(1) सिक्किम को भारत की शरणागति प्राप्त थी (Sikkim was a Protec, of India): आजादी के समय सिक्किम को भारत की शरणागति प्राप्त थी। इसका मतलब यह है कि तब सिक्किम भारत का अंग तो नहीं था, लेकिन वह पूरी तरह संप्रभु राष्ट्र भी नहीं था। सिक्किम की रक्षा और विदेशी मामलों का जिम्मा भारत सरकार का था जबकि सिक्किम के आंतरिक प्रशासन की बागडोर यहाँ के राजा चोग्याल के हाथों में थी। यह व्यवस्था कारगर साबित नहीं हो पायी क्योंकि सिक्किम के राजा स्थानीय जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को सँभाल नहीं सके।

(2) नेपाली जनता में अल्पसंख्यक लेपचा-भूटिया के शासन का भय : सिक्किम की आबादी में एक बड़ा हिस्सा नेपालियों का था। नेपाली मूल की जनता के मन में यह भाव घर कर गया कि चोग्याल अल्पसंख्यक लेपचा- भूटिया के एक छोटे-से अभिजन तबके का शासन उन पर लाद रहा है। चोग्याल विरोधी दोनों समुदाय के नेताओं ने भारत सरकार से मदद माँगी और भारत सरकार का समर्थन हासिल किया।




(3) सिक्किम में विधान सभा चुनाव और कांग्रेस की जीत : सिक्किम विधान सभा के लिए पहला लोकतांत्रिक चुनाव सन् 1974 ई. में हुआ और इसमें सिक्किम कांग्रेस को भारी विजय मिली। यह पार्टी सिक्किम को भारत के साथ जोड़ने के पक्ष में थी।

(4) सिक्किम को भारत में जोड़ने के लिए जनमत संग्रह : सिक्किम विधान सभा ने पहले भारत के सह-प्रांत बनने की कोशिश की और इसके बाद सन् 1975 ई. के अप्रैल में एक प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में शारत के साथ सिक्किम के पूर्ण विलय की बात कही गयी थी। इस प्रस्ताव के तुरंत बाद सिक्किम में जनमत-संग्रह कराया गया। जनमत संग्रह भारत के पक्ष में गया। भारत सरकार ने सिक्किम विधान सभा के अनुरोध को मानकर सिक्किम को 22 वाँ राज्य घोषित किया और सिक्किम का विलय भारत में हो गया।।