हड़ताल शब्द का अर्थ होता है-काम बन्द करना। इसी प्रकार 'भूख हड़ताल' का अर्थ है काम तो बन्द करना ही, साथ ही खाना-पीना भी तब तक बन्द रखना जब तक कि रखी गई माँग या माँगें न मान ली जाएँ। इस भूख हड़ताल के लिए एक और शब्द भी प्रचलित है अनशन करना । जहाँ तक हमारी जानकारियों का प्रश्न है, भारतीय समाज और राजनीति के इतिहास में इस सुकार्य का आरम्भ एवं प्रचलन महात्मा गांधी ने किया। वे जब भी तत्कालीन विदेशी शासकों या भारतीय जनों के द्वारा कोई अन्याय-अत्याचारपूर्ण कार्य होता हुआ देखते थे, अपनी और अपने माध्यम से सभी देशवासियों की शुद्धि के लिए भूख हड़ताल या अनशन कर दिया करते थे। कहा तो आत्मशुद्धि करना ही जाता था; पर वास्तविक प्रयोजन -सरकार पर, भारतीय जन-मानस पर दबाव डालना ही हुआ करता था कि जो अनुचित-अन्यायपूर्ण कार्य किया गया है, भविष्य में वह न किया जाए, जो हो चुका है उसका प्रायश्चित्त हो जाए। यह दबाव मात्र नैतिक ही हुआ करता था। ध्यान देने की बात यह है कि भूख हड़ताल या अनशन के आविष्कर्ता महात्मा गान्धी ने कभी भी इसका प्रयोग व्यक्तिगत स्वार्थों या कार्यों की सिद्धि के लिए नहीं किया था। वे हमेशा अपनी अहिंसावादी नीतियों के तहत राष्ट्रीय और महत् मानवीय हित-साधन के लिए किया करते थे। परन्तु आज हमारे तक आते-आते यह अहिंसक प्रयोग इतना दूषित, मात्र निहित स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम बनकर रह गया है कि अब जब किसी को भूख हड़ताल करते देखते-सुनते हैं, तो हँसी आए बिना नहीं रहती।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में गान्धी जी के अतिरिक्त अन्य कई राजनेताओं ने भी भूख हड़तालें कीं, वह भी मात्र नैतिक दबाव डालने के लिए, वैयक्तिक नहीं बल्कि सामूहिक कारणों से, जैसे राजनीतिक बन्दियों को खाना अच्छा नहीं मिलता या उनके साथ उचित एवं मानवीय व्यवहार नहीं किया जाता, इत्यादि । इन या इस प्रकार के कारणों से अन-- शन करने वालों की माँगें ब्रिटिश सरकार द्वारा भी अक्सर स्वीकार कर ली जाती थीं। कई बार क्रान्तिकारी वर्ग के राजबन्दियों द्वारा अनशन करने पर उन्हें बलपूर्वक खाना खिलाने का प्रयत्न भी किया जाता। उनकी मांगें नहीं मानी जातीं और उन्हें भूखों मर जाने दिया जाता। ऐसा होने के कई प्रमाण मिलते हैं; पर वहाँ दोनों पक्षों की हठधर्मी कार्य करती हुई दिखाई देती है। जो हो, निकट अतीत तक भूख हड़ताल या अनशन का नैतिक प्रभाव और दबाव अवश्य पड़ता और स्वीकार किया जाता था। श्री रामल नामक व्यक्ति द्वारा भूख हड़ताल करके प्राण त्याग देने का ही परिणाम आज का आन्ध्र प्रदेश है। पंजाबी सूबा बनने के मूल में भी इस प्रकार के अनशन के प्रभाव और दबाव मौजूद हैं । सार्वजनिक हित के अन्य बहुत सारे कार्य भी इसी का मूल परिणाम कहे जा सकते हैं । अनशन द्वारा जनहित का कार्य करने-कराने वाला हर व्यक्ति समग्र राष्ट्र और समूची मानवता के लिए आदर, गर्व और गौरव की वस्तु है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। यह भी सत्य एवं ऐतिहासिक तथ्य है कि ऐसे कार्य करने वालों के नाम चिर अमर हो गए हैं।
अब आते हैं भूख हड़ताल या अनशन के दूसरे पहलू पर। कुछ महान और निस्वार्थ व्यक्तियों को भूख हड़ताल करके सफल होते देख निहित स्वाथियों ने भी इसे एक अचूक हथियार समझ इसका प्रयोग करना शुरू कर दिया। जैसे अमुक व्यक्ति क्योंकि अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता था, इस कारण उसे नौकरी से निकाल दिया और उसने अपनी पुनः बहाली के लिए भूख हड़ताल कर दी। कुछ छात्रों को बार्षिक उपस्थितियों का प्रतिशत कम होने के कारण परीक्षा में बैठने की आज्ञा नहीं मिली, उन्होंने भूख हडताल कर दी। अस्पताल का कर्मचारी दवाइयाँ चुराकर ले जाता हुआ पकड़ा गया, इस कारण उसे मुअत्तल कर दिया गया; पर अपने को निर्दोष बताते हुए उसके साथी कर्मचारियों और उसने सामूहिक भूख हड़ताल कर दी। ये और इस प्रकार की घटनाएँ अक्सर समाचार-पत्रों में पढ़ने को मिलने लगीं, फलस्वरूप भूख हड़ताल या अनशन का जो नैतिक दबाव पड़ा करता था, वह क्रमशः हीन होता हुआ चला गया। आज स्थिति यह है कि इस प्रकार की हड़ताल की बात सुनते-पढ़ते ही करने वाले के प्रति पहली "प्रतिक्रिया के रूप में गाली निकलती है, फिर यह बरबस स्वीकार कर लेना पड़ता है कि यह भूख हड़ताली निश्चय ही मक्कार प्रकृति वाला व्यक्ति होगा । आज भूख हड़ताल शब्द और इसके मूल में छिपी भावना का अर्थापकर्ष हो चुका है और निरन्तर होता जा रहा है। चालाक लोग महज़ स्वार्थसिद्धि और अपनी अन्याय-अत्याचार या पापपूर्ण चमड़ी का बचाव करने के लिए इस पावन शस्त्र का प्रयोग करने लगे हैं। इसी कारण इसका मान
और मूल्य निरन्तर घटता जा रहा है, बल्कि समाप्त हो चुका है। एक भूख हड़ताल का मैं प्रत्यक्षदर्शी गवाह रहा हूँ। आइये, आपको भी उसका वर्णन सुनाता है।
घटना हमारे ही विश्वविद्यालय से सम्बन्धित एक महाविद्यालय की है। हमारे एक प्राध्यापक थे—श्री गुप्ताजी। वे कद के छोटे और घुटे हुए व्यक्ति थे। उन्हें पढ़ना-पढ़ाना प्रायः अच्छा नहीं लगता था, इस कारण स्टॉफ रूम में हमेशा किसी-न-किसी की खाट खड़ी करने, या किसी कर्मचारी के दुर्व्यवहार करने, प्राचार्य के कार्यों की नाजायज़ आलोचना करने जैसे कार्यों में ही व्यस्त रहा करते । कक्षा में अक्सर देर से आते और आकर ही दस-पन्द्रह मिनट का समय तो देरी का कारण बताने में बिता देते, वाकी समय में इधर-उधर की बेकार बातें करते-पूछते रहते । जब समाप्ति का घण्टा बज जाता, तब यह कहते हुए अपनी फाइल उठाकर चल देते-“अच्छा, कल नया टॉपिक शुरू करेंगे।" जो कि कभी भी शुरू न हो 'पाता। जब कभी स्टॉफ कौंसिल की मीटिंग होती, नाहक ही प्राचार्य महोदय तथा अन्य प्राध्यापकों से उलझ जाते ।स्टॉफ एसोसिएशन में भी यही होता। जरा-सी अपनी सच्चाई प्रकट हो जाने पर उन्हें अपना अपमान होना प्रतीत होता। एक बार लायब्रेरी से नोटिस जारी हआ कि कुछ प्राध्यापकों ने लायब्रेरी की पुस्तकें विगत दस वर्षों से लौटाई नहीं हैं, अपने पास दबा कर रखी हुई हैं। वे लोग या तो सप्ताह के भीतर पुस्तकें लौटा दें या उनके दाम जमा करा दें। इन गुप्ता महाशय ने दस वर्ष से भी अधिक समय से दस-पन्द्रह पुस्तकें अपने पास दबाकर रखी हुई थीं, उन्हें लौटाना तो क्या, लगे कानून और सम्मान की बातें करने । समझाने वालों की इतनीसी बात उनकी समझ में न आती कि लायब्रेरी की पुस्तकें मुख्य रूप से छात्रों के लिए हैं, प्राध्यापक भी आवश्यकतानुसार उपयोग कर सकते हैं; पर उन्हें दबाकर रखने का अधिकार उन्हें कदापि नहीं है । सुनकर समझने की बजाय ये महाशय उन साथियों से ही सिरफुटौवल करने को तैयार हो जाते। इस प्रकार पढ़ाने का अपना मुख्य धन्धा छोड़कर हर समय किसीन-किसी के सिर पर तलवार ताने रखते, कोई-न-कोई कानूनी नुक्ता निकालकर गुप्ता सर हमेशा ही अपने वास्तविक कद-काठ से बहुत ऊँची बात करते रहते । कुछ तमाशबीन किस्म के प्राध्यापक उनकी हाँ-में-हाँ मिला शह भी देते रहते और यह समझते कि बस, जो कुछ है वह मैं ही मैं हैं। एको ब्रह्म, द्वितीयो नास्ति । अर्थात् एक मेरे बिना और तो कोई कुछ जानता या समझता-बूझता ही नहीं।।
यही गुप्ता सर विगत वर्षों पहले हड़ताल और फिर भूख हड़ताल के चक्कर में आ गए। हुआ यों कि विद्यार्थियों ने प्राचार्य महोदय से लिखित शिकायत कर दी कि गुप्ता सर पढ़ाते बिल्कुल नहीं। कक्षा में काफ़ी देर से आते हैं और फिर इधर-उधर की बातों में समय बिता चले जाते हैं। प्राचार्य महोदय उन पर नजर रखने लगे। उस दिन वे कक्षाओं का निरीक्षण करते घूम रहे थे कि घण्टा बजने के कोई पन्द्रह मिनट बाद उन्होंने गुप्ता जी को भाग कर अपने कक्षा-भवन की ओर आते देखा ।प्राचार्य महोदय ने आगे बढ़कर उन्हें रोकना चाहा, तो वे अड़ियल टटू की तरह उलझकर, उन्हें धकिया कर कक्षा में घुस गए। प्राचार्य महोदय गिरते-गिरते बचे। अन्दर जाकर भी पढ़ाने के स्थान पर पता नहीं क्या बड़बड़ाते रहे। विद्यार्थी पहले से ही चिढ़े बैठे थे। सो पीछे से कोई चिल्ला उठा-"वाह भई पप्पू !" बाकियों ने तालियां बजाते हुए दोहराया-"वाह-वाह ! पप्पू वाह !" -वास्तव में छात्र गुप्ता सर को पीठ पीछे 'पप्पू' कहकर ही पुकारा करते -थे। उनकी हरकत देख-सुन उस दिन पहली बार यह गुप्त नाम छात्रों की जबान पर भी आ गया । सुनकर पप्पू सर' 'नहीं गुप्ता सर तैश में आ गए । चिल्ला उठे- “यह क्या बदतमीज़ी है ?" उत्तर में छात्रों ने तालियां बजाते हुए फिर वही दुहरा दिया। गुप्ता सर ने अपनी फाइल उठाई और पैर पटकते हुए, चिल्लाते हुए, कक्षा से बाहर आ गए । छात्र खिलखिलाकर हँसते रहे और 'पप्पू सर..' चिल्लाते रहे।

- स्टॉफ रूम में पहुँच कर भी वह पता नहीं क्या-क्या चिल्लाकर साथियों के सामने केवल अपना पक्ष पेश करते रहे। घोषणा की कि जब तक प्राचार्य का बच्चा क्षमा नहीं मांगेगा, वे कक्षा में नहीं जाएंगे। उन्हीं जैसे कुछ अन्यों ने झटपट स्टॉफ ऐसोसिएशन की मीटिंग बुलाई और पूरे स्टॉफ द्वारा प्राचार्य महोदय के विरुद्ध हड़ताल की घोषणा कर दी। जो सच्चाई जानते थे, विवश होकर उन्हें भी हड़ताल करके गुप्ता के साथ धरने पर बैठना पड़ा। इससे गुप्ता महोदय का चेहरा शोर मचाकर लोगों को इकट्ठा कर लेने वाली छिनाल औरत की तरह खिल उठा। जो हो, कक्षाएँ लगने की घण्टी निरन्तर बजती पर कोई प्राध्यापक कक्षा में नहीं जाता। सारा दिन बेकार की नारेबाजी होती रहती। इस तरह तीन-चार दिन बीत गए; पर परिणाम कुछ होना ही नहीं था, सो नहीं हुआ। गुप्ता सर का चेहरा उदास होने लगा। उन्होंने चमचा किस्म के कुछ छात्रों से बात की और सहायता का आश्वासन पाया। इसी प्रकार कुछ प्राध्यापकों ने सलाह दी-प्रिन्सीपल साला ऐसे नहीं मानेगा, गुप्ताजी! तुम भूख हड़ताल कर दो। भूख हड़ताल की बात सुन कर गुप्ता 'हैं हैं करने लगा। साथियों ने कुछ कान में कहा, कुछ इशारों से समझाया। उनका तात्पर्य यह था कि रात को छिप कर वे लोग खाना-पीना खिलाते-पिलाते रहेंगे। दिन तो यों बातों में ही कट जाएगा। फिर एकाध दिन में ही तो प्रेशर पड़ने लगेगा। प्रिन्सीपल साले को घुटनों के बल चलकर माफी मांगने आना पड़ेगा। जो हो, थोड़ी-सी हील हुज्जत के बाद गुप्ता सर ने भूख हड़ताल की घोषणा कर ही डाली। कुछ साथियों ने भी आश्वासन दिया कि बारी-बारी वे भी एक-एक दिन के लिए उनके साथ भूखे रहेंगे।
गुप्ता सर भूख हड़ताल कर रहे हैं "एक समाचार, एक सनसनी ! प्राध्यापकों में एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ और छात्रों में तमाशबीनी वे मूड के साथ सनसनी! छात्र चारों ओर आ जुटे । कुछ नारे लगाने लगे
- "गुप्ता सर—जिन्दाबाद !" कुछ देर के बाद भीड़ में से किसी छात्र के, मुंह से निकल गया- "पप्पूसर-अहः हः हःजिन्दाबाद?" एक तीखी हंसी के साथ नारा-प्रतिनारा गूंज उठा। पहले नारे से गुप्ता सर के चेहरे पर जो शहादतभरी मुस्कान तैर आई थी, दूसरे नारे के साथ ही वह तिक्तता में बदलकर गायब हो गई। मुंह पर रुमाल रखकर सुनने वाले छात्र-प्राध्यापक हंसी रोकने का प्रयास करते रहे । खैर, वह दिन बीता। भीड़ घट गई। रात के एकान्त में अपने दो-चार खास साथियों से घिरे गुप्ता सर ने टोस्टसैण्डविच इस तेजी से खाए कि देखने वाले भी न जान सके कि वे वास्तव में कर क्या रहे हैं। अगला दिन भी नारेबाजी और घूमधड़ाके में बीत गया। कल रात गुप्ता सर के साथ यदि चार प्राध्यापक रह गए थे, तो आज दो ही थे । खैर, उन दो ने उनके खाने-पीने का ध्यान अवश्य रखा। भाई वह कोई महात्मा गान्धी या कोई अन्य स्वतन्त्रता सेनानी थोड़े ही थे, जो सचमुच की भूख हड़ताल करते! हाँ, दिन-भर वे अवश्य भूखे रह लेते थे।
दूसरा और फिर तीसरा दिन भी बीत गया। तीसरी रात जो एक साथी रुका हुआ था, वह भी कोई बहाना बनाकर खिसक लिया। रात-भर अकेला चौकीदार उनकी देखभाल करता रहा, पर उसे वह कुछ खाने को ला देने की बात तो कह नहीं सकते थे। सो अगली ही सुबह से उनकी हालत पतली होने लगी। छात्र-प्राध्यापक आते और डटे रहने की सलाह देकर चले जाते । प्रिन्सीपल की तरफ से कोई सन्देशा नहीं आ रहा था, कोई बिचौलिया भी नहीं बन रहा था, सो गुप्ताजी कह कर रह जाते। चौथी सुबह लोगों ने आकर देखा कि गुप्ता सर निढाल पड़े हैं। प्रिन्सीपल के पी०ए० ने भी आकर सन्देश दिया कि वे हड़ताल-वाल का चक्कर छोड़कर अपना काम ध्यान से करने का आश्वासन दें और खाना खा लें। नहीं तो विवश होकर पुलिस को सूचित करना पड़ेगा। गुप्ता ने बुझी आँखों से वहाँ घिर आए प्राध्यापकों-छात्रों की तरफ देखा; पर उन चेहरों पर कोई भाव ही नहीं था। सो चुपचाप पड़े रहे। बारह बजते-न-बजते पुलिस दल ने आकर उन्हें घेर लिया। कैम्पस से भी कुछ लोग आ गए। न-न करने पर भी गुप्ताजी को खिलाने का प्रयत्न किया जाने लगा। जब वे नहीं माने, तो सरकारी डॉक्टर को बुलाया गया और नलियों से दूध या तरल पदार्थ खिलाने की योजना पर कार्य होने लगा। इस बार गुप्ताजी ने दो-चार बार हाथ-पैर मारने के बाद अपना मुंह उसी प्रकार खोल दिया, जैसे स्वातिबूंद का प्यासा चातक उमड़ती घटाएँ देख अपनी प्यासी चोंच फैला दिया करता है। वे दूध आदि तरल पदार्थ गटागट पीते गये। कुछ क्षण बाद आंखें मूंदे लेट गए। आँख खोल कर देख पाने का नैतिक साहस उनके पास रह भी तो नहीं गया था। जो हो, वह दिन बीता। अगली सुबह जब छात्रप्राध्यापक महाविद्यालय में पहुंचे, तो गुप्ताजी का तम्बू उखड़ चुका था। वे स्वयं गायब हो चुके थे। उस दिन जब घण्टा बजा, तो छात्र-प्राध्यापक दोनों अपनी कक्षाओं में दिखे। हाँ, गुप्ता सर के दर्शन कई दिनों बाद ही सम्भव हो सके । पता चला, वे मैडिकल लीव पर हैं। सहड़ताल और फिर भूख हड़ताल का यह दृश्य मेरी स्मृतियों में आज भी अमिट बना हुआ है। जब भी मैं कहीं किसी के भूख हड़ताल पर बैठने की खबर सुनता हूँ, तो आज के तथाकथित भूख हड़तालियों का नमूना बनकर यह घटना मेरे सामने साकार हो उठती है।