एक महान युगदृष्टा

रूढ़ियों के विरोधी एक स्वस्थ परम्पराओं के पोषक स्वामी विवेकानन्द वेद, उपनिषद्, दर्शन शास्त्र और गीता ज्ञान के तत्वज्ञानी थे। वे ज्ञान, कर्म और शांति के ऐसे संगम थे कि उनके विचारों के सम्पर्क में आते ही सांसारिक मोह-माया के अंधकारमय सारे मार्ग प्रकाशित हो जाते थे। वे योग्य गुरु के योग्य शिष्य थे। उनको यदि आधुनिक कला का ऋषि कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा।

स्वामी विवेकानन्द का नाम आंखों के सामने आते ही भारत की उस महान विभूति का चित्र आंखों के सामने उभरता है, जो अपनी प्रतिभा और बौद्धिक कुशलता में भारतीय विभूतियों में सबसे अग्रणी है। उनकी तुलना करना कठिन था। वे हिंदू जाति को अपनी राष्ट्रीय भूमिका के लिए सबल और गौरवांतित देखना चाहते थे। साथ ही भारत भूमि से अशिक्षा, अज्ञान, अकर्मण्यता और निर्धनता को दूर करने का उनका उद्देश्य था। यही कारण है कि उन्हें यदि व्यक्ति न कहकर युगदृष्टा और युग प्रर्वतक कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

स्वामी विवेकानन्द का भौतिक शरीर दिव्य था। उनकी काया पुष्ट और तेज से भरपूर थी। और उनका चौड़ा माथा पूरे भारत के सुवर्ण भाग्य के लेख सा था। वे नहीं चाहते थे कि इस देश में एक भी व्यक्ति नंगा, भूखा या तंगहाली में रहे। वे ऐसे महान भक्त थे कि जिनके विशाल कंधे सारे राष्ट्र का भार उठाने में समर्थ थे।


जन्म और पूर्वज

स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी, 1863 ई० को कलकत्ता के मोहन मुकर्जी स्ट्रीट में स्थित सिमुलिया मोहल्ले में विश्वनाथ और धर्मपरायण भुवनेष्वरी देवी के यहां बहुत मान—मनौतियों के बाद हुआ ​था। स्वामी विवेकानन्द के जनम के सम्बंध में कहा जाता है कि एक रात भुवनेश्वरी देवी ने सपने में देखा कि भगवान शंकर अपने तांडव नृत्य की मुद्रा में उनके सामने खड़े हुए हें। भुवनेश्वरी देवी अपने आराध्य देव को नृत्य मुद्रा में देखकर भावविभोर हो उठीं। देखते ही देखते भेलेनाथा ने अपना नृत्य आरम्भ कर दिया ओर इसी मुद्रा में उनका कद छोटा होता चला गया,  यहां तक कि वे एक शिशु के रूप में ढल गए और अगले कुछ ही पलों में भुवनेश्वरी देवी की गोद में आ बैठे। इससे पूर्व कि भुवनेश्वरी देवी कोई प्रतिक्रिया कर पातीं, अगले ही क्षण उनकी नींद खुल गई।
स्वप्न पूरा हुआ और भुवनेश्वरी देवी ने गर्भावस्था काल बीतने के बाद एक शिशु को जन्म दिया। जिसके जन्म के साथ ही सारा परिवार खुशियों से भर उठा।

यह उन दिनों की बात है जब कलकत्ता के मोहन स्ट्रीट पर श्री राम मोहन दत्त का परिवार बसता था। श्री राम मोहन दत्त सुप्रीम कोर्ट के नामी वकीलों में से थे और वे स्वामी विवेकानन्द के पूर्वज अर्थात् पितामह थे। श्री राम मोहन दत्त का परिवार सिमुलिया मोहल्ले में स्थित एक विशाल भवन में निवास करता था। यह स्थान कलकत्ता महानगर के उत्तरी भाग में स्थित था।

श्री राम मोहन दत्त के परिवार का रहन-सहन और शान-शौकत का देखकर कलकत्ता के धनी-मानी लोग भी ईर्ष्या में भर जाते थे। राम महिन के पुत्र दुर्गाचरण दत्त हुए और उनके पुत्र विश्वनाथ दत्त।

विश्वनाथ भी अपने पिता और दादा के समान ही पढ़-लिखकर वकील बन गए। वे भी अपने दादा की तरह ही धनी और सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण थे। श्री विश्वनाथ जी का विवाह भुवनेश्वरी देवी से हुआ जो परम्परागत रूप से धार्मिक विचारों वाली महिला थीं। विवाह के कई वर्षों बाद भी जब विश्वनाथ और उनकी पत्नी भुवनेश्वरी देवी को संतान सुख प्राप्त न हुआ . तो दोनों के साथ-साथ परिवार के अन्य लोगों को भी बहुत चिंता हुई।

तब परिवार के लोगों ने भुवनेश्वरी देवी से संतान सुख प्राप्त करने के लिए कई प्रकार के योग, अनुष्ठान तथा मान-मनौतियां कीं तब कहीं जाकर एक पुत्र का जन्म हुआ जिसने आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द के नाम से पूरे विश्व में अपना यश और कीर्ति पताका फहराकर भारत का नाम ऊंचा किया।

एक बालक के जन्म लेने से परिवार खुशियों से भर गया। जन्म के साथ ही बालक के नाम के प्रस्ताव परिवार के सदस्यों की ओर से पेश किए जाने लगे। उन प्रस्तावों में परिवार के सदस्यों को दुर्गादास का नाम बहुत भाया और उन्होंने उसका नाम दुर्गादास रख दिया। लेकिन माता भुवनेश्वरी देवी को यह नाम कतई नहीं भाया। वह तो अपने पुत्र को शिव का वरदान मानती थीं इसीलिए उन्होंने इस बालक का नाम वीरेश्वर रख दिया। परिवार के अन्य सदस्य भी इसी नाम पर सहमत हो गए और बालक के उसके संक्षिप्त नाम 'विले' कहकर पुकारने लगे। लेकिन बाद में ज्योतिषियों और पंडितों के कहने पर बालक का नाम नरेंद्र नाथ रख दिया गया और ये नरेंद्र नाथ ही आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द कहलाए।

स्वामी विवेकानन्द से पहले उनका नाम नरेंद्र नाथ ही चलता रहा, फिर जब उन्होंने सन्यास की दीक्षा ली तो उनका नाम स्वामी विवेकानन्द पड़ गया और इसी नाम से उनके नाम की ख्याति शीर्ष पर पहुंचती चली गई।

स्वामी विवेकानन्द का बाल्यकाल

 मन्नतों और मुरादों के बाद पैदा हुए विले उर्फ विश्वेश्वर उर्फ नरेन्द्र नाथ उर्फ स्वामी विवेकानन्द से परिवार के सभी सदस्य टूटकर प्रेम करते थे। परिवार के सदस्यों के इसी लाड़-दुलार ने उन्हें चंचल और शरारती बना दिया था।

पूरे परिवार का वातावरण धार्मिक था। इसीलिए घर की स्त्रियां जब काम से निबटकर एक जगह इकट्ठा होकर बैठती थीं, तब वे आपस में धार्मिक विषय पर ही चर्चा किया करती थीं। कभी-कभी रामायण का पाठ होला था. तो कभी-कभी गीता को पढ़ा जाता था। ऐसे समय में शरारती हो अपनी शरारतों को भूलकर चुपचाप आकर उनकी सभा में बैठ जाता था और बड़े ध्यान लगाकर गीता का पाठ सुना करता था।

बाल्यकाल से ही नरेंद्र इन लोकाचारों को नहीं मानता था। उसके कोमल मन पर इन सब बातों का गहरा प्रभाव पड़ा था। उसके मन में जिज्ञासा से भरे तरह-तरह के प्रश्न उठा करते थे। तब वह अपनी मां से उन प्रश्नों को पछता था। जैसे रसोई में जाकर भोजन अशुद्ध किस प्रकार से हो जाता है और पानी को बाएं हाथ से क्यों नहीं पीना चाहिए?

नरेंद्र की माता उसके कुछ सवालों का जवाब दे दिया करती थी और जो सवाल पेचीदा होते थे उनका जवाब उसे देते नहीं बनता था तब वह किसी प्रकार से नरेंद्र को टाल दिया करती थीं। दिन-प्रतिदिन इन लोकाचारों
के प्रति उसकी उपेक्षा न सिर्फ बढ़ती जाती थी, बल्कि वह अपनी ओर से - परिश्रम करके इन्हें तोड़ने का प्रयत्न करने लगा। . क्योंकि उनका खानदानी पेशा वकालात का था। उसके परदादा के बाद दादा और उसके बाद उसके पिता क्योंकि वकालात करते थे, इसलिए उनके पास हर जात और हर धर्म के लोगों का आना-जाना लगा रहता था। उसके पिता से मिलने आने वालों में कुछ व्यक्ति मुसलमान जाति के भी थे, जो नरेंद्र नाथ के प्रति अपने मन में बड़ा स्नेह रखते थे और नरेंद्र भी उनसे काफी घुल-मिल गया था। वे जब भी आते थे तो वे नरेंद्र के लिए कुछ न कुछ खाने-पीने की चीजें लेकर आते थे।

बालक नरेंद्र उस मुसलमान की लाई हुई चीजों को बड़े ही चाव से खाता था। उसको इस प्रकार मुसलमान की लाई हुई चीजों को खाता हुआ देखकर परिवार के अन्य सदस्य बौखला जाते थे। और वो बाद में उसके लिए नरेंद्र को डांटते थे। मगर नरेंद्र के पिता बड़े उदार हृदय के व्यक्ति थे। उन्होंने कभी भी इस बात का कोई विरोध नहीं किया। यदि उनकी पत्नी इस संबंध में कुछ कहती तो वे झट से कहते थे-“मैं छुआछूत को नहीं मानता हूं।"
इस छुआछूत का मतलब बालक नरेंद्र की समझ में नहीं आता था। वो सोचता था कि यदि कोई व्यक्ति इस छुआछूत को न माने तो उसका अनर्थ कैसे हो सकता है? एक बार नरेंद्र ने इस बात को जानने का प्रयत्न किया। उसने देखा कि उसके पिता की बैठक में विभिन्न जातियों के लोग आकर बैठते थे और हक्का गडगडाते थे। एक दिन जब वो सब लोग उठकर चले गए तो उसने भी हुक्के को गुड़गुड़ाकर देखा कि देखें कि उस पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

जब वह ऐसा कर रहा था तभी उसके पिता वहां आ गए और बेटे को हुक्का गुड़गुड़ाते हुए देखकर उससे पूछा
"बेटे! यह तुम क्या कर रहे हो? हुक्का पीने के लिए अभी तुम बहुत छोटे हो।”
तब बालक नरेंद्र बोला-“पिताजी मैं यह इसलिए कर रहा हूं कि मैं यह देखना चाहता हूं कि इस छुआछूत का मुझ पर क्या प्रभाव पड़ता है?"

बालक नरेंद्र की बात को सुनकर पिता को हंसी आ गई। और पुत्र की जिज्ञासा और उसकी मनुष्यता के प्रति समत्व दृष्टि पर विचार करते हुए वे वहां से चले गए।

नरेंद्र की मां भुवनेश्वरी देवी शिवभक्त थीं। वो प्रतिदिन शिव की आराधना किया करती थीं। बालक नरेंद्र अपनी मां को शिव की पूजा करते हुए देखते थे तो वे स्वयं भी पूजा करना सीख गए। अपनी माता के विपरीत वे शिव की मूर्ति के सामने अपनी आंखें बंद करके बैठ जाते थे और न जाने वे कितनी ही देर तक यूं ही ध्यान-मग्न रहते थे। जबकि उनकी माता जोर-जोर से शिव की आराधना किया करती थीं।

नरेंद्र के ऊपर अपनी मां का प्रभाव पड़ा था और या फिर यह उनके किसी पर्व जन्म का फल था. इस विषय में कछ नहीं कहा जा सकता था। वे अपने दोस्तों को भी खेल-खेल में ही अपने इस कार्य में शामिल कर लेते
थे।

शिवजी की मूर्ति को देखते-देखते बालक नरेंद्र का चंचल मन उनसे मिलने के लिए मचल उठता था। तब उसने अपनी माता से उसे भगवान शंकर से मिलवाने को कहा तो माता ने उसे टालते हुए यह कहकर बहला दिया कि भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर मिलते हैं, और जो उनसे मिलने वहां जाता है वो उसे वापस नहीं आने देते। बालक नरेंद्र अपनी मां की बात सुनकर चुप हो जाता।

लेकिन नरेंद्र लगातार इसी विषय में सोचता रहता था और एक दिन उसे एक अनोखा विचार आया और वह अपनी मां के पास जाकर बोला_“मां तुम कई बार कह चुकी हो कि भगवान शंकर मुझे कैलाश पर्वत से वापस नहीं आने देंगे, लेकिन यदि मैं साधु बन गया तो फिर वे मुझे वहां से वापस आने देंगे?"
मां ने बड़े प्यार से उत्तर देते हुए कहा-“हां बेटा! साधु बन जाने पर वो तुम्हें जरूर आने देंगे।"

बालक नरेंद्र मां का उत्तर सुनकर बड़े खुश होकर वहां से चला आया। मगर उसकी मां भुवनेश्वरी देवी चिंता में डूब गई। अब उन्हें अहसास होने लगा था कि बच्चे के मन को बहलाने की वजह से उन्होंने यह बात कह तो दी है, मगर उन्हें उससे इस तरह से नहीं कहना चाहिए था।

भुवनेश्वरी देवी का दिल बेटे के साधु बन जाने की कल्पना से ही कांप उठता था। वह अपने बेटे को भली-भांति जानती थीं। वह कब क्या कर बैठेगा उसका कुछ भरोसा नहीं था। उन्हें याद आया कि शंकराचार्य जी ने भी अपनी मां से इसी प्रकार से संन्यास लेने की आज्ञा मांगी थी। __ लेकिन उस समय इस बात को कोई नहीं जानता था कि यह छोटा-सा बालक शंकर की परम्परा को आगे बढ़ाने वाला तथा सात समुंद्र के पार उनके संदेशों को पहुंचाने वाला साबित होगा।
अनोखे बालक नरेंद्र के खेल भी न्यारे ही होते थे। वह अपने दोस्तों के साथ खेलते-खेलते भगवान शंकर की मूर्ति के सामने जाकर बैठ जाता

और अपने दोस्तों को भी वहां बैठने के लिए कहता। जब उसके दोस्त उसके पास आकर बैठ जाते थे तो तब वह उन्हें आंखें बंद करके ध्यान मग्न होने को कहता। नरेंद्र की बात मानकर उसके दोस्त भी आंखें बंद कर लेते और ध्यान मग्न हो जाते।

एक बार ऐसे ही नरेंद्र अपने दोस्तों के साथ कमरे में ध्यान मग्न बैठे थे। तभी उनका एक अन्य दोस्त वहां आया और जब उसने वहां ध्यान मग्न बैठे बच्चे के सामने एक सांप को बैठे देखा तो वह उस भयानक सांप को देखकर भयभीत हो गया और जोर-जोर से चिल्लाने लगा-“भागो....भागो... सांप....सांप!"

उसकी आवाज सुनकर नरेंद्र के साथियों ने आंखें खोल दी और अपने सामने भयानक सांप को बैठे देखकर वो चिल्लाते हुए वहां से उठकर भाग खड़े हुए। मगर नरेंद्र वैसे ही ध्यान मग्न होकर बैठे रहे।

उन सभी ने चीख-चीखकर नरेंद्र को वहां सांप होने की बात बताई, मगर नरेंद्र ने अपनी आंखें नहीं खोलीं। वह जिस प्रकार बैठे थे वह उसी तरह से ही बैठे रहे।

सांप नरेंद्र के सामने ही अपना फन फैलाए हए बैठा था। बच्चों की चीखो-पुकार को सुनकर घरवाले भी वहां आ गए और जब उन्होंने बालक नरेंद्र के सामने एक भयानक सांप को फन फैलाए हुए बैठे देखा तो उनके प्राण गले में अटक गए और उनकी समझ में नहीं आया कि वह बालक नरेंद्र को सांप के सामने से कैसे हटाएं?
बालक नरेंद्र अभी भी आंखें बंद किए हुए ध्यान मग्न बैठा हुआ था। इतना शोर होने पर भी उसने एक बार भी आंखें खोलकर नहीं देखा था। घबराए हुए परिवार वाले बालक नरेंद्र को उस सांप से बचाने का उपाय सोच ही रहे थे कि अचानक सांप ने अपना फन सिकोड़ा और वह जमीन से लग गया, उसके बाद वह धीरे-धीरे वहां से चला गया।

सांप को वहां से जाते हुए देखकर परिवार वालों की जान में जान आई। तब उसकी मां उसके पास पहुंची और बालक नरेंद्र को सीने से लगा लिया। उसकी आंखों में अब खशी के आंस थे। उसकी मां ने बालक नरेंद्र को प्यार से झिड़कते हुए कहा “कब से ये बालक शोर मचा रहे थे कि सांप तुम्हारे सामने बैठा है, तुम उठे क्यों नहीं?"

बालक नरेंद्र तो पहले ही अपनी मां को इस तरह उससे लिपटते हुए देखकर हैरान रह गया था। वह सांप की बात सुनकर और भी ज्यादा हैरान हुआ और बोला
“मैंने तो आप लोगों में से किसी की भी आवाज नहीं सुनी थी...मुझे तो इस बात का जरा भी आभास नहीं हआ।”

इसको मात्र एक संयोग ही माना जा सकता है कि जो बच्चा इतना शरारती और जिद्दी हो कि उसे एक क्षण आराम से बैठना गवारा न हो, जब वह ध्यान में बैठता था तो सब कुछ भूलकर एकाग्र हो जाता है और निर्वात स्थान में रखे दीपक के समान ही अचेतन तथा अविचल स्थिति में पहुंच जाता था।

बचपन में ही उन्होंने एक बार इस बात को बताया था कि जब वह ध्यान की मुद्रा में बैठते हैं तो उन्हें अपनी भौहों के बीच एक ज्योति पिंड-सा दिखलाई पड़ता है और यही बात उन्होंने कई बार सोते समय भी महसूस की थी। लेकिन नरेंद्र ने कभी इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। उनका यही विचार था कि सभी के साथ ऐसा ही होता होगा और इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। बालक नरेंद्र को कभी भी उस अलौकिक शक्ति का आभास नहीं हुआ जो उनके अंदर विद्यमान थी।

बालक नरेंद्र बचपन से ही साधु-संतों की ओर आकर्षित थे और उनकी सहायता करने में बड़ा आनंद आता था। यही कारण था कि अगर वो अपनी जरूरत की वस्तुओं को उठाकर साधु-संन्यासियों को दे दिया करते थे। उनके ऐसा करने पर उनके घरवालों की उन पर बहत डांट-फटकार थी। लेकिन बालक नरेंद्र पर इस डांट-फटकार का कोई भी असर नहीं पता था। और न ही उन्हें इस बात की कोई परवाह ही होती थी कि कौन उसे क्या कह रहा है, उन्हें तो जब भी मौका मिलता था वे उनकी जमकर चीजें फिर दोबारा साधुओं को पकड़ा दिया करते थे।

नरेंद्र को बचपन से ही साधुओं का सा बहरूप भरने का शौक था। तभी तो कभी-कभी वह अपने माथे पर भभूत लगाकर और छोटी-सी लंगोटी बांधकर पूरे घर में बम-बम महादेव, हर-हर महादेव तथा जय शिव, जय शिव कहते हुए जोर-जोर से ताली बजाकर नाचने लगते थे। नरेंद्र की मां जब अपने बालक को इस रूप में देखती थीं तो उन्हें क्रोध आने की जगह हंसी आती थी और अपने बेटे को शोर मचाते हुए देखकर वह भी जोर-जोर से हंसने लगती थीं। हांलाकि नरेंद्र की मां को शोर बिल्कुल भी पसंद नहीं था, वह एक शांतिप्रिय महिला थीं, लेकिन उस समय उनको देखकर कोई भी उनको यह नहीं कह सकता था कि उन्हें शोर मचाना बिल्कुल भी पसंद नहीं है और शोर सुनकर उन्हें क्रोध आ जाता है।

लेकिन ऐसा नहीं था कि नरेंद्र की बचकानी हरकतों पर उन्हें केवल हंसी ही आती थी, कभी-कभी तो उन्हें नरेंद्र पर बहुत क्रोध भी आता था। लेकिन वह क्रोध क्षणिक ही होता था। थोड़ी-बहुत डांट-डपट के बाद वह फिर वही ममतामयी मां बन जाती थीं जिसे अपने बच्चे की हर शरारत से मोह होता है।

लेकिन कभी-कभी नरेंद्र की शरारतें इतनी अनोखी होती थीं कि वह उसकी हरकतों को देखकर हैरान रह जाती थीं और उसे अपने नन्हें से बालक के भविष्य की चिंता सताने लगती थी और कभी हृदय के सैकड़ों भावों को मिलाकर एक अनोखे भाव की सृष्टि करने लगती थीं। . नरेंद्र के भविष्य पर चिंतित होने पर वह मन को दिलासा देने के लिए यह कह देती थीं कि- “जो भी होता है, सब ईश्वर की इच्छा से ही होता है। फिर वह क्यों व्यर्थ में नरेंद्र के भविष्य की चिंता करती रहती हैं?"

रामायण और महाभारत को सुनते-सुनते नरेंद्र ने उनके कई प्रसंगों को कंठस्थ कर लिया था और कभी-कभी वह अकेले में स्वयं में मग्न होकर उन्हें गाने लगते थे।
रामायण के अन्तर्गत नरेंद्र को हनुमान का चरित्र बेहद पसंद आया। स्वामिभक्त, ब्रह्मचारी, सेवावृत्ति हनुमान का जीवन रूप असम्भव कार्य को सम्भव कर दिखाने वाला वह पात्र...।
नरेंद्र हनुमान की हर एक बात को गहराई से सोचता और मन-ही-मन उन पर मुग्ध होता रहता था। वह अक्सर अपनी मां से हनुमान के चरित्र के विषय में प्रश्न करता रहता था।

एक बार नरेंद्र को उसकी मां ने बताया कि हनुमानजी तो अजर-अमर हैं। वे कभी मरते नहीं और अब भी जीवित है। इस बात को सुनकर बालक नरेंद्र के मन में सोचा कि यदि हनुमानजी जीवित हैं तो उनसे मिलना चाहिए, लेकिन वह यह नहीं जानता था कि हनुमानजी मिलेंगे कहां? और उनसे कैसे मिला जा सकता है?

हनुमानजी से मिलने के लिए नन्हा बालक नरेंद्र व्याकुल हो उठा और वह उनसे मिलने के जतन ढूंढने लगा। ऐसे ही एक बार घर में कथा के दौरान हनुमानजी के चरित्र का वर्णन करते हुए पंडितजी ने कहा कि हनुमानजी को फलों का भोजन बहुत पसंद था और इसीलिए हनुमानजी अधिकतर बाग-बगीचों में ही रहना पसंद करते हैं।

इतना सुनते ही नरेंद्र उठकर पंडितजी के पास पहुंच गया और बोला-“पंडितजी! क्या हनुमानजी केलाबाड़ी में मिलेंगे?'' _पंडितजी ने बालक नरेंद्र को उत्तर देते हुए सहज भाव में कहा-“केलाबाड़ी में ही क्यों, हनुमानजी तो हर जगह विद्यमान हैं।”
पंडितजी का गोल-मोल उत्तर सुनकर नरेंद्र बोला-“आप समझे नहीं पंडितजी?"
“क्या समझाना चाहता है बच्चा?"

“अभी आपने बताया कि हनुमानजी को फल बहुत पसंद हैं तो वे हमारी केलाबाड़ी में केला खाने जरूर आते होंगे।"

बालक समझकर पंडितजी ने यूं ही कह दिया"हां...हां...क्यों नहीं? वहां हनुमानजी जरूर मिलेंगे।"

बच्चे की इस बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन नरेंद्र तुरंत उठकर वहां से चल दिया और वह सीधा केला बाड़ी पहुंच गया। और वहां जाकर वह हनुमानजी को तलाश करने लगा। इसके लिए उसने बाग की

कई परिक्रमाएं कर डालीं। लेकिन उसे कहीं भी हनुमानजी नहीं मिले। तब वह थक-हारकर एक जगह जाकर बैठ गया। और मन-ही-मन सोचने लगा कि शायद हनुमानजी कहीं और गए हुए हैं। शायद उन्हें यहां से भी कोई अच्छा बाग मिल गया होगा जहां तरह-तरह के फलों के वृक्ष होंगे। लेकिन कोई बात नहीं, हनुमानजी केले खाने तो यहीं आएंगे। क्योंकि हमारे केलाबाड़ी से अच्छे केले कहीं और नहीं हैं।"

यह सोचते हुए वह वहीं बैठा रहा और हनुमानजी की प्रतीक्षा करता रहा। लेकिन हनुमानजी नहीं आए। यहां तक कि शाम होने लगी।

शाम होने पर मां भुवनेश्वरी को नरेंद्र नाथ की चिंता सताने लगी और वह टकटकी लगाकर दरवाजे को देखने लगी कि कब नरेंद्र घर आए।

रात का अंधेरा फैलने पर नरेंद्र वापस आया तो मां ने दौड़कर नरेंद्र को गले से लगा लिया और इतनी देर गायब रहने का कारण पूछा तो नरेंद्र ने पूरी घटना अपनी मां को बता दी।
मां ने बच्चे की बात को पूरे ध्यान से सुना और फिर इस डर से कि कहीं बच्चे का विश्वास न टूट जाए, वह बोलीं

“बेटे! निराश होने की जरूरत नहीं है। हो सकता है कि रामजी ने उन्हें अपने किसी काम से कहीं और भेज दिया हो। आखिर वो रामजी के सेवक जो ठहरे। अबकि बार जब तुम जाओगे तो वो वहां पर जरूर मिलेंगे।"

नरेंद्र के बेचैन मन को मां की बात सुनकर थोड़ी-सी राहत मिली। उसके बाद वो दोबारा वहां गए या नहीं, इस विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि उनके मन पर हनुमानजी के चरित्र का कितना गहरा प्रभाव पड़ा था जो आगे चलकर और भी मजबूत हो गया।

नरेंद्र अपने दोस्तों और साथीगणों को हनुमानजी की भांति निष्काम सेवाव्रत ग्रहण करने की सलाह देते थे।

नरेंद्र जब छः साल के हुए तो उनकी मां को उनकी पढ़ाई की चिंता सताने लगी। तब उन्होंने नरेंद्र के पिताजी विश्वनाथ जी से नरेंद्र के प्रति अपनी चिंता को बताया। विश्वनाथ जी ने तुरंत ही नरेंद्र की शिक्षा का घर पर ही प्रबंध कर दिया।

पाठशाला के एक मास्टर जी नरेंद्र को पढ़ाने के लिए घर पर ही आने लगे। शरारती नरेंद्र ने अपनी शरारतों से मास्टर जी को सताना चाहा तो. मास्टर जी तुरंत ही उसकी मनोस्थिति को समझ गए कि यह बालक डांट—फटकार से अपनी शरारतों से बाज आने वाला नहीं था। उसको तो प्रेम से ही सीधा किया जा सकता था।

और गुरुजी ने यही किया भी। उन्होंने डांटने की बजाए नरेंद्र को प्रेमपूर्वक पढ़ाना आरम्भ कर दिया।

इस बात का परिणाम अच्छा रहा और बालक नरेंद्र ने शिक्षा ग्रहण करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा घर पर ही पूरी की। उसके बाद मेटो पोलिटन इंस्टीट्यूट में शिक्षा होने लगी। यहां और भी बहुत-से अपनी उम्र वाले बच्चे पढ़ते थे। उस बालक मंडली को देखकर नरेंद्र की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।

अब तो नए-नए दोस्त थे और नए दोस्तों के साथ नए-नए खेल थे। नरेंद्र के ये नए साथी उसके साथ खेलने के लिए घर पर ही आ जाते थे और फिर पूरे घर में खूब धमा-चौकड़ी मचती थी। नरेंद्र जल्दी ही इस बाल टोली का नेता बन गया।

आरम्भ में तो नरेंद्र को यह सब बहुत अच्छा लगा। परंतु जैसे-जैसे पाठशाला का अनुशासन बढ़ता गया, नरेंद्र का मन यहां से उचटता चला गया। क्योंकि नरेंद्र एक चंचल और शरारती बच्चा था। उसे एक ही स्थान पर देर तक बैठने और वह भी अनुशासित रूप में बैठने का जरा भी अभ्यास नहीं था, जबकि वहां कक्षा में देर तक बैठना पड़ता था। छः घंटे पाठशाला में काटने पड़ते थे।

इतनी देर तक लगातार एक ही स्थान पर बैठे रहना उसे जी का जंजाल लगने लगा। इसलिए वह जरा देर बैठने के बाद खड़ा हो जाता और बाहर चला जाता। कभी-कभी क्रोध आने पर वह अपनी पुस्तक को ही फाड़ दिया करता था।

इस शरारती बच्चे की शरारतों को देखकर मास्टर साहब झल्ला जाते थे और उसको अनुशासित बनाने के लिए कठोरता का व्यवहार करते थे। लेकिन जब मास्टरों ने देखा कि उनकी कठोरता का बालक नरेंद्र पर कोई असर नहीं पड़ रहा है तो तब उन्होंने उसके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना आरम्भ कर दिया। इससे दोनों को ही लाभ पहुंचा। एक ओर जहां मास्टरों को नरेंद्र की शरारतों से मुक्ति मिल गई, वहीं नरेंद्र का मन भी पढ़ाई में लगने लगा।

डरना तो नरेंद्र ने सीखा ही नहीं था। वह किसी से भी डरता नहीं था।यहां तक कि मां-बाप जब बच्चों को भूत-प्रतों से डराते हैं, तो बच्चा डरने लगता है। लेकिन नरेंद्र को किसी भी प्रकार के भूत-प्रेत का कोई डर नहीं था। उसका जिद्दी स्वभाव दृढ़ता में बदलता गया। 

नरेंद्र की एक और आदत थी और वह आदत थी अगुवा बनने की। वह अपनी मित्र मंडली का अगुवा ही था। खेल-कूद में वह हमेशा अपने साथियों की अगुवानी करता था और यहां तक कि जब मित्र आपस में लड़ पड़ते थे, तब वही उनका न्याय करता था। पहले वो उन्हें प्यार से समझाता था। यदि कोई बच्चा उसकी बात नहीं मानता था तो वह उन्हें मार-पीटकर सीधा कर देता था और उनका बीच-बचाव कर देता था। स्वस्थ शरीर के इस बालक से सभी भय खाते थे।  नरेंद्र के पड़ोस में एक मकान था, उसमें रहने वाले बच्चे से नरेंद्र की दोस्ती हो गई। 

तब वो दोनों साथ-साथ खेलने लगे। कभी नरेंद्र का दोस्त उसके घर चला आता था तो कभी नरेंद्र खेलने के लिए अपने दोस्त के घर पर चले जाते थे। उसके दोस्त के घर में एक चम्पा का पेड़ था। नरेंद्र उस पेड़ पर चढ़ जाता और जांघों की कैंची में पेड़ की डाल को लेकर उल्टा उलटकर झूलने लगता। _एक दिन नरेंद्र जब इसी प्रकार से उल्टा लटककर झूल रहा था तो वहां के बूढ़े माली ने नरेंद्र को इस प्रकार उल्टा झूलते देखा तो उसका दिल कांप उठा। उसे लगा कि यदि यह बच्चा गिर गया तो उसको बहुत चोट लग जाएगी।

यह कल्पना करने का मुख्य कारण यह था कि वह जानता था कि यह बालक कितना जिद्दी है, मना करने से वह अपनी शरारत से बाज आने वाला नहीं था। यही सोचकर उसने नरेंद्र को रोकने के लिए एक दूसरा तरीका अपनाया और वह बोला

“बेटा आगे से इस पेड़ पर नहीं चढ़ना, इस पर ब्रह्म राक्षस रहता है।" - “यह ब्रह्म राक्षस क्या होता है?" बालक नरेंद्र ने सहज भाव से पूछा। इधर माली ने नरेंद्र को चुप देखकर समझा कि बच्चे पर उसके डराने का प्रभाव पड़ा है और वह वहां से चला गया।

उसके जाते ही नरेंद्र फिर से उस पेड़ पर चढ़ने की तैयारी करने लगा। उसको पेड़ पर चढ़ते हुए देखकर उसके दोस्त ने भयभीत होकर कहा-“नरेंद्र! पेड़ पर मत चढ़ो! अभी तो हमें बूढ़े काका ने बताया है कि इस पर ब्रह्म राक्षस रहता है।"

तब नरेंद्र निर्भीकता से बोला-“आज तो मैं ब्रह्म राक्षस को देखकर ही जाऊंगा।"
दोस्त ने कहा-“ब्रह्म राक्षस हमें मार डालेगा।"

उस पर नरेंद्र ने हंसते हुए कहा-“अरे बुद्ध! ये सब बातें हमें डराने के लिए कही जाती हैं। आज तक उस ब्रह्म राक्षस ने किसी को मारा है जो आज वह हमें मारेगा?"


तब बूढ़ा माली उसे डराने के लिए बोला-'बेटे! वह बड़ी ही भयानक सूरत वाला राक्षस होता है और छोटे बच्चों पर तो वह जरा भी दया नहीं करता। और वह राक्षस इसी पेड़ पर रहता है। इसलिए यदि कोई उसके पेड़ पर चढ़ जाए तो उसे गुस्सा आ जाता है।"
बूढ़े माली की बात सुनकर नरेंद्र सोच में डूब गया।