प्रस्तावना: बेकारी का सामान्य आर्थ है - ’काम का अभाव’। ’बेकारी’ (बेरोजगारी) विशिष्ट अर्थ है -’रोजगार (आजीविका) का आभाव। मनुष्य मात्र को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए कोई-न-कोई रोजगार चाहिए। यदि आजिविका का साधन नहीं है। तो बेकारी है, बेरोजगारी है। जीविका के साधन से हीन व्यक्ति का जीना मुशकिल है। बेकारी, बेरोजगारी, आजीवविका, रोजगार, भुखमरी और गरीबी, ये सभी परस्पर सापेक्ष शब्द है।

बेकारी की समस्या की व्यापका: 

बेकारी की समस्या विश्वव्यापी है, किन्तु यह समस्या अविकसित और विकासशील राष्ट्रों में ज्यादा गम्भीर हैै। भारतवर्ष में बेकारी की समस्या ज्यादा जटिल है। इस देश में प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष (छिपी हुई बेकारी ) और अर्द्धबेकारी मौजूद है। सबसे ज्यादा संख्या अशिक्षित बेरोजगारों की है। शिक्षित बेरोजगारों की संख्या भी कम नही है। डाॅक्टर, इंजीनियर, तकनीशियन के अलावा उच्च उपधि प्राप्त बेकारों का जूलस रोजगार की तलाश में रोज सड़कों पर निकलता है। और शाम को निरश लौट जाता है। गाँव में किसानों और खेतिहर मजदूरों को सालों भर काम नहीं मिलता । खाली वक्त में रोजगार की तलाश्ज्ञ में वे शहर में पहुँते है।

भारत में बेकारी के कारण: 

भारत में बेकारी ब्रिटिश्ज्ञ शासन-काल की पक्षपातपूण्र नीति की भी देन है। लेकिन, सबसे बड़ा करण स्वाधीन भारत की गल नियोजन नीति है। सरकार रोजगार के नये अवसरों के सृजन और अन्वेषण में असफल रही है। जनता (युवको ) ने ज्यादा रूचि बाबूगिरी और अधिकरी बनने में दिखयी है। स्वनियोजन का देश में पूर्णतः अभाव रहा है। भारत की बेकारी की समस्या का एक मुख्य कारण जनाधिक्य भी है।

  बेकारी की समस्या के कुपरिणाम: 

बेकारी भयानक रोग है। वह किसी भी राष्ट्र की अथीव्यवस्था को चैपट कर डालती है। बेकारी राष्ट्र को  जर्जर बनाती है। वह समाज को घुन की तरह खाती है। बेकारी के कारण असंतोष फैलता है, अपराध बढ़ते है। अनैतिक कर्म होते है। भ्रष्टाचार प्रोत्साहित है।

बेकारी की समस्या का समाधान: 

बेकारी की समस्या के समाधान के कई उपाया है- आर्थिक योजनाओ में तालमेल एवं संतुलन कायम करना, बीमार उद्योग की हालत में सुधान, परिवार-नियोजन, कार्यक्रम द्वारा जनसंख्या वृद्धि पर प्र्यापत नियंत्रण, भ्रष्टाचार-उन्मूलन, विदेशी ऋणो से मुक्ति, परनिर्भरता की प्रवृत्ति का परित्याण, स्वनियोजन को प्रोत्साहन, रोजगार के नये अवसरों की तलाश और सृजन, रोजगारोन्मुखी शिक्षा को प्रोत्साहन, रोजगार के नये अवसरों की तलाश और सृजन, रोजगारोन्मुखी शिक्षा को बढ़ावा इत्यादि कुछ ऐसे उपाय है, जिनके माध्यम से बेरोजगारी पर काबू पाया जा सकता है। लघु एवं कुटीर उ़द्योगों का विकास तथा कृषि को लाभकर उद्योग के रूप में विकसित करने से बेकारी को नियंत्रित करने में सहायता मिलेगी।