राजकिय पाठशाला, झारखण्ड 

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प्रिय रंजीत,

   शुभाशीर्वाद! 


आज मुझे पिताजी का एक पत्र मिला, जिसमें उन्होंने तुम्हारे दिनानुदिन गिरते स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त की है। उनके पत्र से ऐसा मालूम पड़ता है तुम इन दिनों किताबी कीड़ा बन गये हो। मैं भी महसूस करता हूॅं कि जीवन में प्र​गति के स्वर्णिम शिखर पर आरूढ़ होने के लिए परिश्रम परमावश्यक है— अध्ययन में डूबना आवश्यक है, किंतु इसका तात्पर्य यह नहीं कि यह सब स्वसस्थ्य की कीमत पर हो। स्वास्थ्य की आहुति देकर उत्तम परीक्षाफल प्राप्त करने का कोई अर्थ नहीं। 


तुम तो जानते हो कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क संभव है। स्वामी विवेकानंद ने अपने नौजवान मि.ों के नाम जो पुस्तक लिखी हे, उसे तुम अवश्य पढ़ना। उसमें उन्होंने लिखा हे कि यदि तुम फुटबॉल नहीं खेलते, तो गीता के मर्म को भी अच्छी तरह नहीं समझ सकते। 


अत: यदि तुम अध्ययन द्वारा वैयक्तिक उन्न्ति, राष्ट्र की सेवा तथा समाज का उत्थान चाहते हो, तो सबसे पहले अपने स्वास्थ पर ध्यान दो। अच्छे स्वास्थ के लिए शारीरिक श्रम आवश्यक है और इसके लिए तुम्हें कोई—न—कोई खेलना ही चाहिए। 


मै आशा करता हूॅं कि तुम मेरा कहना मानकर अपनी और हम सबकी भलाई करोगे। 


तुम्हारा भाईया

राकेश


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