sindhu ghaatee sabhyata




सिन्धु घाटी सभ्यता का आविर्भाव भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग से हुआ। सी-14 पद्धति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता की तिथि 2500 ई॰ पूर्व माना गया है जो कि 2200 ई॰ पूर्व के मध्य अपने परिपक्व अवस्था में थीं। चाल्र्स मैसन ने 1826 ई॰ में हड़प्पा टीले का सर्वप्रथम उल्लेख किया था। सन् 1921 में जाॅन मार्शल के निर्देशन में दयाराम साहनी ने हड़प्पा का अन्वेषण किया। चूँकि इसके अधिकांश स्थल सिन्धु घाटी पर थे अतः इसे सिन्धु सभ्यता का नाम दिया गया।
 सैधव सभ्यमा की क्षेत्राकृति त्रिभुजाकार है तथा क्षेत्रफल 12,99,600 वर्ग किमी है। इसकी उत्तरी सीमा माण्डा, दक्षिणी सीमा दैमाबाद, पशिचमी सीमा सुतकागेडोर तथा पूर्वी सीमा आलमगीरपुर है।


समाज 


सैधव समाज के कृषक, शिल्पकार, मजदूर, वर्ग आदि सामान्य जन थे एवं पुरोहित अधिकारी व्यापारी व चिकिथ्सक विशिष्ट जन थे। सबसे प्रभावशाली वणिकों का वर्ग थां सैधव समाज मातृ प्रधान था। विशिष्ट जन विशाल भवनों मेे रहते थे एवं सामान्य जन एक या दों कमरों के मकानों में सामान्यतः लोग ूती वस्त्र का उपयोग करते थे। पुररूप् एवं स्त्री प्रचुर मात्रा में आभूषण का प्रयोग करते थे। हड़प्पा नगर के दुर्ग के बाहर मिले सार्वजनिक अन्नागार के पास मिले निम्न स्तरीय आवासें से प्रतीत होता हे कि उसमें दसा या बन्धुआ मजदूर रहा करते होगे। सैंधव निवासियों का सामाजिक जीवन सुखी तथा सुविधापूण्र था एंव सामाजिक व्यवस्ािा का आधार परिवार था। सैधव निवासी माँसाहारी एवं शाकाहारी दोनों थे। सैधव निवासी आमोद-प्रमोद पेमी थे। मिट्टी के अतिरिक्त सोने, चाँदी एवं ताँबे से निर्मित बर्तनो का प्रयोग होता था।


व्यापार-वाणिज्य


कृषि तथा प्शुपालन के साथ-साथ उद्योग एवं व्यापार भी अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार थे। वस्त्र निमाण इस काल का प्रमुख उ़द्योग था। विश्व में सर्वप्रथम यही के निवासियों ने कपास की खेती प्रारम्भ की थी। इसीलिए यूनानियों ने इस क्षेत्र को सिंडोन नाम दिया। यही सिंडोन बाद में सिन्धु नाम से जाना जाने लगा। व्यापार मुख्यतः विनिमय पद्धति से किया जाता था एवं तौल की इकाई से 16 के अनुपात में थी। मुख्य व्यापारिक नगर अथवा बन्दरगाह थे- भगतराव, मुण्डीगाक, बालाकोट, सुत्कागेंडोर, सोत्काकोह मालवण, प्रभासपाटन तथा डाबरकोटा सिन्धु क्षेत्र का मेसोपोटामिया से व्यापार के साक्ष्य मिले है। मेसोपोटामिया से आयातित वस्तुएँ थी- ऊन खुशबूदार ते, कपड़े आदि। सैंधव सभ्यता से निर्यात की वस्तुएँ- ताँबा, मोर, हाथी, के दाँत की वस्तुएँ, कंघा सूती वस्त्र। मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा से प्राप्त बेलनकार फारम की मुद्राएँ प्राप्त हुई है।


उ़द्योग


सैधव निवासी उघोग में भी काफी विकसित थे। बर्तन बनाना अत्यन्त महत्वपूर्ण उद्योग था। अन्य महत्त्वपूर्ण उद्योग-धन्धे थे- बुनाई, मुद्रा, निर्माण, मनका निर्माण, ईट निर्माण, धातु उद्योग, मूर्ति निर्माणं गलाई एवं ढलाई प्रौद्योगिकी प्रचतिल थी।
वे लौहे प्रौद्योगिकी से अन्जान थे परन्तु ताँबा में टिन मिलाकर काँस्य बनाना जनते थे। मोनजोदड़ो से ईंट-भट्टो के अवशेष मिले हे। सिन्ध में सुक्कूर में औजार का निर्माण व्यापाक पैमाने पर किया जाता था।

लिपि


सिन्धु लिपि में लगभग 64 मूल चिन्ह एवं 250 से 400 तक अक्षर हैं जो सेलखड़ी के आयताकार मुहरों, ताँबे  की गुटिकाओं आदि पर मिले है। यह लिपि भाव चित्रात्मक थी। सैंधव भाषा अभी तक अपठनीय है।

धार्मिक जीवन


यहाँ पर पशुपतिनाथ, महादेव, लिंग, योनि, वृक्षो व पशुओ की पूजा की जाती थी। ये लोग भूत-प्रेत, व जादू-टोना पर भी विश्वास करते थे।लोथल एवं कालोबाग के उल्खन्नों में कई उग्निकुण्ड तथा अग्निवेदिकाएँ मिली है। मृतको के संस्कारों में तीन विषियाँ प्रचलित थी- पूर्ण समाधिकरण, अशिक सामाधिकरण, दाह-संस्कार।


नगर योजना


सैधव सभ्यमा की सबसे उत्कृष्ट विशेषता उसकी नगर योजना थी। संरचना व बनावट में एकरूपता नगरों की विभाजित संरचना, जन विकास हेतु नालियो की व्यवस्था, सड़को का एक दूसरे के समकोण पर काटना सैधव नगर-योजना की विशेषताएँ थी। सभी नगर की बनावट शातंरज के बोर्ड की तरह थी तथा प्रमुख भवने- भव्य स्नानागार, विशाल अन्नागार, सीााकक्ष इत्यादि थी।

पतन


इसके परवर्ती चरण में 2000 से 1750 ई॰ पू॰ के बीच किसी समय हड़प्पा कालीन सभ्यता का स्वतन्त्र अस्तित्व धीरे-धीर विलुप्त हो गया।