राजकिय बुनियादि विद्यालय

                                                                                                                    राजपुरा

                                                                                                             27—02—2009


पुज्यवर पिताजी,

 सादर प्रणाम। 


आपने अपने पत्र में लिखा है, ''मै तुम्हारे पास केवल मासिक व्यय के लिए सौ रूपये भेज रहा हूॅं। तुमने नयी पुस्तको के क्रय के लिए दो सौ रूपयों की मॉंग की है। मेरा विचार है कि तुम अभी पुरानी किताबों से ही काम चला लों, इस महॅंगी में और रूपये खर्च करना ठीक नहीं है।'' मुझे आपका यह पत्र पढ़कर दु:ख हुआ। आपके जैसे संपन्न और शिक्षित अभिभावक इस प्रकार लिखें, तो दु:ख और आश्चर्य के सिवा और क्या हो सकता है?


आपक जानतें है, थोरो की उक्ति—''पुराना कोट पहनों और नयी किताब खरीदो।'' पुस्तक से बढ़कर और क्या धन हो सकता है? पुस्तकों का मूल्य रत्नों से भी अधिक है: क्योकि रत्न बाहरी चमक—दमक दिखाते है जबकि पुस्तके अंत: करण को उज्जवल करती है। महात्मा गॉंधी ने कहा है, ''विचारों के युद्ध में जब पुसतकरूपी अस्त्र ही नही रहेगे, तो काम कैसे चलेगा?'' मन की ताजगी के लिए नयी—नयी पुस्तकों के उद्यान—भ्रमण के सिवा औश्र स्थान ही कहॉं है? मानपजाति ने  जो कुछ किया है, सोचा है और पाया है, वह तो सब पुस्तकों के ही जादूभरे पृष्ठो में सुरक्षित है। गप्पी मित्रों के साथ रहकर गप्प में अमूल्य समय नष्ट करने या फैशनपरस्त दोस्तों के साथ सिनेमा में पॉकेट कटवाने से अच्छा है कि पुस्तकों से मित्रता की जाय। अच्छे से अच्छे मित्र धोखा दे जा सकते है, किंतु पुस्तकं तो ऐसी मित्र है, जो कभी विश्वासघात नहीं करती। 


अत: आपसे अनुरोध है कि आप शीघ्र—से—शीघ्र दो सौ रूपये तार—मनीआर्डर द्वारा भेज दे। अभी—अभी विवेकानंद की ग्रंथावली का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। मेरा मन उसे खरीदने के लिए ललच रहा है। 


                                                                                                                आपका आज्ञाकारी पुत्र 

                                                                                                                        विवेक कुमार


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