भारतीय मज़दूर का चित्र-
दुख, दरिद्रता, भूख, अभाव, कष्ट, मज़बूरी, शोषण और अथक परिश्रम-इन सबको मिला दें तो भारतीय मज़दूर की तस्वीर उभर आती है।

भारतीय मज़दूर की मज़बूरी-
कोई प्राणी खुश होकर मज़दूर नहीं बनता। भारतीय मज़दूर तो और भी विवश है। उनका इतना अधिक शोषण होता है कि वे मुश्किल से दो वक्त का भोजन कर पाते हैं। भारत में जनसंख्या इतनी अधिक है कि ढेर सारे मज़दूर खाली रह जाते हैं। परिणामस्वरूप मज़दूरी सस्ती हो जाती है। अब सरकार मज़दूरों के हितों का ध्यान रखते हुए उनका न्यूनतम वेतन तय कर देती है। इससे उन्हें काफी राहत मिलती है।

घोर परिश्रमी-
भारतीय मज़दूर का जीवन घोर परिश्रम की कहानी है। वह मुँह-अँधेरे जागता है तथा दिन-भर हाड़-तोड़ परिश्रम करता है। प्रातः 8 से सायं 5 बजे तक अथक शारीरिक परिश्रम करने से उनका तन चूर-चूर हो जाता है। उसके पास इतनी ताकत कठिनता से बचती है कि वह आराम की जिंदगी जी सके।

अज्ञान और अशिक्षा-
अधिकांश मज़दूरों के बच्चे अज्ञान और अशिक्षा में पलते हैं। मज़दूर स्वयं पढ़े-लिखे नहीं होते। न ही उनके पास पढ़ाई के लिए धन और अवसर होता है। इस कारण वे अज्ञान, अशिक्षा और अंधविश्वास में जीते हैं। अज्ञान के ही कारण वे पढ़े-लिखों की दुनिया में ठगे जाते हैं। डॉक्टर उन्हें अधिक मूर्ख बनाते हैं। दुकानदार भी उनसे अधिक पैसे वसलते हैं। बस या गाड़ी कहीं भी हों उन्हें सम्मानपूर्वक बैठने भी नहीं दिया जाता।

प्रसन्नता के क्षण-
मज़दूरों की सूखी जिंदगी में सुख के हरे-भरे क्षण तब दिखाई पड़ते हैं, जब वे रात्रि में ढोलक की ताल पर कहीं नाचते-झूमते नज़र आते हैं या अपने देवता के चरणों में गान करते दिखाई देते हैं।

उत्थान के उपाय-
मज़दूरों की दशा में सुधार लाने के लिए अनेक मज़दूर-संगठन कार्य कर रहे हैं। उनके कारण मज़दूरों में नई चेतना भी आई है। अभी इस क्षेत्र में और भी सुधार होने आवश्यक हैं। इसके लिए मज़दूरों को संघर्ष करना पड़ेगा।