लोकतंत्र ऐसी शासन-प्रणाली है जिसका सारा कार्यभार स्वंय ’लोक’ के कंघो पर होता है। लोकतंत्र की सफलता-असाफलता उन लोगों पर निर्भर करती है, जो कि सरकार चलाते है। उन लोगों को चुनना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।
स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि चुनाव की प्रक्रिया निष्पक्ष, सरल और पारदर्शी हो। आम गरीब लोग भी चुनाव का अंग बन सकें। वे अपने मत का महत्व  समझें तथा स्वतंत्र मत से मतदान कर सकें। देखने में आता है कि भारत में 40 से 80 प्रतिशत  तक मतदान होता है। चुनाव-प्रणली में ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए कि शत-प्रतिशत लोग मतदान करें। इसके लिए दंड और पुरस्कार की योजना की जानी चाहिए।

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का अर्थ यही है कि चुनाव लड़ना सस्ता, सुरक्षित तथा सर्वसुलभ हो। इसके लिए जटिल कानूनी दाँवपेच न हों। कोई गरीब समाजसेवी धन के अभव में भी चुनाव लड़ सके। दूसरी ओर, यह भी सुनिशिचत किया जाना चाहिए कि धन-संपन्न लोग लोभ-लालच और प्रचार-प्रसार के बल पर लोगों को मुमराह न कर सकें। यद्यपि इस विषय में कानूनों की कमी नही है, परंतु व्यवहार में इनकी पालना नहीं की जाती । बड़े-बड़े धनी लोग अपने धन-बल पर प्रचार-तंत्र, प्रशासन, पुलिस और प्रभावी लोगों को खरीद लेते है। कहीं-कही गुंडागर्दी का साम्राज्य होता है। वहाँ किसी कुख्यात गुंडे के सामने कोई चुनाव में खड़ा नही होता। यदि कोई साहस करे तो उसकी हत्या करवा दी जाती है। ऐसी स्थिती पर चुनाव-आयोग को कड़ी निगाह होनी चाहिए। सौभग्य से चुनाव-आयोग इस दिशा में जागरूक है। परंतु अभी और काम किया जाना बाकी है।

आजकल देखने में यह आता है कि विभिन्न दल अपने चुनाव-प्रचार में फिल्मी हस्तियों और क्रिकेट-सितारों को बुला लेते हैं। इस बहाने लोगो की भीड़ जमा हो जाती है। वास्तव में इन मेहमान कलाकारों का चुनावों से कोई लेना-देना नहीं होता। ये मदारी की डुगडुगी का काम करते है। ऐसे कामों से लोकतंत्र में भटकावा आता है। लोग लुभवनी और कच्ची बातों के झाँसे में आकर अपना कीमती मत बेकार कर बैठते है।

भारत के चुनवी परिदृश्य का एक घिनौना रूप् भी है। चुनवी सभाओ में नेताओं के चमचे और बड़बोले वक्ता अपने विरोधियों के बारे में अभद्र भाषा का प्रयोग करते है। वे खुलकर एक-दूसरे पर लाँछन लगाते है तथा उनका चरित्र-हनन करते है। यह चिंताजनक बात है।

वास्तव में स्वस्थ चुनाव का स्वस्थ रूप है- शांतिपूर्वक प्रचार करना। मतदाताओं के सामने अपनी कार्य-योजना रखाना, न कि विरोधियो को उखाड़ना। इसके लिए इलैक्ट्राॅनिक मीडिया सबसे सशक्त माध्यम है। इसके सहारे पूरे परिवार के सदस्य चुनावी-चर्चा में सम्मिलित हो सकते है।