भूमिका : सुरम्य पहाड़ियों और वनों से आच्छादित हमारा राज्य झारखण्ड प्रकृति का क्रीड़ा-स्थल है। एकबार जो यहाँ आ गया फिर यहीं का होकर रह जाना चाहता है। यहाँ की स्वर्णिम भूमि शस्य श्यामला, रत्नगर्भा और वन सम्पदा से परिपूर्ण है। इसकी प्राकृतिक छटा अनूठी है । हर ओर प्रकृति अपनी अनोखी छटा विखेरती रहती है।

इतिहास : अबुल फजल ने 'आइने अकबरी' में इस प्रदेश को झारखण्ड नाम से सम्बोधित किया और आज नवोदित राज्य का नाम झारखण्ड हो गया। इसका इतिहास भी अत्यंत प्राचीन है। ईसा के लाखों वर्ष पूर्व के पत्थर के हथियार, बर्तन, उपकरण आदि मिले हैं।

पहले बिहार और ओडिसा संयुक्त रूप में एक साथ थे। 1936 ई० में बिहार और ओड़ीसा अलग-अलग प्रान्त बन गये । बिहार के साथ इस भूप्रदेश का अपेक्षित विकास नहीं हो रहा था। अतः अलग राज्य के लिए झारखण्ड में बहुत दिनों तक आन्दोलन चला। अन्तत: 15 नवम्बर, 2000 ई० को बिरसा मुण्डा के जन्म दिवस पर भारतीय मानचित्र पर 28वें राज्य के रूप में झारखण्ड प्रदेश का उदय हुआ।

अलग राज्य : 2001 ई० की जनगणना के अनुसार यहाँ की आबादी करीब दो करोड़ उनहत्तर लाख है। इसके उत्तर में बिहार, पूर्व में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में छत्तीसगढ़ और दक्षिण में ओड़िसा है। झारखण्ड में तीस के करीब जनजातियाँ रहती हैं जिसमें संथाल, मुण्डा और उराँव ये तीन अत्यन्त प्रमुख हैं। झारखण्ड में चावल और गेहूँ दोनों फसलें होती हैं। आदिवासी चावल और पक्षियों के मांस को बेहद रूचि से खाते हैं। मदिरापान भी इनमें व्यापक रूप से प्रचलन में है।

देश में खनिज की दृष्टि से झारखण्ड अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यहाँ कोयला, लोहा प्रचुर मात्रा में विद्यमान है। यहाँ उद्योग-धंधों के जाल बिछे हैं। जमशेदपुर, राँची आदि प्रमुख औद्योगिक नगर हैं। ताम्बा, क्रोमाइट, मैंगनीज और बौक्साइट यहाँ प्रमुख रूप से उपलब्ध हैं।

निष्कर्ष : नये राज्य के निर्माण से यहाँ के लोग अत्यन्त आशान्वित है। इस प्रदेश में अनेक संभावनाएं हैं । झारखण्ड राज्य बने लगभग पन्द्रह वर्ष बीत चुके हैं, किन्तु अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है।