संसार में आज जो भी ज्ञान-विज्ञान की उन्नति और विकास है, उसका कारण है परिश्रम- मनुष्य परिश्रम के सहारे ही जंगली अवस्था से वर्तमान विकसित अवस्था तक पहुँचा है। उसने श्रम से खेती की। अन्न उपजाया। वस्त्र बनाए। घर, मकान, भवन, बाँध, पुल, सड़कें बनाईं। पहाड़ों की छाती चीरकर सड़कें बनाने, समुद्र के भीतर सुरंगें खोदने, धरती के गर्भ से खनिज-तेल निकालने, आकाश की ऊँचाइयों में उड़ने में मनुष्य ने बहुत परिश्रम किया है।

परिश्रम करने में बुद्धि और विवेक आवश्यक- परिश्रम केवल शरीर की क्रियाओं का ही नाम नहीं है। मन तथा बुद्धि से किया गया परिश्रम भी परिश्रम कहलाता है। एक निर्देशक, लेखक, विचारक, वैज्ञानिक केवल विचारों, सलाहों और युक्तियों को खोजकर नवीन आविष्कार करता है। उसका यह बौद्धिक श्रम भी परिश्रम कहलाता है।

परिश्रम से मिलने वाले लाभ- परिश्रम का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता मिलती है। दूसरे, परिश्रम करने वाला मनुष्य सदा सुखी रहता है। उसे मन-ही-मन प्रसन्नता रहती है कि उसने जो भी भोगा, उसके बदले उसने कुछ कर्म भी किया। महात्मा गाँधी का यह विश्वास था कि “जो अपने हिस्से का काम किए बिना ही भोजन पाते हैं, वे चोर हैं।”
परिश्रमी व्यक्ति का जीवन स्वाभिमान से पूर्ण होता है, जबकि ऐय्याश दूसरों पर निर्भर तथा परजीवी होता है। परिश्रमी स्वयं अपने भाग्य का निर्माता होता है। उसमें आत्मविश्वास होता है जबकि विलासी जन सदा भाग्य के भरोसे जीते हैं तथा दूसरों का मुँह ताकते हैं।

उपसंहार- वेदवाणी में कहा गया है- “बैठने वाले का भाग्य भी बैठ जाता है और खड़े होने वाले का भाग्य भी खड़ा हो जाता है। इसी प्रकार सोने वाले का भाग्य भी सो जाता है और पुरुषार्थी का भाग्य भी गतिशील हो जाता है। चले चलो, चले चलो।” इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने सोई हुई भारतीय जनता को कहा था-‘उठो, जागो और लक्ष्य-प्राप्ति तक मत रुको ।' श्रम ही मनुष्य के हाथ में है, परिणाम नहीं। अतः श्रम अवश्य करो। इसी से मनुष्य को आत्मसंतोष प्राप्त हो सकता है।