विकाश कुमार
अशाक विहार
बक्सर

7 अप्रैल 2016
सम्मानिय प्रभात कुमार जी
       सादर नमस्कार !
   मैं आपको नहीं जानता। आप मुझे नहीं जानते। मेरे और आपके बीच एक ही नाता है-एक भले इनसान और एक कृता इनसान का। मै आपके द्वारा भिजवाई गई अटैची को पाकर हृदय से कृतज्ञ हूँ। मेरा रोम-रोम आपकी शुभकामना कर रहा है।
   मै रेलगाड़ी में भूल हुई अर्टची के करण बहुत परेशान था। मेरे सारे सर्टीफिकेट, मकान के कागज़ात, कपड़े, पैसे उस अटैची में थे। पिछले तीन दिनों की अथक कोशिश के बाद मेरा मन निराश हो चुका था। मै, न जाने दुनिया में व्याप्त बेईमानी का कितनी बार कोस चुका था। मुझे लगने लगाा था कि जैसे इस दुनिया में मक्कारी, ठगी, चोरी और झूठ का बोलबाला है। परंतु आपने मेरी अटैची अपने पुत्र के हाथो भेजकर मेरी सारी निराशा को आशा में बदल दिया। बत से मै बहुत प्रसन्न, तरोताजा और उत्साहित हूँ।

प्रभात कुमार जी ! आपकी ईमानदारी ने सचमुच मुझे नया विश्वास दिया है। आप विश्वास रखिए, जिंदगी में अगर मै भी किसी की परेशानी दूर करने के योग्य हो सका तो यह अवसर नहीं चूकूगाँ।
      मैंने अटैची देख ली है। एक-एक वस्तु यथास्थान सुरक्षित है। आपका हृदया से धन्यवाद ! मेरे योग्य कभी कोई सेवा हो तो निभाने में प्रसन्नता अनुभव करूगाँ।
भवदीय
नकुल