भारतीय समाज इस समय अनेक प्रकार की विषमताओं से पीड़ित है- जातीय श्रेष्ठता- अश्रेष्ठता का द्वन्द्व, आर्थिक असमानता, सामंवादी प्रवृतियाँ, पारस्परिक ईष्र्या-द्वेष और कलह, साम्प्रदायिक एवं धार्मिक झगड़े, अगड़े-पिछड़े और दलितो के वर्चस्व की लड़ाई, भाषात्मक विद्वेष, अनेक प्रकार की सामाजिक कुप्रथाँए और कुरीतियाँ आदि आज के भारतीय समाज की ज्वलंत समस्याएँ है। इन प्रश्नों और समस्याओं के निदान की आवश्यकता ने ही सामजिक पुनर्निर्माण की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। सामाजिक पुनर्निर्माण का सीधा सम्बन्ध राष्ट्र की प्रगति से जुड़ा हुआ है।

समाज के निर्माण और पुनर्निमाण तथा राष्ट्र की प्रगति में युवजन की भूमिका महती होती है। नौजवान अधिक ऊर्जा-समपन्न, स्फूर्तियुक्त, उतसाही, उमंग और जोश से भरे हुए कुछ नया कर गुजरने के हौसलों से पूर्ण होते है। वे लक्ष्य की ओर एकाग्रचित से तीर की तरह आगे बढ़ने वाले होते है और लक्ष्य-वेध के बाद ही दम लेते है।

युवजन अपनी रचनात्मक क्षमता का उपयोग अशिक्षा, निरक्षरता, सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों के उन्मूलन में कर सकते है। समाज में जागरूकता लाने में उनका प्रयास नया इतिहास रच सकता है, रोग, बीमारी, महामारी प्राकृति आपदाओं, पर्यावरण सुरक्षा आदि के काम युवा-वर्ग आसानी से कर सकते है। समाज निर्माण का हर काम, राष्ट्र की हर प्रगति के दायित्व को निभाने में सरकार असमर्थ होती है। युवा-वर्ग श्रमदान द्वारा पुल-पुलियों के निर्माण में, नदी-नालों की सफाई में, सड़कों की मरम्मत में, पीड़ितजनों की सेवा में आगे बढ़कर हिस्सा ले सकते है। वर्तमान की प्रत्येक चुनौती का मुकबला युवा-वर्ग ही कर सकता है।

समा और राष्ट्र के निर्माण और प्रगति की जिममेवारी युवा वर्ग तभी निभा सकते है, ज बवे स्वयं अपने को सस्ंास्कारो में ढालें अपने चरित्र का निर्माण करें। सदाचरण को अपने जीवन में आत्मसात् करे। इन्हें सामाजिक मूल्यो की अच्छाई-बुराई, प्रासंगिकता, अप्रासंगिता के सम्बन्ध में स्वयं विवेकपूर्वक निर्णय लेना चाहिए। श्रेष्ठ सामाजिक मूल्यों के प्रति समाज को जगाना युवकों का पवित्र दायित्व होता है। साम्प्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता, हिंसा और सामाजिक रूढ़ियों के विद्धि युवा-वर्ग ही संघर्ष कर सकते है और समाज को भी इनसे संघर्ष करने के लिए तैयार कर सकते है। उनके इन उद्यमों और उद्योगो से स्वस्थ समाज और प्रगतिशील राष्ट्र का निर्माण सम्भव हो सकेगा।