मनुष्य मूलतः प्रकृति का बालक है। उसकी सारी आवश्यकताएँ ही नहीं, जीवन प्रकृति पर निर्भर है। मनुष्य के पास जो कुछ है, वह प्रकृति का ही दिया हुआ है। वृक्ष प्रकृति द्वारा धरती को दिया गया। सबसे सुन्दर उपहार है। वृक्ष है तो जीवन है। जिन ग्रहों में वृक्ष नहीं वहाँ जीवन कहाँ है?

वन बाढ़ को रोकने में सहायक होते हैं। कृषि के लिए जल ही मुख्य साधन है। पानी का सबसे बड़ा-स्रोत वर्षा है। जल के अन्य स्रोत, तालाब, कुएँ आदि गौण हैं। वन वर्षा को आकर्षित करते हैं। मृदाक्षरण को रोकने में भी वन सहायक हैं।

भारतवर्ष वृक्षों को पहले से महत्त्व देता रहा है। हमारे यहाँ यह कहा गया है कि दस पुत्र एक वक्ष के समान होते हैं। इतना ही नहीं पेड़ों को दूध भरी माता के रूप में देखा गया। गाँवों के अधिकांश नाम वृक्षों पर आधारित होते हैं। आम, पीपल, बेल, नीम, वट, आँवले का तो धार्मिक महत्त्व है। आज भी मनुष्य वृक्षों को पूजता है।

सीमा से अधिक प्राकृतिक साधनों के दोहन के कारण भी पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न हुआ है। वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण ऋतु चक्र प्रभावित हुआ है। इसी के चलते बारबार अनावृष्टि का सामना करना पड़ रहा है। विनाशकारी बाढों का एक प्रमुख कारण वनों का उजडते जाना है। वना का कटाई के चलते वन्य प्राणियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ गया है। वनों की बर्बादी के कारण कई प्रकारके पक्षियों, पशुओं और वनस्पतियों की प्रजातियाँ शनैःशनैः लुप्त होती जा रही हैं। इन में से तो कई प्रजातियों का अस्तित्व तो पूर्णतः विलुप्त हो चुका है। यह कोई शुभ लक्षण नहीं है।


वन संसाधनों का मनुष्य ने लोभवश सर्वाधिक दोहन किया, किन्तु उसने वृक्षारोपण पर कभी ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि वन-विनाश के भयानक कुपरिणाम भुगतने के लिए आज का विश्व-मानव अभिशप्त है। इस अभिशाप से मुक्ति का एकमात्र उपाय वनों का विकास ही है।



वृक्षारोपण द्वारा धरती को हरा-भरा बना देने में ही विश्व का कल्याण है। इसी कारण अब गाँव-गाँव तक वृक्ष बचाओ, वृक्ष लगाओ का अभियान तेजी से चल रहा है। ठीक ही कहा गया है कि ‘देश की है यही पुकार, बच्चे दो और वृक्ष हजार’ इसी नारा का कार्यान्वयन विश्व की रक्षा कर पायेगा।