daakiya par nibandh.



डाकिये को कौन नहीं पहाचानता है? वह डाक-विभाग का एक कर्मचारी हैं । वह दूर से ही खाकी पोशाक से जाना जाता है। उसके पास चमड़े या कपड़े का एक थैला भी रहता है। वह चिट्ठी, मनिआर्डर, पार्सल आदि बाँटता हैै।

डाकिये को कठिन कार्य करना पड़ता हैै। वह सुबह से शाम तक व्यस्त रहता है। वह सवेरे डाकघर जाकर चिट्ठी, मनिआर्डर, पार्सल आदि छाँटता है। तब वह उन्हें अपने थैले में रखता हैं और बाँटने के लिए बाहर निकलता है। गाँव के क्षेत्र में वह निश्चित दिनों में ही जाता है। उस निश्चित दिनों में ही जाता है। उस निश्चित दिनों को 'बीट' कहा जाता है। डाकिया हर स्थिति में अपने कत्र्तव्य का पालन करता है। उसे चिलचिलाती धुप में चलना पड़ता है। कड़ाके की गर्मी, जाड़ा और मूसलाधार वर्षा की वह परवाह नहीं करता है। शहर की अपेक्षा गाँव में उसे अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता है। वहाँ की सड़के अच्छी नहीं रहती है। वह अपने साथ रूप्ये लेकर चलता है। वहाँ उस पर हमला हो सकता है। वह अपनी जान पर खेलकर अपने कत्र्तव्य का पालन करता है। उसे बड़ा सावधान रहना पड़ता है।

डाकिया बड़ा ही उपयोगी व्यक्ति है। वह हमारे मित्रों और सम्बन्धियों की खबरें लाता हेै। सभी उसकी प्रतिक्षा करते है। वह अच्छी और बुरी दोनों तरह की खबरें लाता है। माता अपने पुत्र द्वारा भेजे हुये रूप्ये प्राप्त करती है। बेकार आदमी को नौकरी पाने की खबर मिलती है। डाकिये के थैले में सुख-दुख के अनेक संदेश रहते है। वह किसी को पत्र द्वारा हसाँता है तो किसी को रूलाता है।

प्रायः देखा जाता है कि लोग उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखते है। यह अच्छी बात नही है। हमें उसकी सेवा को नही भूलना चाहिए। वह हमारे समाज का बड़ी ही उपयोगी सेवक है।