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धरती जीवनदायिनी है। चंद्र-मंगल आदि ग्रहों पर जीवन नहीं है। इसका कारण है- पर्यावरण या वातावरण। धरती पर जलवायु ऐसी है कि इस पर वनस्पति पैदा हो सकी, जल के स्त्रोत बन सके और जीवन पैदा हो सका। वह जीनवन-लीला तभी चल सकती है जबकी वहाँ का प्राकृतिक वातावरण निर्दोष बना रह सके।

दुर्भाग्य से आज पर्यावरण का यह संतुलन टूट गया है। जीवन जीने के लिए जितना ताप चाहिए, जितना जल चाहिए, जितने वृक्ष-जंगल चाहिए, जितनी बर्फ, जिसने ग्लेशियर और नदियों चाहिए, उन सबमें खलख पड़ गया है। धरती पर जितने हिमखंड चाहिए और जितना समुद्री जल चाहिए, उसका संतुलन बिगड़ गया है। चैंकाने वाली बात यह है कि आज हर रोज एकड़ो जमीन समुद्र में समाती जा रही है। भय है कि आने वाल 30-30 सालों में मद्रास, मुंबई आदि के समुद्र-तट अपने किनारे बसे नगरों को लील जाएँगे। जैसे भगवना कृष्ण की द्वारिका नगरी समुद्र में समा गई थी, वैसे ही एक दिन सारी धरती जलमग्न हो जाएगी। यह संसार जल-प्रल्य में डूब जाएगा। जो ज जीवन देता हे वही एक दिन जीवन को नष्ट कर देगा।

जल की इस विनाशलीला का कारण है - पर्यावरण में बढ़ता ताप। जितनी मात्रा में हम फ्रिज, ए.सी., परमाणु भड़ियाँ पर कार्बन छोड़ने वाले रसायनों का उपयोग कर रहे है, वातावरण में डीजल-तेल या खतरनाक रसायनों को जला रहे हे। साथ ही नमी पैदा करने वाले जंगलो और वनस्पतियों को काट रहे हैं, उससे गर्मी भीषण रूप से बढ़ रही हे। पूरे वायुमंडल में गर्मी का एक गुब्बार-सा छा गया है। परिणामस्वरूप हमारे पर्यावरण पर कवच की तरह जमी आजोन गैस की परत में छेद हो गया है। इससे सूर्य की विषैली किरणें तरह-तरह के रांग पैदा कर रही है। आज मनुष्य के लिए खुली हवा और धुप में निकलना भी दूभर हो गया है।

इस ताप को बढ़ाने में आज का मनुष्य दोषी है। वह सुख-सुविधा के मोह में अपनी मौत का सामान इकट्ठा  कर रहा है।

धरती को ताप से बचाने का एक ही उपाय है- अपने पापों का प्रायश्चित करना। जिन-जिन कारणों से हमने ताप बढ़ाया है, कष्ट उठाकर भी उन कारणों को बढ़ाने से रोकना । पौधे लगाना, हरियाली उगाना। मशीनी जीवन की बजाय प्राट्ठति की गोद में लौटना।