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संदरवन में एक वैज्ञानिक रहता था. वह नईनई खोजें करता रहता था। पर दिमाग पर ज्यादा बोझ डालने से वह हमेशा झल्लाया रहता था. वह गुस्से से बड़बड़ाता रहता था।

एक दिन वह वैज्ञानिक किसी विषय पर रिसर्च कर रहा था, तभी उस का दिमाग गुस्से से बड़बड़ाया, “उफ, इस वैज्ञानिक ने तो मेरा जीना हराम कर दिया है. न दिन में आराम करने देता है, और न ही रात में. हमेशा मुझ पर जोर डालता रहता है. यही हाल रहा तो कभी मैं धमाके के साथ फट जाऊंगा."

उस की बात दिल ने सुनी तो उस ने कहा, "दिमाग भाई, यह तुम क्या कह रहे हो? वैज्ञानिक तुम्हें परेशान करना नहीं चाहता. वह तो तुम्हारा ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर के आविष्कार करना चाहता है. कुछ नया होगा, तो सब तम्हारी तारीफ करेंगे."

"न बाबा न, मुझे अपनी तारीफ नहीं करवानी. मैं तो देर आराम से सोना चाहता हूं. पर यह वैज्ञानिक पल भर भी नहीं लेने देता," कहते हुए दिमाग आगबबूला हो गया. इस वैज्ञानिक के सिर में तेज दर्द होने लगा।

बेचारे वैज्ञानिक को दर्द से तड़पता देख कर दिल ने कहा.
"दिमाग भैया, गुस्सा थूक दो. देखो, तुम्हारी वजह से वैज्ञानिक को कितनी तकलीफ हो रही है?"
"ठीक है, तुम कहते हो तो मैं मान जाता हूं पर अब मैं इस वैज्ञानिक की खोपड़ी में ज्यादा देर तक नहीं रहूंगा. जैसे ही यह गहरी नींद में सोएगा, मैं खोपड़ी खोल कर भाग जाऊंगा," दिमाग ने कहा।

"क..क्या..? तुम्हारे बिना तो पूरा शरीर बेजान हो जाएगा. प्लीज, ऐसा मत करना," दिल घबरा कर बोला।

"अब कछ नहीं हो सकता. मैं ने भागने का पक्का फैसला कर लिया है. वैसे भी मैं खोपड़ी में कैद हो कर रहना नहीं चाहता," दिमाग मचलते हुए बोला।

सुन कर दिल दुखी हो गया. वह सोचने लगा कि आखिर दिमाग जैसा समझदार अंग ऐसी बेवकफी कैसे कर सकता है? फिर वह धड़कते हुए दूसरे अंगों को आक्सीजन पहुंचाने में जुट गया, ताकि उन की हिम्मत बनी रहे. है उधर रात में वैज्ञानिक जैसे ही गहरी नींद में सोया, तो दिमाग की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने जल्दी से वैज्ञानिक की खोपड़ी खोली और निकल कर भाग गया. कुछ ही देर में वह घने जंगल में जा पहुंचा. रात होने कीवजह से घुप्प अंधेरा था. कीड़ेमकोड़ों की आवाजें सुन कर दिमाग के कदम ठिठक गए. वह मन ही मन बुदबुदाया, "उफ, यह जंगल तो भयानक है. चारों ओर से डरावनी आवाजें आ रही हैं. शिकारी जानवर भी गश्त लगा रहे हैं. उन की नजर मुझ पर पड़ गई तो खैर नहीं. मुझे झाड़ियों में छिप जाना चाहिए. सुबह का वक्त जंगल की सैर के लिए ठीक रहेगा."

फिर वह घनी झाड़ियों में छिप गया. तभी ठंडी हवा के झोकों ने उसे गहरी नींद में सुला दिया. आज वह पहली बार आराम से सो रहा था. क्योंकि आज उसे वैज्ञानिक की रोकटोक का डर नहीं था।

अगली सुबह सूरज निकलते ही दिमाग की आंख खुल गई और वह अंगड़ाई लेते हुए जंगल की सैर करने निकल पड़ा. चारों तरफ फैली हरियाली देखते ही, दिमाग तरोताजा हो गया. वह खुशी से चहकते हुए बड़बड़ाया, “वाह, यह जंगल तो बहुत ही सुंदर है. चारों तरफ हरियाली ही हरियाली है. काश, मैं खोपड़ी की कैद से पहले ही बाहर आ जाता। अब मैं उस खोपड़ी में कभी वापस नहीं जाऊगा और जंगल में आजाद और खुशहाल जिंदगी बिताऊंगा."

तभी एक सियार की नजर उस पर पड़ी तो वह जीभ लपलपाते हुए बोला, "अरे वाह, यह दिमाग तो बड़ा ही स्वादिष्ठ है. यह किसी की खोपड़ी से निकल कर भागा है. में ने आज तक ऐसा बेवकूफ दिमाग नहीं देखा. मुझे इसे चट कर जाना चाहिए. ऐसा मौका मुझे फिर नहीं मिलेगा."

सोच कर सियार दिमाग के पास जा पहुंचा और उसे पकड़ने की कोशिश करने लगा. देख कर दिमाग के हाथपैर फूल गए. वह चीखते हुए भागा, "ब..बाप रे, यह सियार कहां से आ मरा? जान बचाने का अब एक ही रास्ता है कि भागो..."

फिर क्या था, दिमाग ने दौड़ लगा दी. सियार भी उस के पीछे दौड़ा. दिमाग आगेआगे तो सियार पीछेपीछे. दि दोनों बहुत देर तक भागते रहे. इस से उन की सांस फूल गई और वे रुक कर सुस्ताने लगे. तभी दिमाग को एक आइडिया सूझा तो वह बोला, "तुम बेकार ही मेरे पीछे पड़े हो. जरा पीछे मुड़ कर देखो, मेरा भाई आ रहा है. वह सुस्त और बेकार है. तुम उसे आसानी से पकड़ सकते हो." मा सुन कर सियार ने पीछे मुड़ कर देखा तो दिमाग ने जमीन पर पड़ा बबूल का कांटा उठाया और सियार को चभो दिया. कांटा चुभते ही सियार की चीख निकल गई, “उई मां, कांटा, हाय, अब यह बाहर कैसे निकलेगा...?" कहा "हा...हा..., मूर्ख सियार, मैं दिमाग हूं. कोई भेड़, बकरी नहीं जो तू मुझे आसानी से चट कर ले. अब तुम कांटे का मजा लो और मैं चला मस्ती करने," कहते हए दिमाग हंसा और जमीन पर बिखरे कांटे उठा कर वहां से चला गया!

सियार से छुटकारा पा कर दिमाग के हौसले बुलंद हो चुके थे. इसलिए वह सीना तान कर जंगल में घूमने लगा. वह दिन भर घूमताफिरता रहा. जब वह थक कर चूर हो गया तो एक पेड़ के नीचे बैठ कर सुस्ताने लगा।

दिमाग पेड़ के नीचे बैठा आराम कर ही रहा था कि तभी वहां से एक लकड़बग्घा गुजरा. दिमाग को अकेला पा कर उस के कदम ठिठक गए. फा लकड़बग्घा लार टपकाते हुए उस के पास जा पहुंचा और आंखें मटकाते हुए बोला, "अरे वाह, तुम तो बड़े ही मोटेताजे हो. तुम्हें खा कर तो मेरी भूख आसानी से मिट जाएगी. इसलिए प्यारे दिमाग, मेरे पास आओ और मेरी भूख मिटाओ." मसामने लकड़बग्घे को देख कर दिमाग को सांप सूंघ गया. पर उस ने हिम्मत से काम लिया और बबूल का कांटा उस के पैर में चुभो दिया. कांटा चुभते ही लकड़बग्घा बिलबिला उठा. मौका पा कर दिमाग वहां से निकल भागा।

दिमाग को अब लगने लगा था कि खोपड़ी के बाहर की दनिया खतरों से भरी है और उसका ज्यादा देर तक अपने शरीर से दूर रहना ठीक नहीं है।

वह वापस घर की ओर चल पड़ा. तभी एक चालाक लोमड़ी दिमाग का रास्ता रोक कर पूंछ हिलाने लगी।

लोमड़ी को देख कर दिमाग ने समझदारी से काम लेते हुए कहा, "लोमड़ी बहन, मैं जानता हूं कि तुम मुझे खाना चाहती हो. मैं भी अब जिंदा नहीं रहना चाहता. क्योंकि मैं अपनी प्यारी खोपड़ी से बिछड़ चुका हूं. मेरे पास एक जादुई कांटा है, जो मैं तुम्हारी नाक में पहनाना चाहता हूं."

"जादुई कांटा... न बाबा न, मैं कांटा नहीं पहनूंगी. भला कांटा पहनने से क्या लाभ?" लोमड़ी चौंक कर बोली।
दिमाग ने कहा, "लोमड़ी बहन, यह कोई मामूली का नहीं है. यह मुझे सफेद बालों वाली बुढ़िया ने दिया था कहा था कि जो भी इस कांटे को पहनेगा, वह दुनिया का से खूबसूरत प्राणी बन जाएगा. क्या तुम इसे पहन कर वन ही सब से सुंदर लोमड़ी नहीं बनना चाहती."

वन की सब से सुंदर लोमड़ी बनने की चाह में वह अपनी पूंछ जोरजोर से हिलाने लगी. फिर वह अपनी नाक आगे बढाते हुए बोली, "हां...हां..., क्यों नहीं? हर लोमड़ी का सपना होता है कि वह खूबसूरत दिखे. इसलिए तुम भी बिना देर किए जादुई कांटा मेरी नाक में पहना दो."
दिमाग तो यही चाहता था. जैसे ही लोमड़ी ने नाक आगे की तो उस ने कांटा नाक में घुसेड़ दिया. इस से लोमड़ी दर्द से छटपटा उठी. दिमाग घर की ओर भाग खड़ा हुआ. क्योंकि अब वह और खतरा मोल लेना नहीं चाहता था।

वह सरपट भागते हुए घर जा पहुंचा और बेजान पड़े वैज्ञानिक की खोपड़ी खोल कर फिर से अंदर घुस गयां।

वैज्ञानिक के शरीर में जान आ गई. दिमाग बड़बड़ाया, "जान बची तो लाखों पाए, लौट के बुद्ध घर को आए. वाकई मेरे लिए इस खोपड़ी से ज्यादा सुरक्षित जगह दूसरी नहीं है. अब मैं इस खोपड़ी से बाहर कभी नहीं निकलूंगा."

"ठीक कहा, यही बात तो मैं तुम्हें समझाता था. पर तुम मेरी बात एक कान से सुन कर दूसरे कान से बाहर निकाल देत थे. खैर कोई बात नहीं, सुबह का भूला शाम को घर आ जाए, तो उसे भूला नहीं कहते," दिल ने चहकते हुए कहा।

दिल की बात सुन कर दिमाग ने दिल से पक्की दोस्ती कर ली. खोपड़ी में प्रसन्न रहने वाले दिमाग की मदद से वैज्ञानिक को नईनई सफलताएं मिलती चली गईं।