और दूसरों को डुबोकर अपनी सार्थकता को व्यर्थता में बदलता जा रहा है। आग को पता नहीं होता कि वह स्वयं भी जलकर राख होने जा रही है। ठीक इसी प्रकार वास्तविक असन्तोष भटक और भड़ककर कोई वास्तविक मुद्दा एवं माँग नहीं बन पाता, बल्कि स्वयं अपने लिए ही हानिकारक सिद्ध होता है। अपने ही पानी की सार्थकता ग़लत कर देता है। अपनी ही आग को अपने साथ-साथ बाकी को भी राख बना दिया करता है।
ऊपर जिस असन्तोष की चर्चा की गई है, उसका मुख्य कारक कारण वर्तमान सड़ी-गली शिक्षा परीक्षा-पद्धति तो है ही सही, उसके भी कुछ अन्य कारक कारण हैं एवं हो सकते हैं । आज जिस युग में हम रह रहे हैं, उसने एक और तो विद्यार्थी को सविधाजीवी बना दिया है, दूसरी ओर उसकी इच्छा — आकांक्षाओं को भी बहुत अधिक बढ़ा दिया है। वह परिश्रम नहीं करना चाहता; पर पाना सभी कुछ चाहता है। नगरों-महानगरों में रहते हुए भी उसे उचित सुविधाएँ नहीं मिल पातीं। बाहर से पढ़ने आने वाले छात्रों के लिए होस्टल, रहन-सहन, खान-पान आदि की उचित व्यवस्था नहीं हो पाती। फिर आज अन्य वर्गों के समान शिक्षा-जगत से जुड़े हर वर्ग में भी ट्रेड यूनियन की भाषा आ गई है। इस कारण कभी तो शिक्षा-जगत से बाहर के लोग आन्दोलन करते हैं, कभी शिक्षा-जगत के कर्मचारी, कभी प्राध्यापक और कभी स्वयं छात्र । निश्चय ही इन सबका सुकुमार एवं अन-- गढ़मति छात्रों के मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वही असन्तोष और आक्रोश बढ़ता है। बढ़ते-बढ़ते वह उचित बातों या मुद्दों के लिए तो आन्दोलन कर नहीं पाता, व्यर्थ के मुद्दों को लेकर अवश्य भटक उठता है । वर्तमान शिक्षा-प्रणाली के रहते भविष्य में बेकारी की चिन्ता भी उसे मानसिक स्तर पर खोखला कर देती है। समाज का कोई भी वर्ग, घरपरिवार या बाहर के लोग उन्हें कोई आदर्श दे नहीं पाते, सच्चे अर्थों में आश्वासन भी नहीं दे पाते। ऊपर से तरह-तरह के बाहरी-भीतरी दबाव, सब मिला कर असन्तोष को बढ़ा देते हैं। वह फूटता है, बिना अच्छा-बुरा देखे-सोचे । उसे तो बस फूटना ही होता है, सो फूटता है।
निश्चय ही समस्या विकट रूप धारण कर चुकी है। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि तो फिर इसका समाधान क्या है या हो सकता है ? हमारे विचार में जीवन और समाज के वर्तमान ढाँचे में कोई भी समाधान कठिन है। आजे किसी भी वर्ग की समस्या का समाधान समाज-जीवन के वर्तमान ढाँचे से बाहर जाकर नहीं खोजा जा सकता। जब चारों ओर आदर्श एवं चरित्र नाम की कोई चीज नहीं रह गई, चारों ओर आमूल-चूल भ्रष्टाचार का राज है, तब छात्र-जीवन और उसकी आन्दोलनात्मक समस्याओं का कोई समाधानअलग से कैसे खोजा जा सकता है ? समग्र रूप में निश्चय ही नहीं खोजा जा सकता। फिर भी हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाने से तो हम देश के भविष्य के खलिहानों में महज अन्धकार बोने वाले ही प्रमाणित होंगे। इसलिए समाधानपरक दृष्टि से विचार करते समय आज सबसे बड़ी आवश्यकता वर्तमान व्यवस्था और इसके. समूचे चि को बदलने की है। पर ऐसा कर पाना अभी सम्भव प्रतीत नहीं होता। ऐसी स्थिति में कम-से-कम वर्तमान घिसे-पिटे शिक्षा के ढाँचे को, उसके अन्तर्गत उस परीक्षा-प्रणाली तो बदल ही सकते हैं कि जो अच्छे-बुरे सभी को एक ही तराजू पर तौलते हुए महज साक्षर इनसानों का उत्पादन करती जा रही है, उन्हें भविष्य का कोई आश्वासन नहीं दे पा रही। शिक्षा-जगत में जो सिफारिशी जन घुस आए हैं, जो समूची ढह रही व्यवस्था को नींव से उखाड़ फेंकने का कारण बन रहे हैं, उनसे इस क्षेत्र को पाक-साफ़ किया जाए। रोजगारोन्मुखी शिक्षा की व्यवस्था की जाए। उसके लिए पर्याप्त मात्रा में आवश्यक सामग्री मुफ्त में या न्यूनतम दामों में उपलब्ध कराई जाए। शिक्षा को मनोरंजक और बैज्ञानिक बनाया जाए, ताकि कोई भी विषय बेकार एवं बोझिल नलगे। राजनीतिज्ञों और दादाओं को उस क्षेत्र से दूर रखा जाए । ऐसा सब करके वास्तव में वह माहौल बन पाएगा, जिसमें रहने वाला छात्र भविष्य या किसी भी बात के लिए असन्तुष्ट होकर व्यर्थ के आक्रोश से ग्रस्त होकर आन्दोलनात्मक राहों पर भटक नहीं जाएगा। वर्तमान स्थितियों में समाधान का और कोई ढंग हमें दृष्टिगोचर नहीं होता।
ध्यान रहे, छात्र-शक्ति किसी भी देश की महाशक्ति हुआ करती है। विश्व के कई देशों में होने वाले क्रान्तिकारी परिवर्तनों, का मूल कारण. भी अतीत में तो यह शक्ति बनी ही है, आज भी बन रही है। किसी भी. मूल्य पर इसे व्यर्थ की राहों पर भटकने न देकर ही ऐसा बनाया जा सकता. है। यदि हम राष्ट्र के भविष्य के खेतों में प्रकाश की फसल करना चाहते हैं, तो हमें ऊपर दिए गए कुछ सुझावों की ओर तत्काल ध्यान देना होगा। अन्यथा हमारा भटकाव हमें भविष्य के किसी ऐसे गहरे अंधेरे वाले गर्त में फेंक देगा कि ढूढ़ने पर भी फिर हमारे निशान कहीं बाकी न मिल सकेंगे।