उठो और काम में लग जाओ। यह जीवन भला है कितने दिन? तम इस दुनिया में आये हो तो कुछ चिह्न छोड़ जाओ अन्यथा तुम में और वृक्ष आदि में अन्तर ही क्या है? वे भी तो पैदा होते हैं, परिणाम को प्राप्त होते हैं और मर जाते हैं।

मेरा जीवन सत्य के लिये है। सत्य कभी भी मिथ्या के साथ मेल नहीं करेगा। यहां तक कि यदि दुनिया भी मेरे विरोध में खड़ी हो जाये तो भी अन्त में सत्य की ही विजय होगी।

आज हमारे को जिस चीज की आवश्यकता है, वह है लोहे की मांसपेशियां और फौलाद के स्नायु, प्रचंड इच्छा शक्ति, जिसका अवरोध दुनिया की कोई ताकत न कर सके जो जगत के गुप्त तथ्यों और रहस्यों को भेद सके और जिस उपाय से भी हो अपने लक्ष्य की पूर्ति करने में असमर्थ हो, फिर चाहे समुद्र तल में ही क्यों न जाना पड़े-साक्षात मृत्यु का ही सामना क्यों न करना पड़े।

हम तोते के समान कई बातें बोल जाते हैं पर उनमें से एक को भी कार्य में नहीं उतारते। केवल मुख से कह देना और आचरण में न जाना, यह हमारा एक स्वभाव ही बन गया है। इसका क्या कारण है? शारीरिक दुर्बलता। इस प्रकार का दुर्बल मस्तिष्क कुछ भी नहीं कर - हमें उसको शक्तिशाली बनाना होगा। सबसे पहले हमारे नवयवकों सकता है। हम की बलि होनी चाहिये। धर्म फिर बाद में आयेगा। तुम गीता के अध्ययन या फटबाल के द्वारा स्वर्ग के अधिक समीप पहुंच सकोगे। जब तुम्हारी नेशियां कुछ मजबूत हो जायेंगी तब तुम गीता को अच्छी तरह समझ
जब तुम्हारे खून में कुछ जोश आ जायेगा तब तुम कृष्ण की महान 7 और प्रचण्ड शक्ति को और भी अच्छी तरह समझ सकोगे। जब तुम पने पैरों पर दृढ़ता के साथ खड़े रह सकोगे और अपने को ‘मनुष्य' अनुभव योगे तब उपनिषदों और आत्मा की महत्ता को और अच्छी तरह जान सकोगे। | कमजोर मस्तिष्क कुछ भी करने योग्य नहीं है। अब हमें ऐसे बेकार दिमाग को बदल डालना होगा और अपनी सोच को भी बदल लेना पड़ेगा। तम लोग शक्तिवान बनो, गीता का पाठ करने के अलावा तुम कोई खेल। खेलो ताकि तुम्हारा शरीर स्वस्थ और दिमाग मजबूत बने । यदि तुम दिमागी तौर पर मजबूत बनोगे तो तुम्हें गीता को अच्छी तरह समझने में आसानी होगी।

देह में शक्ति नहीं, हृदय में उत्साह नहीं, मस्तिष्क में प्रतिभा नहीं-क्या। होगा रे इन जड़ पिण्डों से? मैं हिला-डुलाकर इनमें स्पन्दन लाना चाहता हूं। वेदान्त के अमोघ मन्त्र से इन्हें जगाऊंगा। उठो-जागो...इस कथन को सिद्ध करने के लिये ही मैंने जन्म लिया है।

वीर्य ही साधुता है और दुर्बलतां पाप है, यदि उपनिषदों में कोई ऐसा शब्द है जो वज्र की भांति जोर से अज्ञान की वेदी पर गिरकर उसे छिन्न-भिन्न कर डाले तो वह शब्द है ‘अभय’ निडर हो जाना। यदि विश्व को कोई धर्म सिखाता है तो वह है अभय। इसी मूल मन्त्र का आश्रय लेना होगा क्योंकि * हा पाप है और यही दिव्य पाप का निश्चित कारण है।

लन-देन प्रकृति का नियम है। यदि भारत चाहता है कि उसका सिर रहे तो फिर उसे अपना ऐश्वर्य निकालकर संसार की सारी जातियों में बेबूझ वितरण कर देना चाहिये। लुटा देना चाहिये और उसके बदले में जो कुछ मिल जाये उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।

हमारी जाति ने अपनी विशेषता गंवा दी है। यही भारत में रहने वालों के कष्ट और दुःखों का कारण है। इन सारी विपत्तियों को दूर करने के लिये हमें ऐसे उपाय खोजने होंगे जिससे हमारी जातीय विशेषता में विकास हो सके। इसके लिये हमें निम्न जातियों को भी ऊपर उठाना होगा। हिन्द मुसलमान और क्रिस्तान सभी ने उन्हें पैरों तले कुचल डाला है। अब उन्हें उठाने के लिए हमें अपने अंदर पर्याप्त शक्ति का संचार करना होगा। यह काम हमें अर्थात् असली हिन्दुओं को ही अंजाम देना पड़ेगा। संसार में जहां जो दोष दिखाई देते हैं, वे न तो देशों के हैं और न वहां माने जाने वाले धर्म के हैं। उन दोषों की उत्पत्ति के वो कारण हैं जिन्होंने धर्मों की यथार्थ रीति का पालन नहीं किया गया है। फलतः धर्म का कुछ भी दोष नहीं-दोषी हैं तो उन धर्मों का सही से अनुसरण न करने वाले वहां के लोग।

हमें अपने देश की आध्यात्मिक शिक्षा और सभी प्रकार की ऐहिक शिक्षा अपने हाथ में लेनी होगी और उस शिक्षा में भारतीय शिक्षा की सनातन गति स्थिर रखनी होगी। साथ ही सनातन प्रणाली को यथा सम्भव ग्रहण करना होगा।

साधारणतः मनुष्य अपने दोषों और भूलों को पड़ोसियों पर लादना चाहता है, यह न जमा तो उन सब को ईश्वर के मत्थे मढ़ना चाहता है। और यदि इसमें भी सफल न हुआ तो फिर भाग्य नामक एक भूल की कल्पना करता है और उसी को उन सबके लिये उत्तरदायी बनाकर निश्चित हो जाता है। यह प्रश्न यह है कि “भाग्य' नाम की वस्तु है क्या और रहती कहां है? हम जो कुछ बोते हैं, बस वही पाते भी हैं, हम स्वयं अपने भाग्य के विधाता हैं। हमारा भाग्य यदि खोटा हो तो कोई दूसरा दोषी नहीं और यदि भाग्य भी हो तो कोई दूसरा प्रशंसा का पात्र नहीं।

जिस प्रकार से तपस्या कठिन है वैसा ही कठिन निष्काम काम करना भी है। इसलिये औरों के मंगल के लिये जो लोग कार्य करते हैं उनके विरुद्ध तुझे कुछ कहने का अधिकार नहीं है। यदि तुझे तपस्या अच्छी लगी है तो ये जा, परन्तु यदि किसी को कर्म अच्छा लगे तो उसे रोकने का मुझे अधिकार है? तू क्या यही अनुमान किये बैठा है कि कर्म तपस्या ही नहीं है?

बड़े काम में बहुत समय तक लगातार और असामान्य प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है। यदि थोड़े से व्यक्ति असफल भी हो जायें तो भी उसकी चिंता हमें नहीं करनी चाहिये। संसार का यह नियम है कि अनेक नीचे गिरते के कितने ही दुःख आते हैं तथा कितनी ही भयंकर कठिनाइयां सामने उपस्थित होती हैं एवं स्वार्थपरता तथा अन्य बुराइयों के साथ हृदय में घोर संघर्ष होता है जबकि आध्यात्मिकता की प्रज्ज्वलित अग्नि की आंच से इन सभी का विनाश होने वाला होता है।

दान का स्थान इस संसार में सदैव ग्रहण करना चाहिये। जहां तक सम्भव हो सके बिना बदले की चाह के अपना सब कुछ दे डालो। प्रेम दो, सहायता दो सेवा अर्पित करो, जो कुछ थोड़ा तुमसे बन सकता है वही दो पर ‘दुकानदारी के भाव से बचे रहो। न कोई शर्त रखो और न कोई तुम पर शर्त डालेगा, न तुम पर कोई बंधन आयेगा । जिस प्रकार भगवान हमें स्वेच्छा से देते हैं, उसी प्रकार हम भी स्वेच्छा से दें।

बदले में किसी से कुछ मत चाहो और न ही किसी से कुछ मांगो। तुम्हें जो दे देना है वह दे दो, वह तुम्हारे पास लौटकर आयेगा–पर अभी उसकी बात मत सोचो। वह वर्धित होकर, सहस्र गुना वर्धित होकर वापस आयेगा–पर ध्यान उधर न जाना चाहिये। तुम्हें केवल देने की शक्ति है। दे दो, सब बात वहीं पर समाप्त हो जाती है।

चेष्टा करो वीर्यवान बलवान बनने की। अपने उपनिषदों-उसी बलप्रद जालोकप्रद नित्य दर्शन शास्त्र का फिर अवलम्बन ग्रहण करो। मजेदार लेकिन उचलता बढ़ाने वाले विषयों को छोड़ो। ये उपनिषद रूपी बहुत बड़े सत्य सहज नही समझ मेआ जाने योग्य हैं। जिस तरह तुम्हारे अस्तित्व को सिद्ध करने । १ आर किसी भी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, उसी तरह उपनिषदों का हाल है। ये सहज ही समझ में आ सकते हैं। तुम्हारे आगे उपनि के यही सत्य तत्व मौजूद हैं, उनको ग्रहण करो, उन्हें प्राप्त करके कार्य में परिणत करो। ऐसा करने से अवश्य ही भारत का उद्धार होगा।

तुम लोग धर्म पर विश्वास करो न करो, किन्तु यदि जातीय जीवन । अक्षुण रखना चाहो तो तुम्हें धर्म की रक्षा के लिये तत्पर होना ही पड़ेगा। एक हाथ से बस दृढ़ता से संघर्ष को पकड़ो और दूसरा हाथ इसलिये बढ़ाओ कि जो कुछ अन्य जातियों से यहां सीखने लायक है सीखो। लेकिन याद रखो, जो कुछ भी सीखो, उसे हिन्दू जीवन के मूल आदर्शों के अनुरूप बना लो।

हमें आगे बढ़ना ही होगा, लेकिन उस टूटे-फूटे मार्ग से नहीं जिसे हमें स्वधर्म छोड़ देने वालों ने और पादरियों ने बतलाया है। हमें तो अपने भाव से और अपने ही रास्ते से तरक्की के मार्ग पर बढ़ना होगा।

हमें ऐसा कुछ उपाय करना होगा, जिससे हमारे युवकों को वेदों, अनेक दर्शनों, और भाष्य ग्रन्थों की शिक्षा प्राप्त हो, साथ ही अमान्य अवैदिक धर्मों के तत्व ही उन्हें समझा दिए जायें, ताकि उन्हें घर का ज्ञान हो जाये और वे बाहर की बातों से भी अपरिचित न रहें।

संसार में हमेशा देने वाले दाता बनो, दाता का आसन ग्रहण करो। अपना सब कुछ दे डालो किन्तु खबरदार, कुछ बदले की चाहत मत करना।

क्या केवल पुस्तकों का पढ़ना ही शिक्षा है? नहीं। तो क्या अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने का नाम शिक्षा है? नहीं। जिसकी सहायता से इच्छा शक्ति का वेग और स्फूर्ति अपने वश में हो जाये और जिससे आपका मनोरथ, उसका उद्देश्य सफल हो जाये वही शिक्षा है।

शिक्षा का मतलब यह भी नहीं है कि कुछ शब्दों को पढ़-लिख लिया। शिक्षा से मतलब व्यक्तियों को इस तरह से संगठित करने से है जिससे कि उनकी इच्छा सद्विषयों की तरफ दौड़े और कार्य भली भांति सिद्ध हो। इसी प्रकार की शिक्षा शिक्षा पाने पर हमारे भारत की भलाई करने में सभी निडर महिलाओं जटय होगा। वे संघमित्र, लीलवती, अहिल्याबाई, मीराबाई और श्री प्रभति का पदानुसरण करने में समर्थ होंगी। वे पवित्र स्वार्थ की १ अछती वीर नारियां होंगी। भगवत के चरण कमलों के स्पर्श करने में वीरता का प्रमाण होगा और वे वीर प्रसविनी होने की पात्र होंगी।

हमारा प्रबल जातीय पाप देश के सर्व साधारणों का अपमान करना है और यही वह एकमात्र कारण है जिससे हम अवनति की ओर अग्रसर होते हैं। जब तक भारत की जनता उत्तम रूप से शिक्षित नहीं होती, जब तक उसे खाने की अच्छी खुराक भरपेट नहीं मिलती और तन ढकने के लिये वस्त्र नहीं मिलते तथा जब तक कुलीन बड़े आदमी भली भांति उनकी देखभाल नहीं करते, तब तक राजनीति का कितना ही आन्दोलन क्यों न किया जाये उसका कुछ भी फायदा नहीं होगा। यदि सचमुच भारत का पुनरुद्धार करने की इच्छा है तो हमें जनता के लिये अवश्य ही काम करना होगा।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली मनुष्यत्व की शिक्षा नहीं देती, गठन नहीं करती और एक बनी बनाई चीज को तोड़ना-फोड़ना जानती है। ऐसी अवस्था मूलक अथवा अस्थिरता का प्रचार करने वाली शिक्षा अथवा वह शिक्षा जो केवल नेतिभाव को ही फैलाती है किसी काम की नहीं है। ऐसी शिक्षा तो मौत से भी भयंकर है।

ईश्वर को अपने आप को पूर्ण रूप से समर्पित कर देने वाले, उन पूर्व लिखित कर्म करने वालों की अपेक्षा संसार के भले के लिये बहुत अधिक काम करते हैं। जिसने अपने को बिल्कुल शुद्ध कर लिया है, ऐसा एक भी आदमी हमारा धर्म प्रचारकों के मुकाबले कहीं बढ़कर काम करता है। चित्त का शुद्धि और मौन रहने से ही बात में जोर आ जाता है।

मस्तिष्क में अनेक तरह का ज्ञान भर लेना, उससे कुछ काम न लेना जार जन्म भर वाद-विवाद करते रहने का नाम शिक्षा नहीं है। अच्छे आदर्श और अच्छे भावों को काम में लाकर लाभ उठाना चाहिये, जिनसे वा मनुष्यत्व चरित्र और जीवन बन सके।

किसी से किसी प्रकार की बहस मत करो। यदि तुम किसी को सिखाना चाहते हो सिखाओ और किसी बात में मत उलझो। औरों अपनी-अपनी धुन में मस्त रहने दो। सत्यमेव जयते नानृतम वदा कि विवाटे अर्थात् जब सत्य की ही जीत होती है तो फिर विवाद करने से मतलब, कुछ परीक्षायें पास कर लेना अथवा धुआंधार व्याख्यान देने की शक्ति प्राप्त कर लेना ही शिक्षित हो जाना नहीं कहलाता। जिस विद्या के बल से जनता को जीवन संग्राम के लिये समर्थ नहीं किया जा सकता, जिसकी सहायता से मनुष्य का चरित्र बल परोपकार में तत्पर और सिद्ध का सा साहसी नहीं किया जा सकता क्या वह शिक्षा है? शिक्षा तो वही है जो मनुष्य को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाती है।

एक दिन शरीर को जाना ही है तो फिर क्यों न इस शरीर का भरपूर उपयोग किया जाये? उसे आलसियों की तरह क्यों जीया जाये? जंग लगाकर मरने की अपेक्षा घिस-घिसकर, कुछ करके मरना कहीं अच्छा है। मर जाने पर हड्डियां जादू के खेल में लगेंगी, इसकी चिन्ता करना व्यर्थ है।

प्रत्येक कर्मफल भले और बुरे का मिश्रण है। ऐसा कोई भी शुभ कार्य नहीं है जिसमें अशुभ का संस्पर्श न हो। आग के चारों ओर व्याप्त धुएं के समान कर्म में सदैव कुछ न कुछ अशुभ लगा ही रहता है। हमें ऐसे कार्य में रत होना चाहिये जिनसे भलाई अधिक से अधिक मात्रा में हो।

संसार में आकर जो मनुष्यं प्रकृतियों के विरुद्ध संघर्ष करता है, उसके लिये उसे अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं। तब कहीं वह सफलता की चरम सीमा पर पहुंचता है। अर्थात् अन्त में प्रकृति पर विजय प्राप्त कर लेता है और अपनी मुक्ति प्राप्त कर लेता है और जब वह मुक्त हो जाता है तब प्रकृति स्वयं उसकी दासी बन जाती है।

अब तुम्हें महावीर के जीवन को अपना आदर्श बनाना होगा। देखो वो कैसे श्री रामचन्द्र की आज्ञा मात्र से विशाल सागर को लांघ गये। उन्हें जीवन या मत्यु से कोई नाता नहीं था। वो सम्पूर्ण रूप से इन्द्रियजित थे और उनकी प्रतिभा अद्भुत थी। अब तुम्हें अपना जीवन दास्य-भक्ति के उस महान आदर्श पर खड़ा करना होगा। उसके माध्यम से क्रमशः अन्य सारे आदर्श जीवन में प्रकाशित होंगे। गुरु की आज्ञा का सर्वतो भावेन पालन और अटूट ब्रह्मचर्य-बस यही सफलता का रहस्य है। हनुमान एक ओर जिस प्रकार सेवा दर्श के प्रतीक हैं उसी प्रकार दूसरी ओर सिंह विक्रम के भी प्रतीक हैं-सारा संसार उनके सम्मुख श्रद्धा और भय से सिर झुकाता है।

दूसरों की भलाई और सेवा करना ही महान धर्म है। पुरुष और स्त्री, युवा तथा वृद्ध कोई अछूत नहीं अपितु पशु भी इस धर्म को समझ सकते है।

प्रेम और दया से सारा संसार खरीदा ज सकता है, व्याख्यान, पुस्तके तथा दर्शन आदि से नहीं।

ईष्या के जो दाग प्रकति गलाम के मस्तक पर लगा देती है, आओ पहले उत धो डालें। किसी से ईष्र्या मत करो। भले काय म रत व बटाने को तैयार रहो। इस विश्व-ब्रह्माण्ड के प्रत्येक जीव के लिये
शुभ विचार रखो।

बिना बुराई के भलाई करना सम्भव होता है क्योंकि ऐसी आत्मा ३ उस पदार्थ को जान लिया है और अपने वश में कर लिया है जिससे शुद्ध और अशुद्ध दोनों का निर्माण होता है।

लोहे पर तभी चोट लगायी जा सकती है जब वह गर्म होता है। सस्ती की कोई जरूरत नहीं। ईष्र्या और अहंता को सदा के लिये गंगा में डुबो देना चाहिये। कार्य क्षेत्र में महाशक्ति के साथ आ जाओ। काम-काम, काम बस यही जीवन का मूलमन्त्र है।

क्रेड जीवन और मृत्यु में केवल उतना ही अन्तर है जितना विस्तार और संकोच में होता है। प्रेम ही जीवन है और द्वेष ही मृत्यु है। हम जिस दिन से संकुचित होने लगे, हमने अन्य जातियों को घृणा की दृष्टि से देखना आरम्भ किया। उसी दिन से हमारी मृत्यु का श्री गणेश हो गया। और जब तक हम विस्तार शील नहीं बनते, तब तक हम किसी भी तरह मृत्यु के पंजे से अपने को बचा नहीं सकते। इसलिये हमें पृथ्वी की सभी जातियों के साथ हिल-मिल करना होगा।

प्रेम कभी निष्फल नहीं हो जाता। चाहे आज हो चाहे कल चाहे सैकड़ों युगों के पश्चात्-प्रेम की विजय होगी और अवश्य ही होगी। क्या तुम मनुष्य जाति से प्रेम करते हो? भगवान की खोज में कहां जाते हो? | दरिद्र, दुखिया और दुर्बल, क्या ये सभी तुम्हारे ईश्वर नहीं हैं? पहले उनकी उपासना क्यों नहीं करते? गंगा के किनारे रहकर कुआं किसलिये खोदते हो? प्रेम की सर्वशक्तिमान पर विश्वास करना सीखो। क्या तुम्हारे हृदय में प्रेम है? यदि है तो तुम सर्वशक्तिमान हो । यदि तुम्हें एक भी कामना नहीं, कामनाओं से बिल्कुल विहीन हो-यदि ऐसा है तो तुम्हारी शक्ति को रोकने की सामर्थ्य किसमें है? अपने चरित्र के बल से मनुष्य सब जगह विजयी हो सकता है। भगवान अपनी संतान की रक्षा समुद्र के भीतर भी किया करते हैं। तुम्हारी मातृभूमि वीर संतान मांगती है। तुम लोग वीर बनो।

चालाकी से बड़ा कोई काम नहीं होता। प्रेम, सच्चाई, पर-प्रीति और सुदीर्घ पराक्रम की सहायता से सारे कार्य सिद्ध होते हैं। ‘तत्कुरू पोरुषम’ अब उद्योग करो।

संसार में जो कुछ भी उन्नति हुई है वह वास्तव में प्रेम की शक्ति से ई है. दोष देने से कभी भला काम नहीं किया जा सकता। हजारों वर्ष गधा करके यह देख लिया गया है। निन्दा करने से कुछ लाभ नहीं होता।

रुपये से कुछ नहीं होता न उससे कोई लाभ ही होता है, न यश मिलता है और न विद्या मिलती है, जो कुछ होता है प्रेम से होता है। बाधा विघ्न रूप वज्र की तरह दृढ़ शरीर में होकर एक चरित्र ही मार्ग बना सकता है।

जिनकी समदृष्टि हो गयी है वे ब्रह्म में अवस्थित माने जाते हैं। सब प्रकार की घृणा का अर्थ है-आत्मा के द्वारा आत्मा का विनाश । प्रेम ही जीवन का यथार्थ नियामक है। प्रेमावस्था को प्राप्त करना सिद्धावस्था है। किन्तु हम जितना ही सिद्धि की ओर अग्रसर होते हैं, उतना ही कम काम करते हैं। सात्विक व्यक्ति समझते और देखते हैं कि सबकुछ खिलवाड़ मात्र है, इसी से वे किसी चीज में सर नहीं खपाते।
                                                                                                   निर्विघ्न उद्देश्य सिद्धि के लिये चटपट कोई काम कर डालना उचित नहीं। सिद्धि प्राप्ति के लिये इन तीनों गुणों-पवित्रता, सहनशीलता और अध्यवसाय-और सबसे अधिक प्रेम की आवश्यकता है।

पोथी-पत्तरा, विद्या-मिश्रा, योग, तप, ज्ञान, ध्यान प्रेम के आगे सब धूल के समान हैं। प्रेम ही भक्ति है प्रेम ही ज्ञान है और प्रेम ही मुक्ति है। यही पूजा-पाठ है। नर-नारी का रूप धारण करने वाले प्रभु की सेवा पूजा है।

हिन्दुओं का (आजकल का) धर्म न वेद में है न पुराण में न भक्ति में है, न मुक्ति में-धर्म चौके-चूल्हे में रह गया है, (मौजूदा) हिन्दू धर्म न विचार भाग में है और न ज्ञान मार्ग में। छुआछूत में है-खबरदार! दूर-दूर! हमें न ४ लेना। बस इसी में रह गया है। इस छूत के झमेले में पड़कर जान न , आत्मा वत्सर्व भुतेषु' क्या सिर्फ पोथी में ही धरा रहेगा? जो मुट्ठी भर अन्न भी गरीब को न दे सकेंगे, वे मुक्ति का खाक देंगे? जो दूसरों की लगने से अशुद्ध हो जाते हैं वे औरों को क्या पवित्र करेंगे, छुआछत है? एक प्रकार की मानसिक व्याधि है, इससे बचकर ही रहना चाहिये।

मैं न मुक्ति चाहता हूं, न भक्ति, मैं महारौरव नरक में भी जाने का तैयार हूं। ‘वसन्त वल्लोकाहितं चरत' वसन्त जिस प्रकार संसार का भला करता है उसी तरह से भलाई करते रहना मेरा धर्म है।

''सत्य के पक्ष वाले संसार में सदैव विजयी होते हैं। असत्य के पक्ष वाले इस कलियुग में यदि किसी पुण्यवश सुखी भी हों तो एक-न-एक दिन दुखी होकर सत्य पथ का अनुगमन करना ही पड़ेगा।''


जो पिता की सेवा करना चाहे, उन्हें उनकी संतान की सेवा पहले करनी पड़ेगी। जो महादेव जी सेवा करनी चाहे उसे पहले जगत के प्राणियों की सेवा करनी होगी। शास्त्रों में लिखा है जो लोग भगवान के दासों की सेवा करते हैं, वही भगवान के श्रेष्ठ दास हैं।

हृदय को समुद्र की भांति महान कर लो, संसार की छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठ जाओ। यहां तक कि अशुभ घटना होने पर भी खूब आनन्द मनाओ। दुनिया को एक तस्वीर की तरह समझो।

मनसा वाचा कर्मणा ‘जग हिताय' बनना पड़ेगा। तुमने पढ़ा है मातृ देवो भव, पितृ देवो भव! मैं कहता हूं दरिद्र देवो भव, मूर्ख देवो भव, दरिद्र, मूर्ख, अज्ञानी और कातर व्यक्ति ही तुम्हारे लिये देवी-देवता हैं। उन्हीं की सेवा को तुम परम धर्म समझो।

कलियुग में व्यास ने दान को ही एकमात्र धर्म कहा है। और उसमें भी धर्मदान सबसे बढ़िया दान है। उससे नीचे विद्यादान है, इससे भी नीचे प्राणदान का नम्बर है और अन्नदान तो सबसे निकृष्ट दान है। हम अन्न दान बहुत कर चुके हैं। हमारे जैसी दानशील जाति संसार में नहीं है। इस देश में यदि भिखारी के पास भी मुट्ठी भर अन्न होगा तो वह उसमें से भी आधा दान कर देगा। यह दृश्य केवल भारतवर्ष में ही देखने को मिलेगा। हम यथेष्ट अन्नदान कर चुके। अब अन्य दो प्रकार के दानों को देने के लिये आगे बढ़ना है और वो दो दान हैं धर्म दान और विद्यादान।