सेवा में

संपादक महोदय
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महोदय,

    मै आपके समचाचार—पत्र के माध्यम से अपनी आवाज़ जनता तक पहुॅंचाना चाहता हूॅं। कृप्या मेरे निम्न विचार पाठकों के लिए निर्धारित स्तंभ 'आपने लिखा' में प्रकाशित करे—

''आजकल नागरिक जीवन में लाउडस्पीकर का मनमाना उपयोग एक आम बात हो गई है। यद्यपि लाउडस्पीकर के संबंध में कुछ नियम है। उन पर रोक और छूट की नियमपूर्वक व्यवस्था की गई है। लेकिन जनता इन नियमों के बारे में कुछ नहीं जानती है। परिणामस्वरूप लोग अपनी सुविधानुसार जब चाहे लाउडस्पीकर लगााकर रात भर गाते—बजाते हैं, भगवान का भजन करते हे, सांस्कृतिक संध्याओं का आयोजन करते हैं, माँ भागवती का गुणगाान करते है, मंदिरों में कथा—कीर्तन करते है, मसजिद में नमाज अदा करते हैं, गुरूद्वारो में पूजा पाठ करते हैं, विवाह—शादियों पर आनंद—उत्सव मनाते है। अपने कार्यक्रम के नशे में दूसरों के दुख—सूख की कोई परवाह नहीं करता। रामलीला के दिनों में रामलला—स्थान के नजदीक रहने वाले छात्रों की क्या दूर्दशा होती है, यह तो वे ही बता सकते है जिन घरों के चारों ओर मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे होते है। वहाँ के निवासियों को क्रम से सबकी रामकहानी सुननी पड़ती है। सच बात तो यह है कि वहाँ के निवासी बहरे हो जाते हैं। वे तनावग्रस्त जीवने जीते है।
प्रशासन का कर्तव्य है कि वह हर समाजिक, राजनैतिक, धार्मिक और व्यक्तिगत उत्सव पर होने वाली आवाज़ को काबू में रखें। जरूरत पड़े तो नियम का उल्लंघन करने वालो पर दंड लगाया जाए।
शोर के दबाव को कम करने में सबसे बड़ी भूमिका स्वंय जनता की है। जनता को चाहिए कि वह बेकाबू आवाज के विरूद्ध आवाज़ उठाऐ यह काम धैर्य, कुशलता और कोमलता का है। अत: जनता की सविनय आग्रह से शोर के दबाव को कम कर सकती है। भाई—चारे की नीति से लाउडस्पीकरों के शारे पर काबू किया जा सकात है।''

भवदीय

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