यह निर्विवाद सत्य है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। शरीर के विकारग्रस्त होते ही मन में विकृति समाने लगती है। वह व्याधिग्रस्त हो जाता है।

स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन में अन्योयाश्रय सम्बन्ध है। ये दोनों मानव व्यक्तित्त्व के अभिन्न अंग है। इनमें से एक के भी रूग्ण या असंतुलित हो जाने का बुरा परिणाम मनुष्य को भुगतना पड़ता है। शरीर और मन के विकारग्रस्त होने की स्थिति में व्यक्तित्त्व का सहज विकास अवरूद्ध हो जाता है। किसी भी चीज में मनुष्य मन नहीं लगा पाता है। चित्त एकाग्र नहीं हो पाता है। पढ़ना-लिखना बाधित होता है। शक्ति घटती है। स्कूर्ति जाती रहती है।
कार्योत्साह मंद हो जाता है। व्यक्ति शैथिलस, आलस्य, अनुत्साह आदि का शिकार हो जाता है।

भारतवर्ष में सबल और स्वस्थ शरीर को कितना अधिक महत्त्व दिया गया था, इसका पता इस बात से चलता है कि निरोग रहने के लिए एक अलग वेद- ’आयुर्वेद’- की रचना यहाँ हुई। गुरूकुलों में छात्रो और अन्तेवासियों को स्वस्थ रहने के गुर सिखाये जाते थे। यही कारण है कि गुरूकुल के छात्र और अन्तेवासी शरीर से हष्ट-पुष्ट बलवान, स्फूर्तियुक्त, उत्साह से भरे, तेजस्वी और तीक्ष्ण विद्या एवं बुद्धि वाले होते थे।

स्वास्थ्य के सामने किसी भी भौतिक संपदा का कोई मूलय नहीं है। वह धन किस काम का, जिससे आदमी भूख भर खा भी नहीं सके। अनियमित आहार, असंयमित जीवनचर्या द्वारा हम अपने स्वास्थ्य को स्वंय नष्ट कर लेते है। यदि हम इनके प्रति सजग रहे तो हमारा मन और तन स्वस्थ रहेगा। एक उक्ति प्रसिद्ध है- सेहत हजार नेयामत। अच्छा स्वास्थ स्वर्गीय वरदान है। ’प्रथम सुख निरोगी काया’- यह कथन अक्षरथः सत्य है।

स्वस्थ मनुष्य सदैव प्रफुल्लित चित रहता है। उसकी आन्तरिक प्रसन्नता चेहरे से ही प्रकट होती है। अस्वस्थ व्यक्ति का चित्त हमेंशा खिन्न, उद्विग्न, अशान्त और उदास बना रहता है। उसकी बुद्धि, कुशाग्रता, मति और मेधा क्षीण हो जाती है।

सभी प्रकार के कर्मों का साधन शरीर ही है। यदि शरीर ही स्वस्थ नहीं है। तो अपने कर्मो का भली-भाँति निर्वाह किस प्रकार कर पायेंगे हम? शरीर ही धर्म, आर्थ, काम और मोक्षादि जीवन लक्ष्यों की प्राप्ति का साधन है। अतः शरीर को स्वस्थ्य रखना हमारा प्रथम कत्र्तव्य होना चाहिए।