bailagaadee par nibandh



हमारे देश में गाँव-गाँव में बैलगाडत्री पायी जाती है। यह गरीब भारत के गरीबों की गाड़ी है। पुराने जमाने में सामान और यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिये केवल यही एक गाड़ी थी। अभी भी यह ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे सस्ती गाड़ी है। शहर से गाँव और गाँव से शहर सामान लाने का काम बैलागाड़ी द्वारा ही होता है किन्तु दूर यात्रा के लिये यह उतनी सुविधाजनक नहीं है।




बैलगाड़ी लकड़ी तथा बाँस की बनी होती है। इसमें दो पहिये होते हैं जो काठ या लोहे के बने होते हेै। गाड़ी में दो बैल जुड़े रहते है।गाड़ीवान गाड़ी पर आगे बैठता हैै और गाड़ी हाँकता है। कुछ गाड़ियों में छज्जे होते है। ये गाड़ीयाँ यात्रियों को ढोने के काम मे लाई जाती है। बैलगाड़ी से हमें बहुत लाभ है। यह भारी बोझा ढोता है। वर्षा के दिनों में जब सड़के खराब रहती है तब बैलगाड़ी ही काम आती है। यह गाँव के किसानों और व्यापारियों के लिये बहुत ही उपयोगी है। किसान बैलगाड़ी पर आसपास के गाँव में जाते है। वे इस पर गोबर लादकर अपने खेतो में ले जाते है। वे इस पर अनाज बाजार ले जाते है और बेचते है। बैलगाड़ी सवारी का अपना अलग ही आनन्द है। देहात में हरे-हरे खेतों के बीच से गुजरती सड़क पर मन्थर गति से चलती हुर्ड बैलगाड़ी में हमें कितना आनन्द आता है। बैलों के गले की छोटी-छोटी घंटियो की मधूर आवाज सुनााई पड़ता है। मन्द-मन्द हवा बहती है। तब हम सारी चिन्ताओ को भुलकर गाड़ीवान के मधूर गीत की स्वर-लहरी में खो जाते है। बैलगाड़ी भारत की संस्कृति और सरलता का प्रतीक है। इसकी अपनी खूबी है।



आज मोटर, रेल तथा यातायात के अन्य साध्नों  की भरमार है। इनकी तुलना में बैलगाड़ी बहुत धीमी सवारी है। फिर भी इसका महत्व है। यह गरीब भारतीय किसनों की जीविका का साधन है। युग बदला, किन्तु इसकी सार्थकता समाप्त नहीं हुई है। अतः इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है।