सोवियत संघ के विघटन के लिए अनेक कारक उत्तरदायी थे, जिनमें से निम्नलिखित पर थे -

(1) राजनीतिक-आर्थिक संस्थाओं की अंदरूनी कमजोरी : सोवियत संघ की राजनीतिक-आर्थिक संस्थाएँ अंदरूनी कमजोरी के कारण लोगों की आकांक्षाओं को पूरी नहीं कर सकीं। यही सोवियत संघ के पतन का कारण रहा। कई सालों तक अर्थव्यवस्था गतिरुद्ध रही। इससे उपभोक्ता वस्तुओं की बड़ी कमी हो गयी और सोवियत संघ की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी राजव्यवस्था को शक की नजर से देखने लगा। उस पर उसने खुले आम सवाल खड़े करने शुरू किये।।

(2) संसाधनों का अधिकांश भाग परमाणु हथियार और सैन्य साजो-सामान पर लगाना : सोवियत संघ ने अपने संसाधनों का अधिकांश भाग परमाणु हथियारों और सैन्य साजो-समान पर लगाया। उसने अपने संसाधून पूर्वी यूरोप के पिछलग्गू देशों के विकास पर भी खर्च किये ताकि वे सोवियत नियंत्रण में बने रहे। इससे सोवियत संघ पर गहरा आर्थिक दबाव बना और सोवियत व्यवस्था इसका सामना नहीं कर सकी। | (3) पश्चिमी देशों की तरक्की के बारे में आम नागरिकों की जानकारी बढ़ना : पश्चिमी देशों की तरक्की के बारे में सोवियत संघ के आम नागरिकों की जानकारी बढी। वे अपनी राजव्यवस्था और पश्चिमी देशों की राजव्यवस्था के बीच मौजूद अंतर भाँप सकते थे। सालों से इन लोगों को बताया जा रहा था कि सोवियत राजव्यवस्था पश्चिम के पूँजीवाद से बेहतर है, लेकिन सच्चाई थी कि सोवियत संघ पिछड़ चुका था। अपने पिछड़ेपन से लोगों को राजनीतिक-मनोवैज्ञानिक रूप से धक्का लगा।

(4) प्रशासनिक और राजनीतिक गतिरुद्धता : सोवियत संघ प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से गतिरुद्ध हो चुका था। कम्युनिस्ट पार्टी ने यहाँ 70 सालों तक शासन किया और यह पार्टी अब जनता के प्रति जबावदेह नहीं रह गयी थी। सुस्त प्रशासन, भारी भ्रष्टाचार और देश की विशालता के बावजूद सत्ता का केन्द्रीकृत होना - इन सारी बातों के कारण आम जनता अलग-थलग पड़ गयी।

(5) मिखाइल गोर्बाचेव के सुधार : मिखाइल गोर्बाचेव ने सुधारों के द्वारा समस्याओं के समाधान का वायदा किया। गोर्बाचेव ने अर्थव्यवस्था को सुधारने, पश्चिम की बराबरी पर लाने और प्रशासनिक ढाँचे में ढील देने का वायदा किया। गोर्बाचेव ने इन सुधारों को लागू भी किया। इससे लोगों की आकांक्षाएँ और अपेक्षाएँ बढ़ गयीं।

(6) राष्ट्रवादी भावनाओं और संप्रभुता की इच्छा का उभार : रूस और बाल्टिक गणराज्य (एस्टोनिया, लताविया और लिथुआनिया), उक्रेन और जार्जिया जैसे सोवियत संघ के गणराज्य इस उभार में शामिल थे। राष्ट्रीयता और संप्रभुता के भावी उभार सोवियत संघ के विघटन का अंतिम और सर्वाधिक तात्कालिक कारण सिद्ध हुआ।