एक सामान्य दृष्टिकोण की सहायता से केवल उन चीजों को ही देखा जा सकता है, जो मूर्त रूप में सामने हों, परंतु एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण न केवल अनुपस्थित वस्तुओं के बारे में कल्पना कर सकता है, बल्कि उन अमूर्त वस्तुओं अथवा कल्पनाओं को साकार रूप दे पाने में पूर्णतः समर्थ भी है। आज आधुनिक भारत का जो विकसित रूप हमारे गर्व का आधार है, उसे यह स्वरूप दे पाने का श्रेय विज्ञान और विज्ञानियों को ही जाता है। डॉ. चंद्रशेखर वेंकट रमन महान् भारतीय वैज्ञानिकों की श्रृंखला का एक अत्यंत सम्मानित नाम है।

श्री वेंकट रमन का जन्म 7 नवंबर, 1888 को दक्षिण भारत के कावेरी नदी के किनारे बसे तिरुचिरापल्ली नामक नगर के एक छोटे से गाँव थिरुवालैक्कावाल में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री चंद्रशेखर अय्यर और माता का नाम श्रीमती पार्वती अम्मल था। श्री चंद्रशेखर अय्यर हालाँकि उस छोटे से गाँव में रह रहे थे, परंतु उन्होंने अपने पूर्वजों के पारंपरिक व्यवसाय-खेतीबारी व जमींदारी-को न अपनाकर अध्यापक वत्ति अपनाई और एक स्थानीय विद्यालय में अध्यापक के रूप में अध्यापन कार्य आरंभ कर दिया। वे गणित और भौतिकी विषयों के विद्वान् थे और स्वभाव से अत्यंत गंभीर एवं शांत थे। प्रकृति व संगीत के प्रति उनका झुकाव आरंभ से ही बहुत अधिक था और वे स्वयं भी वायलिन एवं वीणा-वादन और संगीत का अच्छा ज्ञान रखते थे। श्रीमती पार्वती अम्मल उनके लिए एक श्रेष्ठ जीवनसंगिनी सिद्ध हुई थीं। वे अत्यंत धार्मिक स्वभाव की महिला थीं। उनके लिए उनका परिवार ही जीवन का केंद्रबिंदु था।

वेंकट रमन अपने माता-पिता की दूसरी संतान के रूप में जनमे थे। चूंकि भारत के कई स्थानों पर पिता अथवा स्थान का नाम अपने नाम के साथ लगाने का रिवाज है, अतः वेंकट रमन चंद्रशेखर वेंकट रमन के नाम से जाने गए।

बालक वेंकट रमन जब तीन वर्ष के ही थे, तभी उनके पिता की नियुक्ति विशाखापत्तनम के वॉल्टेयर हिंदू कॉलेज में गणित व भौतिकी के प्राध्यापक के रूप में हो गई। यह उन्नति उनकी योग्यता के अनुरूप ही थी। वेंकट रमन भी अपने पिता की ही तरह धीर-गंभीर स्वभाव के तथा प्रकृति व संगीत-प्रेमी थे। भौतिकी तथा गणित उनके प्रिय विषय थे। उनकी ये रुचियाँ कम आयु में ही प्रकट होने लगी थीं। इसके अतिरिक्त अपनी माँ श्रीमती पार्वती अम्मल से भी वे कम प्रभावित नहीं थे। उन्हीं के सौजन्य से उनमें संस्कृत साहित्य के प्रति रुझान और धार्मिक भावना का उदय हुआ। माता-पिता दोनों का ही सदैव यह प्रयास रहता कि उनकी संतान को ऐसा परिवेश मिले, जिसमें उसकी प्रतिभा अधिक-से-अधिक विकसित हो।

विद्यालय की प्रारंभिक शिक्षा के बाद बालक रमन को वॉल्टेयर कॉलेज में ही प्रवेश दिला दिया गया। चूंकि पिता श्री चंद्रशेखर भी इसी कॉलेज में थे, अतः उनकी शिक्षा-दीक्षा अपने पिता की देख-रेख में होने लगी। यहाँ उन्होंने अपने पिता की सलाह से पाठ्य-पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य ग्रंथों का भी खूब अध्ययन किया। वे जितना पढ़ते, और अधिक पढ़ने की ललक उनमें जागने लगती। इस प्रकार वे ज्ञान के असीम सागर में गहरे उतरते गए। उनकी बातचीत और व्यवहार पर भी इसका बहुत प्रभाव पड़ा था। जब वे बोलते तो लगता कि कोई नन्हा विद्वान् बोल रहा है। उनकी बुद्धि अत्यंत कुशाग्र, परंतु शरीर लट दुबला-पतला और कमजोर था। उनका स्वास्थ्य भी कोई बहुत अच्छा नहीं था। इस कारण बीच-बीच में उनकी पढ़ाई में बाधा आती रहती, परंतर कुशाग्र बुद्धि के आगे यह बड़ी क्षीण सिद्ध होती। मात्र ग्यारह वर्ष की उन्होंने दसवीं कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण की और तेरह वर्ष की आयु में वे सर्वो अंक प्राप्त करते हुए इंटरमीडिएट की परीक्षा में सफल रहे। उन्हें छात्रवत्ति भी प्रदान की गई। बालक सी.वी. रमन की इस सफलता से हर कोई आश्चर्य में पड़ गया था; क्योंकि वे भारत भर में यह परीक्षा इतनी कम आयु में उत्तीर्ण करनेवाले छात्र थे। उनके पिता श्री चंद्रशेखर को अपने पुत्र की इस सफलता पर प्रसन्नता और गर्व भले ही था, परंतु आश्चर्य जरा भी नहीं। उनका मानना था कि ज्ञान आयु-सीमा से परे होता है। आवश्यकता केवल उसके प्रति लगन और समर्पण की भावना की होती है।

आगे की पढ़ाई के लिए बालक रमन ने मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला ले लिया, क्योंकि वॉल्टेयर कॉलेज में भौतिक विज्ञान की आगे की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं थी। हालाँकि सभी की सलाह थी कि वे आगे की पढ़ाई के लिए इतिहास विषय लें, क्योंकि इससे उच्च सरकारी पद मिलने में आसानी होती; परंतु सी.वी. रमन के लिए अपने विज्ञान-प्रेम से उबर पाना संभव नहीं था।

प्रेसीडेंसी कॉलेज में उनका पहला दिन था। वे नियत समय पर अपनी कक्षा में बैठे और अपने प्राध्यापक के आने का इंतजार करने लगे। तेरह वर्षीय गंभीर स्वभाव के इस बालक को देखकर कक्षा के अन्य विद्यार्थी आपस में कानाफूसी करते हुए मुसकरा रहे थे, परंतु बालक रमन गंभीर भाव से आत्मविश्वासपूर्वक बैठे रहे।
कुछ ही देर में प्रोफेसर ई.एच. इलियट कमरे में आए। जैसे ही उनकी नजर बालक रमन पर पड़ी, उन्हें लगा कि यह बालक भूलवश इस कक्षा में आ बैठा है। उन्होंने पूछा, 'क्या तुम भूल से इस कक्षा में आ गए हो?'' ।

"जी नहीं, मैं इसी कक्षा का विद्यार्थी हूँ।'' बालक रमन ने विश्वासपूर्वक कहा।

यह सुनकर प्रो. इलियट सुखद आश्चर्य से भर उठे। शीघ्र ही उन्हें पता चल गया कि इस बालक के साधारण शरीर में असाधारण प्रतिभा छिपी हुई।

बालक रमन की उमड़ती जिज्ञासाओं को केवल अपनी पाठ्य-पुस्तकों के अध्ययन और निर्देशित प्रयोग भर करने से संतुष्टि नहीं मिल पाती। वे हर समय अधिक-से-अधिक जानना चाहते, नए-नए प्रयोग करना चाहते। कॉलेज के पाठ्यक्रम में हालाँकि इस बात की अनुमति नहीं थी, पर प्राचार्य नाना साहब बालक रमन की विद्वत्ता से बहुत प्रभावित थे। उन्हें लगा कि औपचारिक नियमों में बँधकर कहीं इस बालक की प्रतिभा कुंठित न होने लगे। अतः उन्होंने विशेष छूट देते हुए बालक रमन को इच्छानुसार प्रयोग करने की आज्ञा दे दी। उनकी इस अनुकंपा ने जैसे बालक रमन की कल्पनाओं को पंख लगा दिए। इस अवधि में उन्होंने कई ऐसे प्रयोग किए, जो आगे चलकर बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। सन् 1904 में रमन ने बी.एस-सी. की परीक्षा प्रथम श्रेणी, सर्वप्रथम स्थान और विशेष योग्यता सहित उत्तीर्ण की। इस अवसर पर उन्हें अनेक पारितोषिक के साथ-साथ भौतिक विज्ञान का 'अर्णी' स्वर्ण पदक भी प्रदान किया गया। अपने सुंदर अंग्रेजी निबंधों के लिए भी उन्होंने विशेष पुरस्कार प्राप्त किया।

भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. में प्रवेश लेने पर उनकी उच्चस्तरीय योग्यता के कारण कक्षा में नियमित उपस्थिति के प्रतिबंध से उन्हें मुक्त कर दिया गया। अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण वे कई बार ऐसी समस्याओं तक का हल ढूंढ़ निकालते, जिन्हें उनके प्राध्यापक भी नहीं कर पाते थे। ऐसे ही एक बार उनका एक सहपाठी ध्वनि संबंधी कुछ प्रयोग कर रहा था। उसमें उसे कुछ संदेहपूर्ण कटिनाइयाँ हुईं, जिनके समाधान के लिए वह अपने अध्यापक प्रो. जोन्स के पास गया। श्रीमान जोन्स भी उन समस्याओं के समाधान में असमर्थरहे। जब रमन को इस बारे में पता चला तो उन्होंने उस प्रश्न के बारे में जानने के लिए पहले उस समय के प्रसिद्ध विद्वान् लॉर्ड रैले के कुछ निबंध पढ़े। फिर उसके बाद अपने तौर पर अनुसंधान द्वारा उसे हल किया। उनके द्वारा खोजा गया हल पहले से भी कहीं अधिक सरल और उत्तम था। जब रैले को इस बात का पता चला तो उन्होंने तार द्वारा रमन को बधाई देते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। प्रो. जोन्स भी इस पर बेहद प्रसन्न हुए और उन्होंने रमन से इसपर एक लेख तैयार करने के लिए कहा। लेख तैयार हो जाने पर रमन ने उसे प्रो. जोन्स को उसपर अपने विचार प्रकट करने के लिए कहा। प्रो. जोन्स ने वह लेख उनसे लेकर अपने पास रख लिया। लेख उन्हें पढ़ने में बड़ा कठिन लग रहा था और वे उसे आत्मसात् नहीं कर पा रहे थे।

धीरे-धीरे काफी समय बीत गया। रमन जब भी उनसे इस बारे में कुछ पूछते तो वे बहाना बनाकर टाल जाते। इस प्रकार कई महीने बीत गए। एक दिन रमन उनके पास गए और बोले, “श्रीमान! मुझे लगता है कि उस लेख में अभी कुछ कमी है। मैं इसे फिर से पढ़कर कुछ संशोधन करना चाहता हूँ।''

प्रो. जोन्स ने तुरंत वह लेख रमन को लौटा दिया। रमन ने वह लेख लंदन की सुप्रसिद्ध पत्रिका' फिलॉसाफिकल मैगजीन' में प्रकाशनार्थ भेज दिया। वहाँ संपादक मंडल द्वारा न केवल उस लेख को भरपूर प्रशंसा मिली, बल्कि उसे प्रकाशनार्थ तुरंत स्वीकृत करके कंपोज हो जाने पर संशोधन हेतु रमन के पास वापस भेज दिया गया। जब प्रो. जोन्स को इस बारे में पता चला तो उन्हें बहुत बुरा लगा। उन्होंने रमन से कहा, “तुम्हें मेरी अनुमति के बिना यह लेख पत्रिका में नहीं भेजना चाहिए था।''

रमन ने विनम्रता से उत्तर दिया, “इसे सबसे पहले मैंने आपको ही दिखाया था। जब महीनों की प्रतीक्षा और बार-बार तकाजा करने पर भी आपने यह लेख मुझे नहीं लौटाया तो मैं समझ गया कि आप इससे पूर्णतः सहमत हैं। कुछ नया जोड़ने के लायक आपके पास कुछ नहीं है, ऐसा अनुमान होने पर ही मैंने इसे प्रकाशनार्थ भेजा था।''

यह लेख 'फिलॉसाफिकल मैगजीन' में सन् 1906 के नवंबर अंक में ‘अनसिमेट्रिकल डिफेक्शन बैंड्स यू टू रेक्टेगुलर एपरचर' नाम से प्रकाशित हुआ। इसके ठीक दूसरे ही वर्ष प्रकाश शास्त्र से संबंधित उनका एक लेख सुप्रसिद्ध पत्रिका 'नेचर' में छपा। उस समय रमन की आयु मात्र अठारह वर्ष थी। अपनी इसी अल्पावस्था में उन्होंने भौतिक विज्ञान पर कई ग्रंथ लिखे, जो उपयोगिता और प्रामाणिकता की दृष्टि से आज भी अत्यंत मूल्यवान् हैं।

सन् 1907 में उन्होंने एम.एस-सी. की परीक्षा अत्यंत गौरवपूर्ण ढंग से उत्तीर्ण की। न केवल विश्वविद्यालय में, अपितु देश भर में वे भौतिक शास्त्र के परीक्षार्थियों में सर्वाधिक अंक पानेवाले छात्र थे। वे विज्ञान के संबंध में और अधिक अध्ययन करना चाहते थे, जो कि उस समय विदेश में ही संभव था। रमन के सभी प्राध्यापक उनसे बहुत अधिक प्रभावित थे। उनकी अनुशंसा पर सरकार ने रमन को छात्रवृत्ति सहित इंग्लैंड भेजना स्वीकार कर लिया; किंतु शायद ईश्वर की इच्छा कुछ और ही थी। रमन का शरीर अत्यंत दुबलापतला था और स्वास्थ्य प्रायः खराब ही रहता था। इतने खराब स्वास्थ्य के कारण वे इंग्लैंड प्रवास के अयोग्य पाए गए। चिकित्सक के अनुसार, उनके इंग्लैंड की सर्दी में रहने का अर्थ जीवन को जोखिम में डालना था। फलतः वे इंग्लैंड नहीं गए, किंतु इस बात से वे जरा भी हताश नहीं हुए।

श्री रमन की विलक्षण प्रतिभा किसी उच्च पद के योग्य थी। उस समय किसी उच्च सरकारी पद हेतु प्रतियोगी परीक्षा में बैठना आवश्यक होता था। हालाँकि राजकीय उच्च सेवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षा केवल इंग्लैंड में ही आयोजित होती थी, परंतु वित्त विभाग हेतु पदों के लिए प्रतियोगी परीक्षा का आयोजन भारत में कलकत्ता में किया जाता था। यह एक कड़ी प्रतिस्पर्द्धा से । भरी परीक्षा थी और अब समय मुश्किल से एक महीना ही शेष था। विषय भी। पूर्णतः नए जैसे-साहित्य, इतिहास और राजनीति शास्त्र थे। श्री रमन को स्वयं पर पूर्ण विश्वास था। वे पूरी तत्परता से तैयारी में जुट गए। इस परीक्षा में भी उन्होंने अपने पूर्व स्तर को बनाए रखकर सर्वाधिक अंक प्राप्त किए। उनकी यह सफलता सिद्ध करती है कि यदि लगन सच्ची हो तो कोई कार्य असंभव नहीं होता।

| उन्नीस वर्ष की आयु में श्री रमन भारत सरकार द्वारा कलकत्ता में वित्त विभाग के डिप्टी डायरेक्टर ( अकाउंटेंट) जनरल नियुक्त किए गए। यदि सुविधाओं का ढेर ही सुख की परिभाषा होता तो कोई भी सुविधा-संपन्न व्यक्ति कभी कोई अभाव न अनुभव करता; परंतु श्री रमन के लिए उनका वास्तविक सुख उनकी संतुष्टि में छिपा हुआ था, जो कि उन्हें केवल विज्ञान की निकटता में ही मिलता था।

अब उन्होंने अपने घर पर ही एक छोटी सी प्रयोगशाला बना ली और जब भी समय मिलता, वे उसमें तरह-तरह के प्रयोग करते रहते। इतने भर से उनके मन को पूर्ण संतोष नहीं होता था, परंतु फिर भी वे शांत बने रहे।

6 मई, 1907 को श्री रमन का विवाह सुश्री लोकसुंदरी अम्मल के साथ हुआ। वे एक सुंदर सुशील कन्या थीं। पति के कार्यों में पूर्णतः सहयोग में ही वे अपना सौभाग्य समझतीं। हालाँकि सुश्री लोकसुंदरी बड़े परिवार से आई थीं, परंतु विवाह के बाद उन्हें ससुराल में अधिक समय तक रहने का अवसर नहीं मिल पाया था, क्योंकि कुछ ही समय बाद श्री रमन का स्थानांतरण हो गया और अपने पति के साथ वे भी कलकत्ता चली आई।

एक दिन कार्यालय से घर वापस आते हुए ट्रॉम में बैठे हुए ही श्री रमन की नजर बाहर एक भवन पर लगे साइनबोर्ड पर पड़ी-' भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद्, 210, बो बाजार स्ट्रीट'। वे बिजली जैसी गति से उठे और चलती ट्रॉम से बाहर कूद पड़े। वहाँ पहुँचकर उनकी भेंट श्री आशुतोष डे से हुई। श्री रमन ने उन्हें अपना परिचय देते हुए अंदर आने की अनुमति माँगी। अंदर आने पर उन्होंने देखा कि एक बड़ा सा हॉल था, जिसमें प्रयोगशाला संबंधी सामान रखा हुआ है। सारे स्थान और सामान पर धूल की एक मोटी परत चढ़ी हुई थी। लगता था जैसे लंबे समय से वहाँ कोई आया ही नहीं। श्री आशुतोष ने उन्हें संस्था के सचिव श्री अमृतलाल सरकार से मिलवाया। यह संस्थान उनके पिता श्री महेंद्रलाल सरकार की दूरदृष्टि का परिणाम था। उनका स्वप्न था कि वे ब्रिटिश एसोसिएशन तथा रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ लंदन की तर्ज पर भारत में एक वैज्ञानिक संस्थान खड़ा करें। अपने जीवनकाल में उन्होंने । इस दिशा में काफी काम किया था और कई महत्त्वपूर्ण लोगों को इस संस्थान से जोड़ने में सफल भी रहे; परंतु उनकी मृत्यु के बाद यह उपेक्षा का शिकार होता चला गया। और अब इसे प्रतीक्षा थी ऐसे हाथों की, जो इस धूल-धूसरित स्थान को इसका वास्तविक स्वरूप और गरिमा प्रदान कर सके।

अनजाने में ही रमन उस दरवाजे पर आ खड़े हुए थे, जिसे मानो उन्हीं की प्रतीक्षा थी और स्वयं डिप्टी डायरेक्टर( अकाउंटेंट) जनरल रमन के अंदर के वैज्ञानिक को भी ऐसी ही चुनौतीपूर्ण जगह की तलाश थी। जैसे ही उन्होंने अपनी मंशा श्री अमृतलाल के समक्ष प्रकट की, वे भाव-विभोर हो उठे। एक पल को तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि यह उच्च पदस्थ व्यक्ति इस जगह काम करना चाहता है। फिर उन्होंने जेब से एसोसिएशन की चाबियाँ निकालकर श्री रमन को सौंपते हुए सँधे गले से कहा, “मैं तुमसे कोई सवाल नहीं करूंगा। आज से यह संस्थान तुम्हारे हवाले।'' और स्वयं उठकर बाहर चले गए।

श्री आशुतोष की मदद से श्री रमन तुरंत काम में जुट गए। उन्होंने उस पूरे हॉल की सफाई करवाई और फिर प्रयोगशाला के यंत्रों को साफ कर उन्हें व्यवस्थित ढंग से लगवाया। इसके बाद वे घर लौटे। अब तक काफी रात बीत चुकी थी। उनका कमजोर शरीर थकान से चूर था, पर चेहरे से खुशी टपकी पड़ रही थी।

उनकी पत्नी लोकसंदरी अम्मल स्वयं चौदह वर्षीया बालिका थीं। वे भी सामान्य स्त्रियों की भाँति अधिक समय अथवा सामीप्य के लिए अपने पति से हठ कर सकती थीं, परंतु उनके मन में कभी ऐसा विचार नहीं आया। वे दिन भर घर में अकेली ही समय व्यतीत करतीं और अपने पति की सफलता के लिए कामना करती रहतीं। उनकी संस्कारगत परिपक्वता ने उन्हें बिना कहे ही अपने पति का जीवन-लक्ष्य समझा दिया था। वे भी अपने पति की प्रसन्नता से प्रसन्न हो उठींं अब श्री रमन सुबह कार्यालय जाते, वहाँ से फिर परिषद की प्रयोगशाला में जाकर देर रात तक तरह—तरह के प्रयोग करते रहते। शरीर से थककर चूर होने पर भी उन्हें उसका आभासा तक न होता, क्योकि मन में लगी लगन की उनकी स्फूर्ति बनी रहती।

श्री रमन ने धूल की परतें सिर्फ प्रयोगशाला ओर उसके उपकरणों पर से ही नहीं हटाई, बल्कि परषद् के नाम पर से भी हटाई। अपने कड़े परिश्रम से उन्होंने वहाँ कई महत्वपूर्ण शोधकार्य किए। अनेक विषयों पर उनके महत्वपूर्ण लेख देशाी—विदेशाी पत्रिकाओं मं प्रका​शित होने लगे, जिससे उनके साथ—साथ परिषद् की ​कीर्ति भी सव्रत्र फैलने लगी ओर नवीन प्रतिभाएँ परिषद् की ओर आकर्षित होने लगीं।

उस समय भारत और बमा्र (अब म्याँमार) पर एक ही सरकार का शासन था। सरकार ने अचानक ही श्री रमन का तबादला कलकत्ता से रंगून कर दिया। अनिच्छा होते हुए भी उन्होंने अपने पद के दायित्व से मुँह नहीं मोड़ा। सन् 1909 में वे भारत से रंगून चले गए। रंगून पहुँचने के कुछ माह बाद ही सन् 1910 में रमन के पिता का देहांत हो गया। अपने पिता, प्रथम गुरू और जीवन आदर्श का इस तरह जगत् विसर्जन उन्हें भीतर तक झकझोर गया। वे छह माह का अवकाश लेकर मद्रास वापस लौट आए। यहाँ कुछ समय पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने के बाद वे मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज की प्रयोगशाला में लीन हो गए। अवकाशा की अवधि समाप्त होने तक उनका फिर से स्थानांतरण हो गया। इस बार उन्हें नागपुर भेजा गया। वहाँ भी उन्होंने अपने कर्तव्यपालन के साथ—साथ अपेन विज्ञान—प्रेम के बीच अद्भूत सामंजस्य बनाए रखा। यहाँ उन्होंने अपने घर में प्रयोगशाला बनाकर अपेन प्रयोग जारी रखे, बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि प्रयोगशाला को ही अपना घर बना लिया। श्री रमन अपने ही काम में तल्लीन रहते परंतु कुछ लोगो का उनकी बढ़ती कीर्ति सहन नही हो पा रही थी। उन्होंने रमन के विरूद्ध दुष्प्रचार करना आरंभ कर दिया। रमन इस सबसे मन—ही—मन आहत तो बहुत हुए, पर बाहर से मौन ही बने रहे। उनके कार्य की समीक्षा हेतु जाँच आरंभ हुई। परिणाम सामने था। अपने अब तक के कार्यकाल में न केवल उनका व्यवहार गरिमापर्ण और अनकरणीय था, बल्कि उन्होंने अनेक अवसरों पर सरकार को लाभ पहुँचाया था। उनके विरोधियों को मुंह की खानी पड़ी और उन्हें पदोन्नत कर अकाउंटेंट जनरल बना दिया गया।

 कुछ समय बाद उनका स्थानांतरण फिर से कलकत्ता कर दिया गया। यहाँ लौटते ही उन्होंने फिर से 'भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद्' की प्रयोगशाला में काम करना आरंभ कर दिया; परंतु फिर भी वे असंतुष्ट थे, क्योंकि वे प्रयोगशाला को इच्छानुसार अधिक समय नहीं दे पाते थे। ऐसे ही समय उन्हें सर आशुतोष मुखर्जी, जो कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में उपकुलपति थे, की ओर से विज्ञान विश्वविद्यालय में भौतिक शास्त्र के आचार्य पद का प्रस्ताव मिला। सर आशुतोष बंगाल के सप्रसिद्ध विद्वान थे। विज्ञान विश्वविद्यालय की स्थापना उन्होंने सर तारकनाथ मुखर्जी की आर्थिक सहायता तथा डॉ. रासबिहारी घोष के सहयोग से सन् 1914 में की थी। यह एक प्रतिष्ठित किंतु छोटा संस्थान था। यहाँ श्री रमन को उतना ज्यादा वेतन और वे तमाम सुख-सुविधाएँ नहीं मिल पातीं, जो उन्हें उनके वर्तमान पद पर प्राप्त थीं, परंतु बड़े-से-बड़ा आकर्षण भी विज्ञान के प्रति उनके प्रेम को कम नहीं कर पाया। उन्होंने सहर्ष यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। केवल अपनी योग्यता के बूते पर इस पद पर पहुँचनेवाले वे पहले भारतीय थे; क्योंकि इस पद हेतु विदेश में शिक्षित होना एक आवश्यक शर्त थी। श्री रमन केवल एक कर्मठ व्यक्ति और महान् वैज्ञानिक ही नहीं थे, बल्कि एक सच्चे देशभक्त भी थे। किसी भारतीय की प्रतिभा को मनवाने के लिए वे विदेशी शिक्षा के प्रमाणपत्र की आवश्यकता को नकारते थे। उन्होंने इसे अपने कार्य द्वारा सिद्ध कर दिखाया।

अब उन पर दोहरा दायित्व था-विश्वविद्यालय तथा परिषद् की प्रयोगशाला के कार्य का, परंतु उन्होंने दोनों ही पदों के साथ पूर्ण न्याय किया।

सन् 1919 में श्री अमृतलाल सरकार के निधन के बाद वे भारतीय वैज्ञानिक अनसंधान परिषद् के मानद सचिव मनोनीत हुए। अब उनकी जिये चले से बहुत अधिक बढ़ गई थीं। उन्होंने दोनों ही प्रयोगशालाओं में निरंतर नए-नए प्रयोग करवाना जारी रखा, जिसके सुखद परिणाम सामने आने लगे। जहाँ एक ओर परिषद् की कीर्ति अत्यंत सक्रिय केंद्र के रूप में फैलती जा रही थी, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में छात्र विश्वविद्यालय की ओर आकष्ट होने लगे। डॉ. रमन की कीर्ति देश-विदेश में फैल चुकी थी। उनके शिष्य बड़े-बड़े पदों को सुशोभित कर रहे थे। यह वह समय था, जब डॉ. रमण आकंठ विज्ञानसेवा में जुटे हुए थे।

उन्होंने कई विषयों में शोध कार्य किया था, परंतु मुख्य रूप से उनके शोध के विषय ध्वनि एवं प्रकाश' थे।' ध्वनि' पर और भारतीय वाद्य-यंत्रों की ध्वनि व उनकी स्थितियों पर वे पहले ही काफी महत्त्वपूर्ण कार्य कर चुके थे। उनके कार्य को देश-विदेश में महत्ता एवं सराहना भी मिल चुकी थी।

सन् 1921 में ब्रिटिश साम्राज्य के विश्वविद्यालयों के सम्मेलन में कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें लंदन जाने का अवसर मिला। यह उनकी पहली विदेश यात्रा थी। वहाँ उनके भाषणों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग आए थे। उनके नवीनतम प्रयोगों द्वारा अर्जित ज्ञान, मौलिक विचार तथा शैली का सभी पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा और उनके नाम की धूम मच गई। यहीं उनकी भेंट कई बड़े विदेशी वैज्ञानिकोंश्री जे.जे. थॉमस, अर्नेस्ट रदरफोर्ड आदि से हुई। उन्होंने सेंट पॉल्जक थीइरल की दीर्घा को भी देखा। ध्वनि परावर्तन के कारण वह ‘फुसफुसाती दीर्घा' के नाम से जानी जाती थी। यह दीर्घा वैज्ञानिक रैले की वही खोज थी, जिससे वे महान् वैज्ञानिकों की श्रेणी में खड़े हुए थे। डॉ. रमन ने श्री रेले की इस दीर्घा संबंधी कई टिप्पणियों को चुनौती के रूप में लिया और उनके संशोधित रूप प्रस्तुत किए। स्वदेश वापसी पर वे ऐसी तीन दीर्घाएँ भारत में खोजने में सफल रहे, जिनमें यही ध्वनि-परावर्तन का सिद्धांत लागू होता था।

डॉ. रमन की यह यात्रा समुद्री जहाज द्वारा हुई थी। अपनी इस यात्रा केदौरान वे जहाज के डेक पर बैठकर घंटों समुद्र की सुंदरता को निहारते रहते। इस संदरता ने उन्हें मोह लिया था। वे समुद्र के गहरे नीले विस्तार को मंत्रमुग्ध हो देखते रहते। अचानक उनके अंदर का वैज्ञानिक इस ओर आकृष्ट हो उठा कि क्या यह नीला रंग केवल आकाश का प्रतिबिंब मात्र है? तब क्या प्रकाश की अनुपस्थिति में ऐसा नहीं हो पाता होगा? ऐसे अनेक प्रश्नों ने उन्हें इस खोज के लिए प्रेरित किया।

गहन शोध के बाद उन्होंने इस विषय पर समुद्र के नीले रंग को जल का मौलिक रंग सिद्ध करते हुए दो लेख लिखे थे, जिनमें से एक का शीर्षक था‘समुद्र का नीलापन'। इस लेख में उन्होंने समुद्र की नीलिमा उजागर करने के साथ-साथ विवर्तन ग्रेटिंग का प्रयोग करते हुए यह भी सिद्ध किया कि नीले आकाश और नीले समुद्र की उच्चतम वर्णक्रमी तीव्रता भिन्न थी। यहीं वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आइंस्टीन और स्मोचवॉस्की का घनत्व में स्थानीय विचलन का सिद्धांत न केवल द्रवों में, बल्कि ठोस पदार्थों में भी प्रकाश प्रकीर्णन के तथ्य की भी व्याख्या करेगा। समुद्र के रंग संबंधी उनके कार्यों ने इस संबंध में सत्य को एक नई दिशा दी थी, क्योंकि उससे पहले के उपलब्ध तथ्य भ्रमपूर्ण थे। प्रो. रमन ने सैकड़ों ऐसे प्रयोग किए थे, जिनका लाभ दूरगामी था, परंतु 'रमन प्रभाव' उनका सबसे बड़ा आविष्कार माना जाता है। इसमें उन्होंने सिद्ध किया कि जब अणु प्रकाश को बिखेरते हैं तो उस समय मूल प्रकाश में परिवर्तन हो जाता है। नवीन किरणों की उपस्थिति से हम यह परिवर्तन देख सकते हैं। प्रक्षिप्त प्रकाश में जो किरणें दीख पड़ीं, वे ही 'रमन प्रभाव अथवा 'रमन किरणें' कहलाई।

8 मार्च, 1928 को विज्ञान की प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'नेचर' में ‘रमन प्रभाव' का आविष्कार संबंधी लेख प्रकाशित हुआ। पूरी दुनिया में इस महान् आविष्कार और डॉ. रमन की चर्चा होने लगी। परंतु उन्होंने केवल इतना भर कहा, '' भारत में न जाने कितने रमन हैं। यह आविष्कार भले ही महान् हो, परंतु मैं एक बड़ा ही साधारण सा व्यक्ति हूँ। मेरी इच्छा केवल इतनी ही है कि अपने देश की छिपी प्रतिभाओं को सामने लाऊँ। मेरे देश की सभी कमियाँ विज्ञान की सहायता से पूरी हो सकें।''

अपनी इसी खोज के लिए डॉ. रमन को सन् 1930 का विज्ञान का ‘नोबेल पुरस्कार' प्रदान किया गया। वे पहले एशियाई थे, जिन्होंने विज्ञान हेतु यह पुरस्कार प्राप्त किया था। जिस समय वे नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के लिए गए, वहाँ पुरस्कार प्रदान करते हुए उन्हें जिस विशेष आसन पर बिठाया गया, उसके ऊपर ब्रिटिश राज्य का ध्वज यूनियन जैक' लहरा रहा था। वे यह सोचकर फूट-फूटकर रो पड़े कि जिस देश की प्रतिभा को यह सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया जा रहा है, वहाँ उस देश का अपना ध्वज तक नहीं है, क्योंकि वह परतंत्र है। उन्होंने अपने भाषण में अपने इन विचारों को बड़े मर्मस्पर्शी ढंग से प्रकट भी किया। वहाँ उपस्थित लोग उनकी देशभक्ति की इस भावना से अभिभूत हुए बिना न रह सके।

नोबेल पुरस्कार के साथ-साथ उन पर देश-विदेश से अनेक पुरस्कारों व उपाधियों की बौछार हो रही थी; परंतु उनमें इन सबसे जरा भी अहंकार नहीं आया। स्वदेश वापसी के बाद से उनका सारा ध्यान भारत में विज्ञान के प्रति रुचि जगाने तथा वैज्ञानिक प्रतिभाओं की खोज में लग गया। वे मानते थे कि एक व्यक्ति के महान् बन जाने से कोई देश महान् नहीं बन जाता और फिर उनका देश तो अभी गुलाम है। विज्ञान ही उन्हें वह माध्यम लगा, जो उनके देश की अनेक समस्याओं को हल कर सकता था।

सन् 1933 में डॉ. रमन को 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस' का निदेशक बनाकर बंगलौर भेज दिया गया। उनके कुशल नेतृत्व में यह संस्थान शीघ्र ही सफलता की नई ऊँचाइयों को छूने लगा। इस पद पर उन्होंने कई वर्षों तक कार्य किया। बाद में सन् 1948 में 'रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट, बंगलौर' की स्थापना होने पर वे उसके निदेशक बने।

डॉ. रमन ने भारत में अनेक अनुसंधानशालाओं, विश्वविद्यालयों एवं वैज्ञानिक संस्थाओं की नींव डाली और अनेक प्रतिभाओं को सामने लाए।